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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

घूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं है

घूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं है

घूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं हैघूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं है
Visfot News


आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के 29 वें अध्याय के 33 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने संजय से कहा कि
स्तेनो हरेद् यत्र धनं ह्यदृष्ट:,
प्रसह्य वा यत्र हरेत दृष्ट:।
उभौ गह्र्यौ भवत: संजयैतौ,
किं वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे।।
भगवान श्री कृष्ण ने संजय को दुर्योधन की चित्तवृत्ति के विषय में समझाते हुए कहा कि हे संजय! कोई व्यक्ति चोरी करे, और उसे कोई देख न पाए, और दूसरा व्यक्ति बलपूर्वक किसी के धन को सबके देखते हुए छुड़ा ले, इन दोनों में क्या अन्तर है? अर्थात कोई अन्तर नहीं है। एक चोर है, और दूसरा डाकू है, दोनों ही परधनापहारी हैं। समाज में दोनों की निंदा होती है। जो व्यक्ति बलपूर्वक किसी को डरा धमकाकर धन छुड़ा लेता है, उसे कोई बीर नहीं कहा जाता है। छल कपट करके किसी के धन को लेनेवाले को बुद्धिमान व्यक्ति नहीं कहा जाता है। दुर्योधन ने द्यूतक्रीडा में शकुनी से छल कपट करवा कर पाण्डवों का धन हरण किया है तो क्या उसे उचित कहा जाएगा? दुर्योधन में और उन चोर डाकुओं में क्या अन्तर है? अर्थात दुर्योधन में और उन चोर डाकुओं में कोई अन्तर नहीं है।
आजकल भी बेईमानी को खुलकर बताकर ईमानदारी बताई जाती है। दूध में पानी मिलाकर दूध बेचने वाला कहता है कि ये पानीवाला दूध है और ये बिना पानी का दूध है, देखो भाई! हमने तो ईमानदारी से बता दिया है। लेना हो लो, न लेना हो तो न लो। बिना बताए ही पानीवाला दूध दिया होता तो बेईमानी कहलाती, जब हम बताकर दे रहे हैं तो ये हमारी ईमानदारी ही तो है। इसी प्रकार सरकारी विभागों में घूस लेकर यही कहते देखा जाता है कि ये हमारी ईमानदारी है कि हमने रुपया लिया है तो तुम्हारा काम भी करवा दिया है। हम जिसका रुपया लेते हैं, उसका ईमानदारी से काम भी करते हैं। ऐसे लोगों को क्या आप ईमानदार व्यक्ति कहते हैं? ईमानदार नहीं कहते हैं बल्कि अपना काम हो जाने के बाद गाली ही देते हैं। ये लोग मजबूरी का फायदा उठाकर रुपया लेते हैं और एक चोर भी दूसरे का धन चुराते हैं, उसे कोई देख नहीं पाते हैं। वास्तव में घूस लेकर काम करनेवाले तथा कोई देख न पाए, ऐसी चोरी करनेवाले, दोनों ही चोर ही हैं, दोनों की समाज में निंदा होती है और दोनों ही दण्ड के पात्र हैं।
स्तेनो हरेद् यत्र धनं ह्यदृष्ट:
कोई भी स्त्री पुरुष यदि किसी की वस्तु को या धन को उठा लेता है, उसे कोई देख नहीं पाता है। वस्तु लेनेवाले के मन में भी यही होता है कि मैं ये वस्तु ले लूं और कोई देख भी न पाए, इसलिए उसको स्तेन अर्थात चोर कहते हैं। ऐसे चोर स्त्री पुरुष भी यही चाहते हैं कि हम चोरी भी करते रहें और समाज में हमारी बुराई भी न हो। किन्तु चोरी करना, कोई आजीविका चलाने की विद्या नहीं है। कोई कला नहीं है। कोई भी व्यक्ति, चोर की प्रसंशा करते हुए ये नहीं कहता है कि वाह! क्या कला है! कोई देख भी नहीं पाता है और तुम उसके रुपया निकाल लेते हो। इस कला के लिए कोई भी शाशक उसको पुरस्कार नहीं देता है, अपितु चोरी पकडऩे पर समाज के लोग उसको मारते पीटते हैं और घोर निंदा करते हैं।
