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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

बिना वैराग्य के हरिभक्ति नहीं मिलती है

बिना वैराग्य के हरिभक्ति नहीं मिलती है

क्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया हैक्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड 120 वें दोहे में कागभुसुण्डि जी ने गरुड़ जी से वैराग्य को हरिभक्ति का साधन बताते हुए कहा कि थोड़ा आप भी मेरे इस सिद्धान्त पर विचार करके तो देखिए –
दोहा – बिरति चर्म असि ज्ञान मद,लोभ मोह रिपु मारि ।
जय पाइअ सो हरिभगति, देख खगेस बिचारि।।
कागभुसुण्डि जी ने कहा कि हे खगेश! गरुड़ जी! आप स्वयं ही विचार करके देख लीजिए। जबतक अन्दर के मद अर्थात तन, धन,वैभव ,बल से उत्पन्न अहंकाररूपी शत्रु को, लोभ अर्थात धनवृद्धि की लालसा को तथा शरीर के सम्बन्धी पति, पत्नी, भाई, बहिन, माता, पिता आदि के प्रति होनेवाली आत्मीयतारूप मोह, अर्थात मद, लोभ और मोह इन तीनों शत्रुओं को वैराग्य के चमड़े में रखी हुई ज्ञान की तलवार से इनका नाश नहीं करते हैं, इन पर विजय प्राप्त नहीं करते हैं, तबतक हृदय में हरिभक्ति कैसे जागृत होगी? अर्थात परम्परा प्राप्त गुरु से ज्ञान की प्राप्ति किए बिना, तथा संसार के पदार्थों से वैराग्य हुए बिना इस शरीर के अन्दर मद, लोभ और मोह का नाश नहीं हो सकता है। जबतक ये तीनों रहेंगे तबतक भगवान के प्रति भक्ति भी जागृत नहीं हो सकती है। हरि के प्रति भक्ति तो तभी जागृत होती है जब गुरु से प्राप्त असि अर्थात ज्ञान की तलवार से मद, लोभ और मोह पर विजय प्राप्त कर ली जाए तो हरिभक्ति हृदय में जागृत हो जाती है।
बिरति चर्म असि ज्ञान
बिरति अर्थात वैराग्य। असि अर्थात तलवार। ज्ञान की तलवार, वैराग्य की चर्म अर्थात म्यान में रखी हुई हो। बैराग्य से ज्ञान की रक्षा होती है। जैसे म्यान में रखी हुई तलवार सुरक्षित रहती है। जंग आदि नहीं लगती है। राग का अर्थ होता है आसक्ति। आसक्ति का अर्थ होता है, भोग्य पदार्थ के प्रति कामना। राग का पर्यायवाची शब्द है रति। रति रहित भाव को बिरति कहते हैं। अब थोड़ा अपनी पूजा, उपासना, पर बिचार करना चाहिए। शरीर से ही सम्बन्धित मोह है और शरीर से ही सम्बन्धित लोभ है, और शरीर से ही सम्बन्धित मद है। भगवान की भक्ति की प्राप्ति में मद, लोभ, और मोह प्रकृति ये तीनों गुण बाधक हैं। संसार भी इन तीनों गुणों से ही चलता है।
(1)मद
संसार के सभी स्त्री पुरुषों को सबसे पहले अपने शरीर के बल का, शरीर के रूप का, जाति कुल का, ही मद होता है। इसी मद के कारण सभी स्त्री पुरुष अपनी प्रतिष्ठा के लिए, यश के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहते हैं। इसी मद के कारण युद्ध, कलह आदि होते रहते हैं। यही संसार का स्वरूप है। जिसको ज्ञानी सद्गुरु प्राप्त नहीं होते हैं, उनका यह मद जन्म से मृत्यु पर्यंत सदा ही एक जैसा ही बना रहता है। अज्ञान के कारण सभी को मद बना रहता है। अज्ञान के कारण ही सभी जीवों को दुख प्राप्त होता है। मद के कारण सहनशक्ति नहीं रहती है। सारा संसार ऐसे ही चल रहा है। यदि ज्ञानी सद्गुरु की बात समझ में आ जाए और शिष्य इस शरीर के विज्ञान को