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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

विद्वान तपस्वी, ब्राह्मण ही सत्पात्र है ,और उनका घर ही तीर्थस्थान है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के 7 वें स्कन्ध के 14 वें अध्याय के 27 वें और 28 वें श्लोक में नारद जी ने धर्मराज युधिष्ठिर जी को पुण्यस्थलों को बताते हुए कहा कि –
अथ देशान् प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेय आवहान्।
स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते।। 27।।
नारद जी ने कहा कि हे महाराज युधिष्ठिर!
अथ देशान् प्रवक्ष्यामि धर्मादिश्रेय आवहान्
अब मैं उन स्थानों को बताऊंगा, जिन स्थानों में दान करने से, भोजन, जल, वस्त्र आदि प्रदान करने से तथा श्राद्ध, तर्पण आदि करने से पुण्य प्राप्त होता है। देवता और पितर प्रसन्न हो जाते हैं। यहांतक कि श्रेय अर्थात मोक्ष की भी प्राप्ति हो जाती है। आत्मज्ञान हो जाता है।
वे स्थान कौन से हैं? तो सुनिए –
स वै पुण्यतमो देश: सत्पात्रं यत्र लभ्यते
श्लोक में जो वै अव्यय पद कहा गया है, उसका अर्थ होता है कि ही । अर्थात वही स्थान सर्वश्रेष्ठ तथा पुण्यफल प्रदान करनेवाला है, जहां सत्पात्र मिल जाए।
यदि तीर्थ में भी सत्पात्र न मिले तो क्या करें?
अर्थात यदि तीर्थ में जाकर भी यदि सत्पात्र विद्वान ब्राह्मण नहीं मिलता है तो भी वहां श्राद्ध तर्पण दान आदि तो करना ही चाहिए। क्योंकि वह तो तीर्थ ही है। वहां तो स्थान का ही महत्त्व है। तीर्थस्थानों की भूमि ही पवित्र होती है। तीर्थों में किया गया धर्म दान आदि तो निष्फल होता ही नहीं है। यदि कोई तीर्थ जाकर धर्म नहीं कर पाता है तो उसके आस पास यदि कोई सत्पात्र विद्वान,वेदज्ञाता, ब्राह्मण मिल जाए तो उस ब्राह्मण का घर ही तीर्थ है। विद्वान ब्राह्मण के द्वारा कराया गया सत्कर्म उतना ही फल देगा, जितना फल तीर्थ स्थल में करने पर होता है।
अब 28 वां श्लोक देखिए –
बिम्बं भगवतो यत्र सर्वमेतत् चराचरम्।
यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम्।। 28।।
चर अर्थात भोजन करनेवाला शरीरधारी जीव, अचर अर्थात जो खाया जाता है, अर्थात वनस्पति तथा सभी जीवों के शरीर। ये सब भगवान का बिम्ब है। अर्थात भगवान ही सभी शरीरों में निवास करते हुए भोजन करनेवाले हैं। तथा जो भोजन है, वह अचर है, वो भी भगवान ही हैं। घास भी किसी दैत्य ,दानव, मानव ने उत्पन्न नहीं की है ,और गाय भी किसी दैत्य, दानव मानव ने उत्पन्न नहीं की है। ये सारा संसार ही भगवान है। यही परमसत्य है, कोई जान पाए, या न जान पाए। कोई समझ पाए या न समझ पाए।कोई माने या न माने, परमसत्य तो यही है कि भगवान का बिम्ब ही संसार है। अर्थात संसार ही भगवान है।
यत्र ह ब्राह्मणकुलं तपोविद्यादयान्वितम्।
अब इस गुणदोषमय संसार में भी जहां भी तपस्या से युक्त, विद्या और दया से युक्त ब्राह्मणकुल निवास करता है, वह स्थान तो तीर्थ स्थल ही है। ऐसा ब्राह्मण कुल ही सत्पात्र है। ऐसे ब्राह्मण के द्वारा कराया गया सत्कर्म सदा ही फलीभूत होता है। दान तो सदा ही विद्वान ,तपस्वी, ब्राह्मण को ही देना चाहिए।
जल, भोजन, वस्त्र, औषधि तो सभी को देना चाहिए।
आगे के 29 वें श्लोक को भी देखिए
यत्र यत्र हरेरर्चा स देश: श्रेयसां पदम् ।।29।।
जहां जिस स्थान में भगवान श्री हरि की नित्य ही प्रतिदिन पूजा अर्चना होती है, वह स्थान तो सभी प्रकार के कल्याणों को सुखों को प्रदानकरनेवाला है। यदि आपके घर में भगवान की नित्य प्रतिदिन पूजा अर्चना होती है तो वह सबसे अधिक पवित्र तीर्थ स्थल ही है। अर्थात अपने घर में तुलसी तथा भगवान श्री हरि का नित्य पूजन करते हैं तो आप भी सत्पात्र हैं और आपका घर ही तीर्थस्वरूप है। \ इसलिए प्रत्येक स्त्री पुरुषों को अपने द्वारा किए जाने वाले सत्कर्म पर तो विचार करना ही चाहिए। किंतु पात्र और स्थान पर भी विचार करना चाहिए। जो स्त्री पुरुष वस्तु का विचार किए बिना , स्थान का और पात्र का विचार किए बिना ही आंखबंद करके सत्कर्म करते हैं, उन्हें पूर्णफल की प्राप्ति नहीं होती है। वास्तव में श्राद्ध ,विवाह आदि से लेकर सत्यनारायण कथा से लेकर भागवत आदि पुराणों की कथा भी विद्वान ब्राह्मण से ही करवाने से फलप्राप्त होता है। बाकी तो सब ठीक ही है। मनभरने की बात है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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