प्रसह्य वा यत्र हरेत दृष्ट:
कोई शारीरिक बल को दिखाकर या क्रूरता दिखाकर, अथवा अपने पद का भय दिखाकर हजारों लोगों के सामने किसी के रुपया ले लेता है, या छुड़ा लेता है। प्रसह्य अर्थात जबरदस्ती ही धन छुड़ा लेता है तो समाज उसको डाकू ही कहता है। कोई उसे ये नहीं कहता है कि वो बड़ा बीरपुरुष है, देखो! उसने सबके सामने इतनी भीड़ में भी अकेले ही उसको मारकर उसके रुपये छुड़ा लिए, इस प्रकार उसकी बीरता की प्रसंशा नहीं होती है। ऐसे व्यक्ति को समाज के लोग गुंडा, डाकू ही कहते हैं।
उभौ गह्र्यौ भवत: संजयैतौ
चोर की और डाकू की दोनों की ही समाज में निंदा ही होती है। घूस लेकर अयोग्य व्यक्तियों का चयन करनेवाले अधिकारी डाकू ही कहे जाएंगे। भले ही उनने अनेक लोगों की जानकारी होते हुए पैसा लिया हो। अनेक अधिकारियों ने बांटकर पैसा खाया हो। अपने बड़े अधिकारी को देकर छोटे अधिकारी घूस खाते हैं तो दोनों ही डाकू हैं, और चोर हैं। कानून के अनुसार, दोनों ही दण्ड के पात्र हैं। समाज में दोनों की ही निंदा होती है। इसलिए कानून के अनुसार कहा जाता है कि घूस लेनेवाला भी अपराधी है और घूस देनेवाला भी अपराधी ही है। समाज के व्यक्तियों में एकता और धैर्य न होने के कारण तथा अपना ही कार्य बनाने की प्रवृत्ति होने के कारण ही प्राय: सभी विभागों में घूस लेनेवाले अधिकारी हो गए हैं।
अब श्री कृष्ण भगवान ने संजय से अन्तिम बात कहते हुए समझाया कि –
किं वै पृथक्त्वं धृतराष्ट्रस्य पुत्रे
अब तुम्हीं बताओ संजय! धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन में और चोर डाकू में क्या अन्तर है? अर्थात दुर्योधन ने सभी के सामने जुआ खेला है, किन्तु शकुनी से छल कपट करवा कर जीता है तो वह खेल नहीं है। वह छल कपट ही है। पाण्डवों के धन का छल कपट से धन हरण करना, द्रौपदी का अपमान करना आदि क्रियाएं बतातीं हैं कि दुर्योधन की ये शुद्ध दुष्टता है, ईष्र्या द्वेष है। इसलिए दुष्ट स्वभाव के स्त्री पुरुष यदि छल कपट पूर्वक किसी का धन लेते हैं या अपमान आदि करते हैं तो वे संसार में निंदा के ही पात्र होते हैं। दण्ड के पात्र ही होते हैं। वर्तमान समय में लोकतंत्र के नाम पर नेताओं से लेकर छोटे बड़े सभी विभाग के सरकारी अधिकारी ईमानदारी बताकर रूपया लेकर काम करते हैं तो ये ईमानदारी नहीं है, अपितु अपराध ही है। वे सभी अपराधी ही हैं। इतने के बाद भी समाज के हित की बात करते हुए समाज के लिए आए हुए धन को बांटकर खा लेते हैं, ये तो चोरी भी है और डकैती भी है। ये छल कपट है, कहीं से भी ईमानदारी नहीं कहे जा सकते हैं। दुष्परिणाम ही बताएंगे कि कर्म कैसा था। इसी छल कपट के कारण ही महाभारत जैसा नर धन,और विज्ञान विनाशक युद्ध हुआ था, वैसे ही वर्तमान के छल कपट के कारण ही आनेवाले समय में ऐसे विनाशक युद्ध की पुनरावृत्ति होगी। ऐसे भयानक युद्धों के जिम्मेदार भी बुद्धिमान बलवान व्यक्ति ही होंगे। स्वयं तो नष्ट होंगे ही और हजारों पीढिय़ों को अपंग और दरिद्र बना जाएंगे।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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