Please assign a menu to the primary menu location under menu

Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

अगम पुराण निगमागम ईश्वर को नेति नेति कहते हारते है। इसका क्या अर्थ है?

अगम पुराण निगमागम ईश्वर को नेति नेति कहते हारते है। इसका क्या अर्थ है?

जिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं हैजिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं है
Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, श्रीधाम वृन्दावन
नेति शब्द संस्कृत में ही कहा जाता है।
नेति, मेंं दो पद हैं। न + इति।गुण सन्धि करके नेति,ऐसा पद बनता है। न,अर्थात नहीं। इति,अर्थात ये,अथवा ऐसा। जैसे किसी बालक को गाय का का ज्ञान न हो, औऱ भैंस को देखकर कहे कि ये गाय है,तो आप कहेंगे कि नेति अर्थात ये गाय नहीं है। जब तक वह गलत बोले तब तक आप नेति,यह नहीं है,ऐसा कहते जाएंगे। अध्याय समाप्त होने पर भी इति ऐसा लिखा जाता है। इति के स्थान में इदम् शब्द अर्थात यह का भी प्रयोग किया जाता है।इति शब्द का इदम् शब्द पर्यायवाची शब्द है। अब इसका प्रयोग देखिए।केनोपनिषद के 1 खण्ड के 5,6, 7, 8 वें मन्त्रों मेंं इसकी चर्चा है। शिष्य ने गुरू जी से कहा कि यह मन, यह बुद्धि,यह प्राण ही ईश्वर है।यही ब्रह्म है, भगवान है। संसार में इनके अतिरिक्त और कोई नहीं है।तब गुरुदेव ने कहा कि न + इति,ये ही सब कुछ नहीं है।ये सब जड़तत्व है।इन सबका संचालक जो है,वही ब्रह्म है। उसी को आत्मा, ईश्वर,भगवान आदि शब्दों से वेद कहते हैं।उसे इस प्राकृतिक शरीर की इंन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता है।
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राण: प्रणीयते।
तदेव ब्रह त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते।।8।।
जो ब्रह्म तत्व प्राणों से नहीं चलता है,प्राण जिससे चलते हैं।उसी को तू ब्रह्म जान। नेदं ( नेति) यह प्राण ही ब्रह्म नहीं है,जिसको तुम ब्रह्म समझ रहे हो।जो मन के द्वारा नहीं जाना जा सकता है। मन को जो जानता है,वही ब्रह्म है,आत्मा है।तुम जिस प्रकृति निर्मित मन बुद्धि आदि को आत्मा मानते हो,वह आत्मा नहीं है।इन पांचों मन्त्रों मेंं नेदं शब्द का प्रयोग किया गया है।वही नेति का अर्थ है। इसलिए वेद पुराण आगम नेति नेति कहते हैं।क्यों कि अज्ञानी को तो संसार का व्यवहार औऱ व्यक्ति ही सबकुछ लगता है।लेकिन ये सत्य नहीं है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »