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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

गुरू की सेवा करने से भगवान क्यों प्रसन्न होते हैं?

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के 10 वें स्कन्ध के 80 वें अध्याय के 34 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने सुदामा जी से गुरु की सेवा का फल बताते हुए कहा –
नाहमिज्याप्रजातिभ्यां तपसोपशमेन वा।
तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशुश्रूषया यथा।।
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे सुदामा! मैं सर्वभूतात्मा हूं। सभी प्राणियों का आत्मा मैं हूं । कोई मनुष्य सभी प्राणियों को मेरा ही स्वरूप मानकर यज्ञ के द्वारा प्राणियों की सेवा करता है तो मैं प्रसन्न होता हूं। ऐसा नहीं है कि मैं प्रसन्न नहीं होता हूं। कोई स्त्री पुरुष जप तप करते हैं, उससे भी प्रसन्न होता हूं। उपशम अर्थात इन्द्रियों के संयम सहित तपस्या से भी प्रसन्नता होती है। जीवों की सेवा के लिए कुआं, तालाब, आदि के सहित भूमि दान करते हैं, तो भी प्रसन्न होता हूं। क्योंकि कोई धन दान करने में समर्थ है, तो कोई तपस्या करने में समर्थ है, जो जिस सत्कर्म करने में समर्थ है, वह वो सत्कर्म करता है तो मैं प्रसन्न तो होता ही हूं।
किन्तु मैं, जितना अधिक प्रसन्न गुरु की सेवा करनेवाले से होता हूं, उतना प्रसन्न, धन से जीवों की सेवा करनेवाले से नहीं होता हूं।
अब देखिए कि गुरुसेवा से भगवान क्यों प्रसन्न होते हैं?
श्रीमद् भागवत के 11 वें स्कन्ध के 17 वें अध्याय के 27 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव जी से कहा कि –
आचार्यं मां विजानीयात् नावमन्येत कर्हिचित्।
न मत्र्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरु:।।
आचार्यं मां विजानीयात्
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि इस संसार में मनुष्यों को शास्त्रों का ज्ञान देने के लिए तथा धर्म का आचरण कराने के लिए मैं ही आचार्य, गुरु के रूप में अवतरित होता हूं। इसलिए गुरु को साक्षात् मेरा ही स्वरूप मानना जानना चाहिए।
नावमन्येत कर्हिचित्
कभी भी गुरू की अवमानना अवहेलना नहीं करना चाहिए।
न मत्र्यबुद्ध्यासूयेत्
गुरू को अपने जैसा साधारण मनुष्य नहीं मानना चाहिए। असूया अर्थात गुणों में दोष देखना। गुरु में दोष नहीं देखना चाहिए। गुरू के परिवार के सम्बन्धी, पुत्र पत्नी, भाई, पिता आदि के अज्ञानी या दुराचारी होने पर अपने गुरु को दोषी नहीं मानना चाहिए। पारिवारिक विषमता देखकर गुरु में दोष देखना ही असूया है।
गुरु में दोष क्यों नहीं देखना चाहिए? तो सुनिए –
सर्वदेवमयो गुरु:
क्योंकि जिस गुरू से ज्ञान प्राप्त होता है, उस गुरु में सभी देवता निवास करते हैं। क्योंकि मैं ही गुरु के रूप में संसार में आकर मनुष्यों को ज्ञान प्रदान करता हूं। सभी देवता मुझमें निवास करते हैं, और मैं ही गुरु हूं, इसीलिए सभी देवमयस्वरूप गुरु है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि गुरु की सेवा से मैं ही प्रसन्न होता हूं। क्योंकि मैं गुरु के रूप में विराजमान होकर संसार को ज्ञान देता हूं। लेकिन ध्यान रहे – शास्त्रों के ज्ञान से रहित, वैराग्य और भक्ति से रहित, मात्र भगवान के नाम को आगे करके बेषभूषा बनाकर धन, वैभव, एकत्रित करने के लिए शिष्य बनानेवाले तो सामान्य मनुष्य ही हैं। भगवान ही जिस गुरु के रूप में विराजमान होते हैं, वे गुरु तो वास्तव में भगवान जैसे ही होते हैं। उनका त्याग, तप, भक्ति और ज्ञान आदि सभी प्रकार के गुण सामने ही दिखाई देते हैं। इस माया के बाजार में असली के रूप में नकली भी अनेक रूपों को धारण करके असली जैसा ही लगता है। जो जौहरी होता है, वह करोड़ों कंकणों के बीच में पड़े हुए मैले कुचैले हीरे को पहचान लेता है। शिष्य को जौहरी के समान होना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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