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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

बिना सत्कर्मों के भक्ति और ज्ञान दोनों नहीं मिलते हैं

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
शिवपुराण के उमाखण्ड के 51 वें अध्याय के 10 वें श्लोक में भगवान शिव जी ने भक्ति , ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति का क्रम बताते हुए कहा कि –
कर्मणा जायते भक्तिर्भक्त्या ज्ञानं प्रजायते।
ज्ञानात् प्रजायते मुक्तिरिति शास्त्रेषु निश्चय:।।
(1) कर्मणा जायते भक्ति:
शास्त्रोक्त कर्तव्य कर्म करने से हृदय में भगवान के प्रति भक्ति जागृत होती है। शास्त्रों में कहे गए ब्राह्मण के कर्मों को ब्राह्मण पालन करें, क्षत्रिय के लिए कहे गए कर्मों को क्षत्रिय पालन करें, वैश्यों के लिए कहे गए कर्मों को वैश्य पालन करें और शूद्र के लिए कहे गए कर्मों को शूद्र पालन करें। शास्त्रों में कहे गए जाति धर्मों को पालन करते हुए साथ साथ भगवान की भक्ति भी करते जाएं, सत्संग भी करते जाएं। सद्गुरु की सेवा भी करते जाएं।
ये तो जाति के अनुसार कर्म हैं।
इसके बाद सम्बन्धों के अनुसार कर्तव्य का पालन करें। स्त्री अपने पत्नी, माता तथा पुत्रबधु होने का कर्तव्य पालन करें। पुरुष अपने पुत्र, पिता तथा पति होने का कर्तव्य पालन करें। शास्त्रों में कहे गए यही कर्तव्य ही कर्म शब्द से कहे गए हैं। शास्त्रों में कहे गए सत्कर्मों के फल में विश्वास होता है तो ही कर्मनिष्ठा होती है। कर्मनिष्ठ स्त्री पुरुष ही भगवान के लिए व्रत ,उपवास ,जप ,तप आदि कर्म करते हैं। यदि शास्त्रोक्त कर्म करते हैं तो शास्त्रोक्त फल भी प्राप्त होता है। इसलिए कहा गया है कि कर्म से भगवान में भक्ति उत्पन्न होती है।
(2) भक्त्या ज्ञानं प्रजायते
भगवान की भक्ति से भगवान के स्वरूप का तथा आत्मा के स्वरूप का और इस जगत के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है। इन तीनों के यथार्थ ज्ञान मूल है भक्ति , तथा भक्ति प्राप्ति का साधन है कर्म।कर्तव्य कर्म में दृढ़ता होती है , तभी तो भक्ति में दृढ़ता आएगी।
(3) ज्ञानात् प्रजायते मुक्ति:
जब भगवान के गुणों का ज्ञान, तथा आत्मा के और जगत के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है, तभी इस विशुद्ध ज्ञान से जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त होती है। अर्थात जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना इतना सरल नहीं है। मात्र आत्मा की चर्चा करने से आत्मा की अनुभूति नहीं होती है। जैसे खट्टा मीठा आदि शब्दों के बोलने से जीभ में स्वाद का अनुभव नहीं होता है। रोटी दाल आदि कहने से भोजन से तृप्ति नहीं होती है। कर्म करना ही होगा, तभी कुछ प्राप्त होता है। बिना कर्म किए तो शरीर में भी कोई वस्तु उपस्थित नहीं होती है।
इति शास्त्रेषु निश्चय:
ऐसा ही शास्त्रों का निश्चय है और निर्णय है।
कोई स्त्री पुरुष अपने कर्तव्य को त्याग कर अपनी इच्छा के अनुसार कोई भी उपासना, पूजा या कर्म करते हैं, तो उनको अपने अशास्त्रीय कर्मों से न तो सन्तोष होता है और न ही इच्छित फल की प्राप्ति होती है। इसलिए शास्त्रों के ज्ञाता कर्मनिष्ठ, ब्रह्मनिष्ठ, महापुरुष को ही गुरु के रूप में वरण करना चाहिए। कर्म में संदेह होने पर ज्ञानी गुरू ही मार्गदर्शन करा सकते हैं। तथा मोक्षमार्ग का पथिक बना सकते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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