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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

ये चार घटनाएं तो सबके साथ होनी हैं

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के आश्वमेधिक पर्व के 44 वें अध्याय के 19 वें श्लोक में वैशम्पायन जी ने जनमेजय जी से कहा कि –
क्षयान्ता: निचया: सर्वे पतनान्ता: समुच्छ्रया: ।
संयोगा: विप्रयोगान्ता: मरणान्तं च जीवितम्।।
जो एकत्रित हो रहा है, वह एक न एक दिन अवश्य ही नष्ट होगा। जो भी ऊंचा है, वह एक न एक दिन अवश्य ही नीचे ही गिरेगा। जिससे जो मिला हुआ है, वह एक न एक दिन अवश्य ही अलग होगा। जो आज जीवित दिख रहा है, वह एक न एक दिन अवश्य ही मृत्यु को प्राप्त होगा।
(1) क्षयान्ता: निचया: सर्वे
आपको आंखों से जो भी दिखाई दे रहा है, कानों से जो भी शब्द सुनाई दे रहा है, जिस किसी वस्तु में, व्यक्ति में या स्थान में सुख प्राप्त हो रहा है, या दुख प्राप्त हो रहा है, जो भी धन सम्पदा, प्रभाव प्रतिष्ठा, सुन्दरता, अहंकार आदि दिखाई दे रहा है, और पेड़ पौधे, मनुष्य कीट पतंग आदि जो भी अर्थात जो भी आपके मन बुद्धि में एकत्रित करने के लिए आ रहा हो या एकत्रित दिखाई दे रहा हो, उस सबका अंत में क्षय ही होना है, नाश ही होना है।
समझ रहे हैं न!
यह घटना तो निश्चित ही होना है कि हर वस्तु का, हर व्यक्ति का नाश ही होना है। यही सत्य है। इसलिए किसी वस्तु को या धन सम्पत्ति को एकत्रित करने में जो स्त्री पुरुष अपना जीवन समाप्त कर देते हैं, और दूसरों को दुखी करके अपने आप को बड़ा बीर समझते हैं, बड़ा सफल व्यक्ति समझते हैं, उनको संसार का यह अकाट्य नियम स्मरण रखना चाहिए कि संसार में जो भी दिखाई दे रहा है, उसका नाश ही होना है तो क्यों न कुछ ऐसा करते जाएं कि सभी लोग मेरे मरने के बाद गाली न दें।
(2) पतनान्ता: समुच्छ्रया:
पहाड़ पेड़ , मकान आदि से लेकर आकाश तक जो भी कुछ ऊंचा दिखाई दे रहा है, या किसी व्यक्ति की उन्नति दिखाई दे रही है, कुछ समय के पश्चात् सबका नीचे की ओर ही पतन होगा। नीचे ही गिरेंगे। इसलिए अपनी कुछ थोड़ी बहुत उन्नति के अहंकार में आकर किसी निर्दोष निर्बल असहाय को सताना नहीं चाहिए। पता नहीं है कि कौन सा दिन, कौन सा क्षण अपने पतन और नाश का दिन है, या नाश का क्षण है।
(3) संयोगा: विप्रयोगान्ता:
जिसका जिससे आज संयोग है, उसका एक न एक दिन वियोग भी अवश्य ही होना है।
इस संसार में कोई भी किसी के साथ अनन्तकाल तक नहीं रह सकता है। क्योंकि संयोग के बाद वियोग ही होना है। आज सुख और स्वास्थ्य का संयोग हो रहा है, तो इस सुख और स्वास्थ्य का वियोग भी अवश्य ही होना है। पति पत्नी, माता पिता, भाई बन्धु बहिन रिश्तेदार, मित्र आदि जो भी मिले हैं, उनको एक न एक दिन अवश्य ही विछुडऩा है।
यहां तो वियोग के बाद संयोग और संयोग के बाद वियोग ही होना है। संयोग का अंत वियोग ही है। इसलिए संसार के नियमों को प्रत्यक्ष देखकर अधिक दुखी या अधिक सुखी नहीं होना चाहिए और न ही अहंकार करना चाहिए।
(4) मरणान्तं च जीवितम्
यहां जो भी आज जीवित दिखाई दे रहा है, उसका मरण ही अन्त है। क्योंकि कि आपकी आंखों के सामने ही अनेक जीवित पशु पक्षी मनुष्य आदि मरे हैं। जिनको आपने एक घंटे पहले या एक क्षण पहले जीवित देखा था वह आपकी आंखों के सामने ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। अब आप स्वयं ही विचार कर लीजिए कि जब यहां हर कोई जीवन जीते हुए अन्त में मर ही जाता है तो फिर आप के हृदय में ये विचार क्यों नहीं आता है कि एक न एक दिन मुझे भी अवश्य ही मरना ही है। यदि ये चार घटनाएं आपको समझ में आ जाएं तो आपके हृदय में संसार की प्रत्येक भोग्य और भोज्य वस्तु से वैराग्य हो जाएगा। अपनी मृत्यु का विचार करते ही सभी के प्रति राग ,द्वेष ,भय और मोह नष्ट होने लगेगा। वस्तुओं के नाश का विवेक, सम्बन्धियों के वियोग का विवेक तथा कुछ दिनों की उन्नति के विवेक से हृदय में वैराग्य जागृत होने लगेगा। वैराग्य से मोह निवृत्त होकर अन्त में भगवान की भक्ति की ओर मन जाने लगेगा। प्रत्यक्ष दिखाई देने पर भी, आंखों के सामने घटनाएं होने पर भी समझ में नहीं आता है। इसलिए बिना सद्गुरु के उपदेश के तथा शास्त्रों के अध्ययन के बिना तथा बिना सत्संग के समझ में नहीं आता है। समझिए, सोचिए, और मोह, शोक से बाहर आइए, फिर देखिए कि संसार में कितना आनन्द है।
जो फरा सो झरा, जो जला सो बुताना
जो पेड़ पर फूल फल पत्ते दिखाई दे रहे हैं, वे अवश्य ही झड़ेंगे और जो अभी दीपक आदि जल रहा है, वह अवश्य ही बुझेगा।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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