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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

आपको कभी ऐसी इच्छा होती है क्या?

ये तो होना मुश्किल हैये तो होना मुश्किल है
Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, श्रीधाम वृन्दावन
जब कोई रोगी वैद्य या डाक्टर के पास जाता है तो रोगनिदानवेत्ता वैद्य रोगी से रोग का समय पूछते हैं। कब से बीमार हो?
क्यों कि यदि रोग अधिक समय का है तो औषधि सेवन का समय भी अधिक हो जाएगा। औषधि भी रोगी की आयु देखकर दी जाती है। बच्चे और वृद्ध को थोड़ी सी औषधि दी जाती है।क्यों कि दोनों में शारीरिक शक्ति कम होती है।औषधि भी पचाने की शक्ति नहीं होती है। इसी प्रकार संसार की उत्पत्ति कामना ( इच्छा ) से ही होती है।भगवान के चमत्कार को संसार कहते हैं।
इच्छा के विना संसार का कोई काम नहीं प्रारम्भ नहीं होता है। यदि आप की कुछ भी करने की इच्छा नहीं होती है तो शारीरिक शक्ति का और बौद्धिक शक्ति का प्रयोग ही नहीं होता है। यह इच्छा ही संसार को उत्पन्न करने का साधन है। तथा संसार से छूटने का भी साधन इच्छा ही है।आपको को छोडऩे की इच्छा होती है तो शक्ति का उपयोग छोडऩे में होने लगता है। अर्थात सुख प्राप्ति का साधन भी इच्छा ही है ,तो दुख प्राप्ति का भी साधन इच्छा ही है। एक और आश्चर्य यह है कि जिससे सुख मिलता है ,उसी से ही दुख मिलता है।
अब आपकी शारीरिक बौद्धिक शक्ति का सम्पूर्ण उपयोग सुख पाने में और दुख दूर करने में ही होगा। भक्त प्रह्लाद ने पाठशाला में सभी असुरबालकों को ज्ञान देते हुए कहा कि संसार एक बहुत बड़ा रोग है। अनेक जन्मों के रोग को इतनी जल्दी ठीक भी नहीं किया जा सकता है।जन्म से मृत्यु तक इच्छा ही होती रहती है , भले वह प्राप्त हो या न हो। इस रोग को समझाते हुए प्रह्लाद जी ने भागवत के 7 वें स्कन्ध के 7 वें अध्याय के 42 वें श्लोक में मनुष्यों के स्वभाव को बताते हुए कहा कि
सुखाय दु:खमोक्षाय संकल्प इह कर्मिण:। सदाप्नोतीहया दु:खमनीहाया: सुखावृत:।।
हे दैत्यबालको! संसार के सभी स्त्री पुरुष सुख की प्राप्ति की इच्छा के कारण अनेक प्रकार के कर्म करते हैं। सुख के लिए किए गए कर्म से तथा उस वस्तु से जब दुख मिलता है तो दुख को दूर करने के लिए कर्म करते हैं। बस, इन दोनों के लिए कर्म करने में आयु और शक्ति दोनों समाप्त हो जाते हैं।उसे समझ में ही नहीं आता है कि जब इच्छा नहीं थी तो दुख भी नहीं था। ये सब दुख इच्छा के कारण ही हुए हैं। उतनी ही इच्छा की पूर्ति करना चाहिए थी ,जितनी आवश्यकता थी। जैसे विवाह के पहले एक स्त्री को न तो पति का दुख ,न ही संतान से प्राप्त होनेवाला दुख ,और न ही सास ससुर समाज का ही दुख था। विवाह की इच्छा होते ही दुख प्रारम्भ हो गया कि पता नहीं कैसे लोग मिलेंगे।विवाह के बाद तो दुखों की परंपरा शुरू हो गई। संतान की इच्छा पूर्ण होते ही अब दुखों की गणना करना ही व्यर्थ है।इसी प्रकार पुरुष की भी यही स्थिति होती है।सुख की मात्रा तो बहुत ही कम है ,लेकिन दुख की मात्रा तो मरने तक की है।
कभी पंडित ,तो कभी महात्मा ,तो कभी डाक्टर , तो कभी पैसा इत्यादि में ऐसा उलझा कि न तो स्वयं सुखी हो पाया और न ही किसी को सुखी कर पाया। किसी भी स्त्री का और किसी भी पुरुष का स्वयं का इतना दुख होता ही नहीं है। वे तो एक दूसरे को सुखी करने के प्रयत्न के कारण ही सदा ही दुखी रहते हैं। सदाप्नोति दु:खम् जब से सुख की इच्छा जाग्रत हुई है तब से जीवन के अंत तक सदा दुख ही प्राप्त होता है। रोग के कारण का नाश होते ही स्वस्थ हो जाते हैं। सभी के दुख का कारण संकल्प अर्थात इच्छा ही है। चाहे स्वाद की इच्छा हो या देखने ,छूने ,सूंघने घूमने की इच्छा हो। यहां पर किसी को भी अपना व्यक्तिगत इतना दुख नहीं है।दुख तो अपनों को सुखी करने की इच्छा के कारण ही है। अर्थात यहां पर कोई भी किसी को सुखी नहीं कर सकते हैं। आवश्यकता से अधिक इच्छा करनेवाले को न कभी सुख मिला है और न ही मिलेगा। यह विवेक ही आत्मसंतोष को उत्पन्न करता है। अपनी शक्ति तथा आयु की सीमा का ध्यान रखते हुए ही कर्म करना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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