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Saturday, April 20, 2024
धर्म कर्म

संसार में ज्ञानदाता गुरु, माता पिता से भी अधिक श्रेष्ठ होते हैं

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत के 7 वें स्कन्ध के 36 वें अध्याय के 25 वें और 26 वें श्लोक में भगवती दुर्गा ने अपने पिता हिमालय से कहा कि –
पित्रोरप्यधिक: प्रोक्तो ब्रह्मजन्मप्रदायक:।
पितृजातं जन्मनष्टं नेत्थं जातं कदाचन।
तस्मै न द्रुह्येत्यादि निगमोह्यप्यवदन्नग ।।25।।
भगवती दुर्गा ने कहा कि हे पर्वतराज! संसार में शरीर को प्रदान करनेवाले माता पिता का ऋण चुकाना कठिन है। क्योंकि उनने शरीर के पालन पोषण में अनेक प्रकार के कष्ट उठाए हैं। फिर भी माता पिता से भी अधिक श्रेष्ठ वे गुरु होते हैं, जिन्होंने इस संसार सागर से पार होने के लिए ब्रह्मज्ञान प्रदान किया है। क्योंकि माता पिता के द्वारा दिए गए शरीर को तो एक न एक दिन नष्ट हो ही जाना है। माता पिता भी कभी न कभी अकेला छोडक़र इस संसार से चले ही जाएंगे, फिर कौन रक्षा करेगा? जब संसार में आपका कोई हितैषी नहीं बचता है तब, गुरु के द्वारा दिया गया आत्मज्ञान, विवेक आदि ही इस संसार में रहने के लिए तथा मुक्ति पाने के लिए परमहितैषी होते हैं।
इसलिए ज्ञान प्रदाता गुरु से बढक़र संसार में और कोई भी श्रेष्ठ नहीं होता है।
इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि –
तस्मै न द्रुह्येत्
ज्ञानप्रदाता गुरु का कभी भी द्रोह नहीं करना चाहिए। माया, मोह,ममता अहंकार आदि में फंसे हुए स्त्री पुरुष जिस दिन अपने गुरु का त्याग कर देते हैं , या भूल जाते हैं, अथवा अनादर कर देते हैं, तब भयानक शारीरिक मानसिक आपत्ति आने पर उसको उबारनेवाला संसार में कोई भी नहीं मिलता है।
भगवती दुर्गा ने 26 वें श्लोक में बहुत विशेष ध्यान देने के लिए कहा कि –
तस्माच्छास्त्रस्य सिद्धान्तो ब्रह्मदाता गुरु: पर:।
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न शंकर:।। 26।।
भगवती दुर्गा ने कहा कि हे पर्वतराज हिमालय! इसलिए शास्त्रों का सबसे पहला सिद्धान्त यह है कि ब्रह्मज्ञान दाता गुरु ही सर्वश्रेष्ठ है।
शिवे रुष्टे गुरुस्त्राता गुरौ रुष्टे न शंकर:
सृष्टि के संहारक देवता भगवान शंकर जी यदि रुष्ट होकर किसी का नाश करने के लिए तैयार हो गए हों तो समर्थ सद्गुरु उसकी रक्षा कर सकते हैं, किन्तु यदि प्रलयंकर शंकर जी से भी रक्षा करनेवाले गुरु ही रुष्ट हो गए हों तो फिर रुष्ट गुरु से प्रलयंकर शंकर जी भी नहीं बचा सकते हैं।
अब आप समझ चुके होंगे कि आत्मज्ञान प्रदाता गुरु का कितना महत्त्व है । ज्ञान नष्ट नहीं होता है , शरीर ही नष्ट होता है। इस संसार में ज्ञान ही सबसे अधिक दुर्लभ है। उस ज्ञान से भी अधिक दुर्लभ तो ज्ञान देनेवाले दयालु सद्गुरु मिलना, दुर्लभ है। यदि सद्गुरु मिल भी जाएं तो सद्गुरु के प्रति आत्मसमर्पण करना भी दुर्लभ है। अर्थात इस संसार में जो भी सबसे अधिक श्रेष्ठ होता है, जो सबसे अधिक हितकारी गुणकारी होता है, वह सब दुर्लभ ही होता है। इसलिए दुर्लभ वस्तु एकबार प्राप्त हो जाए तो उसकी सदैव रक्षा करना चाहिए। गुरु की प्रसन्नता ही सभी दुर्लभ वस्तुओं से अधिक दुर्लभ है।

RAM KUMAR KUSHWAHA

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