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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

ऐसा असत्य बोलने से तो एकत्रित पुण्यों तक का नाश हो जाता है

ऐसा असत्य बोलने से तो एकत्रित पुण्यों तक का नाश हो जाता है

जिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं हैजिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के 107 वें अध्याय के 8 वें श्लोक में गालवमुनि कहते हैं कि –
प्रतिश्रुत्य करिष्येति कर्तव्यं तदकुर्वत:।
मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्तं प्रणश्यति।।
यदि कोई स्त्री पुरुष, किसी से कह दे कि हां! मैं कर दूंगा या करूंगा, और फिर उस कर्तव्य को नहीं करता है, या नहीं कर पाता है, अथवा कहे हुए को नहीं करने की इच्छा भी कर लेते हैं तो उसका दिया हुआ वचन ही अग्नि का रूप धारण करके कहनेवाले के इष्ट और आपूर्त सभी प्रकार के किए पुण्यों का नाश कर देता है। इसलिए वही वचन देना चाहिए जिसका पालन कर सकते हैं। संसार में ऐसी कोई स्त्री नहीं है जिसको अपने पूरे जीवन में कभी भी किसी की भी आवश्यकता न पड़ती हो,और न ही ऐसा कोई पुरुष है, जिसको कभी किसी की आवश्यकता न पड़ती हो। क्योंकि किसी के भी पास प्रत्येक वस्तु नहीं होती है। शारीरिक, मानसिक आपत्ति में तो प्रत्येक मनुष्य निर्बल और असहाय हो जाता है। ऐसी अवस्था में हर कोई किसी न किसी के पास अवश्य ही जाता है। अपने पास आशा से आए हुए व्यक्ति की यथाशक्ति सहायता करना, सबसे बड़ा पुण्य है। तन और धन से ही सहायता होती है। तन से सेवा और धन से वस्तु देना पुण्य है।
संसार में सबसे बड़े पुण्य दो ही प्रकार के होते हैं।
(1) इष्ट अर्थात यज्ञ
(2) आपूर्त अर्थात जलाशायादि का निर्माण और छायादार फलदार वृक्षों का आरोपण।
यज्ञ से सामाजिक लाभ
इष्ट अर्थात यज्ञ और आपूर्त अर्थात जलाशय की व्यवस्था करना। तालाब, कुआं, नल आदि की व्यवस्था को आपूर्त कहते हैं। जलाशयों की व्यवस्था करने से असंख्य जीवों की प्यास शांत होती है। यज्ञ करने से इस लोक में तथा परलोक में यशस्वी हो जाते हैं। यज्ञ में अनेक प्रकार के जीवों का भोजन होता है। किसान से वस्तुओं को खरीदते हैं। किसानों से तिल, यव,गेहूं,दाल,चावल, शाक भाजी, मसाले, नमक, आदि खरीदा जाता है। यज्ञ में गौ का घी ही पवित्र माना जाता है। इसलिए गोपालकों का गोघृत पर्याप्त मात्रा में खरीदा जाता है। यज्ञ में गौघृत का ही उपयोग,गोबर का उपयोग, गोमूत्र का उपयोग तथा गौ के दही, मा इन पांचों का उपयोग होता है, इसलिए सभी लोग गोपालन करते हैं। गौ का घी, दूध ,दही, मा और गो मूत्र तथा गोबर सभी तो मनुष्य जाति के लिए अमृत है। यज्ञभूमि तैयार करने के लिए कामदारों को काम मिल जाता है। यज्ञ प्रारम्भ होने के पूर्व से यज्ञ समाप्ति तक सभी को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, तथा शूद्र, अन्त्यज आदि सभी प्रकार मनुष्यों को आजीविका और सम्मान मिलता है। इसलिए ब्रह्मा जी ने मनुष्य की सृष्टि करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जाति को यज्ञ करने की आज्ञा दी है। सभी का जीवन यज्ञमय होने से सहज में ही सामाजिक व्यवस्था और संस्कार व्यवस्थित बने रहते हैं। यज्ञ हवन आदि करने से मात्र करनेवाले का ही भला नहीं होता है, अपितु उस यज्ञ से प्राय: सभी मनुष्य जातियां जुड़ जातीं हैं। इसलिए यज्ञ को तथा जलाशय आदि के निर्माण को सामाजिक पुण्य कहते हैं। यदि कोई मनुष्य ये दोनों ही कार्य नहीं करता है तो वह क्या करता होगा बस, स्वयं खाते पीते जीवन व्यतीत करते हुए बिना यश के ही संसार से पशुओं की तरह विदा हो जाता है।
इसलिए कहा गया है कि –
मिथ्यावचनदग्धस्य इष्टापूर्तं प्रणश्यति
हां, मैं तुम्हारे कार्य को करूंगा, ऐसा कहकर जो नहीं करते हैं, वे मिथ्यावचन की अग्नि में उसके सभी प्रकार के शुभकर्म नष्ट हो जाते हैं। इष्टापूर्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं। इसलिए जो आप कर सकते हैं, वही कहना चाहिए, जो कहा है, वह करना ही चाहिए। यदि नहीं करेंगे तो जितना यश उसका कार्य करने से होना था, उससे अधिक अपयश फैल जाता है कि वह कहता तो है, किन्तु करता नहीं है। इसलिए इष्ट अर्थात यज्ञ और आपूर्त अर्थात जलाशयों का निर्माण तथा छायादार फलदार वृक्षों का आरोपण आदि करना अतिशय पुण्यदायक कहा जाता है। यह सब पुण्य आपके झूठ बोलते ही नष्ट हो जाता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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