तथा संसार के यथार्थ स्वरूप को समझ जाए तो उसको शरीर के प्रति ही मोह समाप्त होने लगता है। ज्ञानपूर्वक शरीर से मोह नष्ट होते ही मद समाप्त हो जाता है। इसी को वैराग्य कहते हैं। आन्तरिक ज्ञान जागृत होते ही सबसे पहले अपने शरीर के प्रति ही बिरति जग जाएगी। बिरति जगते ही संसार की सुन्दरता, संसार के स्वादिष्ट भोजन, संसार के व्यवहार के प्रति दूरी बनने लगेगी। संसार के प्रत्येक व्यवहार में ,परिवार में, रिश्तेदारों में एक दम्भ पाखण्ड जैसा दिखने लगेगा। बस, सारा मद अर्थात अहंकार समाप्त हो जाएगा। जब संसार की वस्तुओं का शरीर के द्वारा उपयोग होना बंद होने लगेगा तो एकान्त प्रिय लगने लगेगा। इसी का नाम वैराग्य है। अब ज्ञान सुरक्षित रहेगा। आपके ज्ञान को विचलित करनेवालों से सम्बन्ध ही समाप्त हो जाएगा। यही तो बिरति चर्म है। वैराग्य की म्यान है। वैराग्य ही आपके ज्ञान की तलवार की रक्षा करेगा।
(2) लोभ
संसार में जिसके पास अधिक धन होता है, वह भले ही चरित्रहीन हो,धर्महीन हो, सारे दुर्गुणों का भण्डार हो, किन्तु मानवसमाज उसका आदर सम्मान करता है। भयभीत रहता है। उसके धन का बल देखकर प्राय: सभी स्त्री पुरुषों को धनवृद्धि की लालसा हो जाती है। उसकी बुद्धि में यह बात बैठ जाती है कि जितना अधिक धन होगा, उतना ही अधिक प्रभाव और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। बस, इसी सामाजिक प्रतिष्ठा के लोभ के कारण ही सभी स्त्री पुरुष अपने धर्म कर्तव्य को छोड़कर विपरीत आचरण करने लगते हैं। इसी लोभ के कारण दूसरों के साथ धोखा करते हैं। अधिक धन प्राप्त होने से लोभवृत्ति का नाश नहीं होता है। जबतक यह लोभ रहेगा, तबतक हरिभक्ति के प्रति कोई भाव ही जागृत नहीं होंगे। ऐसे लोभ का नाश करने के लिए कोई ज्ञानी महापुरुष की संगति में रहा जाए और उनकी आज्ञानुसार चला जाए, तो ज्ञान जागृत होते ही धन के प्रति लोभ नष्ट हो जायेगा। धन से वैराग्य होते ही लोभ का भी विनाश हो जाएगा। जब ये हृदय, धनलोभ से , प्रतिष्ठा लोभ से रहित होगा तो हृदय खाली होते ही भगवान के प्रति अनुराग होने लगेगा।
(3) मोह
संसार में जितना भी जीवपालन दिख रहा है, वह सब मोह का फल है। सन्तानों का पालन पोषण सभी जीव करते हैं। पशु पक्षी कीट पतंग आदि सभी जीव मोह के कारण ही अपार दुख उठाते हैं,और अपनी सन्तान की रक्षा करते हैं। इस मद, लोभ, और मोह को मात्र मनुष्य ही समझ सकते हैं, और इनका नाश भी कर सकते हैं। इस सृष्टि में एकमात्र मनुष्य जाति ही ऐसी है कि इन प्राकृतिक गुणों का ज्ञान करके इनका त्याग भी कर सकती है। बिना ज्ञान के संसार का रहस्य पता नहीं चलता है। ज्ञानी गुरू की शरण ग्रहण किए बिना ज्ञान भी प्राप्त नहीं होता है। जबतक संसार के पदार्थों से, व्यक्तियों से तथा सांसारिक व्यवहार और वार्ता से दूर नहीं होंगे, तबतक ज्ञान में स्थिरता दृढ़ता नहीं आएगी। इसलिए ज्ञान, वैराग्य के बिना, न तो हरिभक्ति प्राप्त होती है और न ही स्थिर होती है , तथा न ही दृढ़ता आती है। स्वयं ही विचार करके देख लीजिए गरुड़ जी! भगवान के प्रति संदेह होना, क्या हरिभक्ति का लक्षण है? नहीं न!

RAM KUMAR KUSHWAHA
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