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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

व्रत उपवास में और भक्ति में इतना अंतर है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के छठवें स्कन्ध के तीसरे अध्याय के 32 वें श्लोक में धर्मराज यमराज ने अपने दूतों से कहा कि –
श्रृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहु:।
यथा सुजातया भक्त्या शुद्ध् येन्नात्मा व्रतादिभि: ।।
यमराज धर्मराज ने कहा कि व्रत , उपवास, तपस्या आदि नियम तो शरीर की साधना है। भूख, प्यास साधना शारीरिक साधना है। व्रत उपवास आदि के नियम पालने पर भी मन इतना शुद्ध नहीं हो पाता है । जितना कि भगवान श्री हरि के लीला चरित्रों के सुनने से तथा भगवान के अवतार कथाओं के गुणगान गाने से मन शुद्ध हो जाता है। भगवान के लीला चरित्र सुनने से तथा कहने से भगवान के प्रति भक्ति जागृत होती है। भक्ति के कारण मन द्रवीभूत हो जाता है। इसीलिए मन को संयमित करने का तथा शुद्ध करने का सबसे सरल उपाय तो बार बार भगवान की कथा करना तथा बार बार भगवान की कथा सुनना ही है।
शुद्धयेत् नात्मा व्रतादिभि:
मन को शुद्ध विचारों से पूर्ण करने के लिए तथा सदा ही अच्छे विचारों में प्रेरित करने के लिए ही व्रत उपवास आदि तप किए जाते हैं। व्रतों में कहे गए नियमों का पालन किया जाता है। किन्तु व्रत पूर्ण होते ही नियमों का पालन भी छोड़ दिया जाता है। नियमों के छूटते ही मन पुन: जैसा का तैसा होने लगता है। व्रतों में नियम तो होते हैं किन्तु ज्ञान की चर्चा नहीं होती है। नियमों को द्रढ़ता से पालन करने का निर्देश होता है। तथा नियमों के पालन न करने के अनेक प्रकार के दोषों का तथा हानि का भी भय लगा रहता है। यदि व्रतों के नियमों का पालन नहीं कर पाते हैं, और अचानक कोई आपत्ति विपत्ति आ जाती है तो मन में ऐसा ही लगता रहता है कि कहीं कोई न्यूनता तो नहीं रह गई है? कहीं कोई नियम तो भंग नहीं हो गया है ? इत्यादि भय बना रहता है। भयभीत मन को संतोष नहीं होता है। यमराज जी इसलिए कह रहे हैं कि भयभीत और संकुचित मन में पूर्ण शुद्धता नहीं रहती है।
जब मन , शुद्ध हो जाता है तो किसी भी प्रकार का भय, व्याकुलता आदि नहीं होते हैं।
तो यह मन शुद्ध और निर्भय कैसे होता है? तो देखिए –
भक्त्या सुजातया शुद्धयेत्
सुजात अर्थात उत्पन्न। भगवान के प्रति भक्ति उत्पन्न होती है , प्रेम होता है तो ही मन अच्छी प्रकार से शुद्ध होता है। भगवान के प्रति बढ़ती हुई भक्ति से, भगवान में श्रद्धा विश्वास बढऩे से निर्भीकता आती है। संसार में कहीं भी भय नहीं लगता है। यहां तक कि मरने का भी भय नहीं लगता है। संसार में हानि लाभ तो होता ही रहता है, ऐसा ज्ञान होने लगता है। इसलिए हानि होने पर भी लगता है कि जैसी भगवान की इच्छा।
भक्ति कैसे उत्पन्न होती है? तो सुनिए –
श्रृण्वतां गृणतां वीर्याण्युद्दामानि हरेर्मुहु:
भक्तों की रक्षा करते हुए, राक्षसों को मारकर संसार को निर्भय करते हुए भगवान के चरित्रों का श्रवण करने से आत्मविश्वास जागृत होता है कि भगवान ही अपने भक्तों को राक्षसों के भय से मुक्त करते हैं। तथा संसार के विविध प्रकार के जीवों का पालन पोषण भी भगवान ही करते हैं। भगवान के चरित्रों को बार बार सुनने से तथा कहने से मन में भक्ति जागृत होने लगती है। भगवान के प्रति विश्वास बढऩे लगता है। भगवान श्री हरि के चरित्र तथा उनके भक्तों के चरित्र विलक्षण सहनशक्ति से पूर्ण होते हैं। प्रह्लाद, ध्रुव, मीरा आदि भक्त चरित्र मन को भगवान की ओर आकर्षित करते हैं। इसलिए मन को शुद्ध करने का स्थायी उपाय तो भगवान की भक्ति ही है। भगवान की भक्ति में द्रढ़ करने का उपाय व्रत उपवास आदि हैं। व्रत उपवास आदि भी करें और भगवान की कथा भी सुनें और आपस में एक दूसरे को सुनाएं। अकेले व्रत उपवास से भगवान में श्रद्धा विश्वास रूप भक्ति जागृत नहीं होती है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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