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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

लज्जा,धन,और प्राणों की रक्षा के लिए स्वामिनारायण भगवान की, देश छोड़ देने की आज्ञा

ये तो होना मुश्किल हैये तो होना मुश्किल है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीस्वामिनारायण भगवान ने अपने साधु भक्तों के लिए तथा गृहस्थ भक्तों के लिए आज्ञास्वरूप शिक्षापत्री ग्रंथ के 153 वें और 154 वें श्लोक में गृहस्थ भक्तों को इन विशेषपरिस्थितियों में जन्मभूमि को त्याग कर दूसरे स्थानों में जाने की आज्ञा देते हुए कहा कि –
दुष्कालस्य रिपूणां वा नृपस्योपद्रवेण वा।
लज्जाधनप्राणनाश: प्राप्त:स्याद् यत्र सर्वथा।।153।।
मूलदेशोह्यपि स स्वेषां सद्य एव विचक्षणै:।
त्याज्यो मदाश्रितै: स्थेयं गत्वा देशान्तरं सुखम्।।154।।
स्वामिनारायण भगवान ने अपने भक्तों को प्राणों तथा धर्म की रक्षा को प्रधान बताते हुए कहा कि – अपने निवास स्थान ग्राम, नगर, या देश में अकाल के कारण अन्न न प्राप्त हो रहा हो, या बलवान शत्रुओं के द्वारा प्राणहरण की आशंका बढ़ जाए, अथवा दुष्ट अधर्मी शाशक, राजा का उपद्रव बढ़ जाए, जिसके कारण अपने धर्मपालन करने में भी प्राणों के जाने का भय हो, ऐसी स्थिति में यदि अन्न के अभाव में तथा बलवान शत्रु के कारण प्राणों के जाने का भय लग रहा हो, अथवा अधर्मी अन्यायी शाशक राजा के कारण प्राण, धन और लज्जा इन तीनों का नाश होना निश्चित हो गया हो, तो अपना मूलदेश अर्थात जन्मभूमि ही क्यों न हो, उसका मोह छोड़कर ऐसे स्थानों पर चला जाना चाहिए, जहां प्राणों की रक्षा, तथा धन और धर्म की रक्षा हो सके।
इन तीन कारणों से अपनी जन्मभूमि का भी त्याग कर देना चाहिए।
(1) दुष्कालस्य
यदि अपने निवास स्थान ग्राम में या नगर में अकाल पड़ गया हो, अन्न के अभाव के कारण प्राणरक्षा करना असम्भव दिखाई दे रहा हो तो मेरे आश्रित भक्तों को प्राणों की रक्षा करने के लिए दूसरे देश में चला जाना चाहिए। क्योंकि जन्मभूमि तो स्थिर होती है। प्राणरक्षा हो जाएगी तो समय अनुकूल होने पर जन्मभूमि में पुन: लौटकर आया जा सकता है। किन्तु जन्मभूमि के मोह में प्राण ही चले गए तो जन्मभूमि का दुबारा दर्शन भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए विचक्षण अर्थात बुद्धिमान भक्तों को अपने धन की रक्षा, प्राणों की रक्षा तथा लज्जा अर्थात धर्म की रक्षा करना चाहिए। जड़ वस्तुएं तो कहीं भी प्राप्त हो जातीं हैं। किन्तु प्राण तथा लज्जा अर्थात धर्म का नाश होने पर पुन: प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। इसलिए धर्म और प्राण ये दोनों ही संसार की प्रत्येक वस्तुओं से अमूल्य हैं।
(2) रिपूणां वा
यदि अकाल न भी पड़ा हो,भोजन आवास की पूर्ण व्यवस्था भी हो, किन्तु किसी कारणवश ग्रामीण दुष्टों के साथ, या अपने परिवार के बन्धुओं के साथ अथवा रिश्तेदारों के साथ इतनी अधिक शत्रुता बढ़ गई हो कि प्राणहानि, धनहानि तथा लज्जाहानि अर्थात स्त्रियों के अपमान अपहरण आदि की आशंका हो गई हो तो भी अपनी जन्मभूमि या निवास स्थान को त्याग कर किसी ऐसे देश में स्थान में चला जाना चाहिए, जहां प्राणों की, धन की तथा माता बहिनों की सुखपूर्वक रक्षा हो सके।
(3) नृपस्योपद्रवेण वा
अपने देश में यदि कोई ऐसा अधर्मी, अन्यायी, दुष्ट शाशक राजा आ जाए, जो हमारे धर्म के पालन न करने का आदेश दे रहा हो, या किसी विपरीत अकल्याणकारी धर्म का आचरण करवा रहा हो, तो उसे शाशक का राजा का उपद्रव कहते हैं। अथवा किसी देश के शाशक ने अपने देश पर आक्रमण कर दिया हो, वह भी शाशकीय राजकीय उपद्रव कहा जाता है। यदि मनुष्य धर्म छोड़कर मात्र जीने की इच्छा से दूसरे धर्म को अपनाता है, या अपना धर्म ही छोड़ देता है, तो ऐसे मनुष्य का जीवन ही पशुजीवन है। जीवन और आजीविका तथा स्थान का मोह छोड़कर ऐसे राजा अर्थात शाशक के देश को ही त्याग देना चाहिए। किन्तु धन, धर्म लज्जा अर्थात नारियों की और प्राणों की रक्षा कर लेना चाहिए। धर्महीन जीवन से तो अच्छा यही है कि वन में पत्ते फल खाकर धर्म का पालन करते हुए शरीर त्यागना।
लज्जाधनप्राणनाश: प्राप्त: स्याद् यत्र सर्वथा
सर्वथा अर्थात पूर्णनिश्चित होना। जिस ग्राम, नगर, या देश में, लज्जा अर्थात स्त्रियों की रक्षा, धन की रक्षा तथा प्राणों की रक्षा न हो रही हो तो मेरे आश्रित भक्तों को क्या करना चाहिए?
त्याज्यो मदाश्रितै: स्थेयं गत्वा देशान्तरं सुखम्
भगवान श्री स्वामिनारयण ने कहा कि मेरे आश्रित भक्तों को ऐसे स्थान को तथा अधार्मिक शाशक को तथा ऐसे पारिवारिक सामाजिक शत्रु को त्याग कर किसी ऐसे देश में चला जाना चाहिए, जहां लज्जा की रक्षा, धन तथा धर्म की रक्षा सुखपूर्वक हो सकती हो। जन्मभूमि को तभी तक स्वर्ग से अधिक प्रिय मानना चाहिए, जब तक वहां धन, धर्म, नारी तथा प्राणों की रक्षा हो रही है। अन्यथा जन्मभूमि का मोह छोड़कर किसी अन्य सुरक्षित स्थानों में चला जाना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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