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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

अच्छे लोग, किसी के कहने पर भी गलत काम नहीं करते हैं

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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के 139 वें अध्याय के 8 वें और 9 वें श्लोक में द्रोणाचार्य जी ने दुर्योधन को पाण्डवों से सन्धि करने के लिए समझाते हुए कहा कि –
वार्यमाणोह्यपि पापेभ्य: पापात्मा पापमिच्छति।
चोद्यमानोह्यपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छति।।8।।
द्रोणाचार्य जी ने दुर्योधन से कहा कि हे दुर्योधन! तुम स्वभाव से दुष्ट और पापबुद्धि के व्यक्ति हो। भीष्म पितामह, विदुर तथा श्री कृष्ण के समझाने पर भी नहीं समझ रहे हो, और न ही इन ज्येष्ठ श्रेष्ठ पुरुषों की बातों का आदर कर रहे हो।
तुम्हारे आचारणों से तथा पाण्डवों के आचरणों से एक बात तो निश्चित हो गई कि –
वार्यमाणोह्यपि पापेभ्य: पापात्मा पापमिच्छति
जो स्त्री पुरुष जन्म से ही दुष्ट स्वभाव के होते हैं, उनको पाप करने से रोकने पर भी, वह पाप ही करना चाहते हैं। अर्थात जो स्त्री पुरुष स्वभाव से दुष्ट होते हैं, उनको दयालु नहीं बनाया जा सकता है। जो लोभी लालची स्वभाव के होते हैं, उनको उदार नहीं बनाया जा सकता। जो स्वभाव से ही दुर्गुणी व्यक्ति होते हैं, उनको पाप करना सिखाना नहीं पड़ता है। बड़े होकर मृत्युपर्यंत वे पाप का ही आचरण करते रहते हैं। सबकुछ नष्ट होने पर भी उसका मन पाप करने का ही विचार करता है।
अब अच्छे स्वभाव के स्त्री पुरुषों को देखिए –
चोद्यमानोह्यपि पापेन शुभात्मा शुभमिच्छता
शुभ कार्य करने की इच्छा करनेवाले पुण्यात्मा स्त्री पुरुषों को पाप करने के लिए कोई कितना भी प्रेरित करे तो वे पापकर्म के लिए प्रेरित करने पर भी पाप करने के लिए तैयार नहीं होते हैं।
द्रोणाचार्य जी ने पाण्डवों का उदाहरण देते हुए कहा कि –
मिथ्योपचारिता ह्येते वर्तमाना ह्यनुप्रिये।
अहितत्वाय कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम।। 9।।
हे दुर्योधन! तुमने पाण्डवों के साथ कितना अत्याचार नहीं किया है? कितना मिथ्याचार अर्थात धोखा नहीं दिया है? द्रौपदी के चीरहरण से लेकर अभी तक कितना कितना बुरा नहीं किया है? फिर भी वे पाण्डव तुम्हारे साथ किसी भी प्रकार से बुरा नहीं करना चाहते हैं। तुम्हारा हित ही करना चाहते हैं। वे युद्ध करके अनेक निरपराध योद्धाओं का विनाश नहीं चाहते हैं। पाण्डवों के पास तुमसे युद्ध करने के अनेक कारण हैं। किन्तु तुम्हारे पास, पाण्डवों से युद्ध करने का एक भी कारण नहीं है। पाण्डवों के स्वभाव को देखकर यही लगता है कि जिन स्त्री पुरुषों के स्वभाव जन्म से अच्छे होते हैं, वे किसी के कहने पर भी पाप और दुष्टता करने के लिए तैयार नहीं होते हैं। तथा जिनका स्वभाव जन्म से ही क्रूर दुष्ट होता है, वह रोकने पर भी पाप करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं।
अहितत्वाय कल्पन्ते दोषा भरतसत्तम
हे भरतवंशी दुर्योधन! तुम्हारे ईष्र्या द्वेष आदि दोष तो तुम्हारा ही अहित करेंगे। अर्थात अब तुम्हारे दोष ही तुम्हारे विनाश का कारण बनेंगे। अर्थात इस सृष्टि में जिन स्त्री पुरुषों का स्वभाव पाप करने का होता है, बेईमानी करने का स्वभाव होता है, घूस चोरी आदि का स्वभाव होता है, वे रोकने पर भी, दण्डित करने पर भी, मरते दम तक पापमय आचरण ही करते रहते हैं। इनको दण्ड देकर भी नहीं बदला जा सकता है। जिन स्त्री पुरुषों का स्वभाव ही परोपकारी, दयालु, आदि गुणों से युक्त होता है, उनको सिखाने पर भी प्रेरित करने पर भी पाप नहीं करवाया जा सकता है। जो ईमानदार है, वह जीवनपर्यंत ईमानदारी ही करता है और जो बेईमान है, वह जीवनपर्यंत बेईमानी ही करता रहता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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