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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

इस दोष के कारण आप, गुरु और भगवान की महिमा नहीं जान सकते हैं

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भगवद्गीता के 11 वें अध्याय के 41 वें और 42 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण के विश्वरूप का दर्शन करने के पश्चात् भगवान के स्वरूप को न जानने का पश्चात्ताप करते हुए क्षमा मांगते हुए कहते हैं कि –
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं, हे कृष्ण हे यादव हे सखेति।
अजानता महिमानं तवेदं
मया प्रमादात् प्रणयेन वापि।। 41।।
अजानता महिमानं तवेदम्
अर्जुन ने कहा कि हे नाथ! आज आपके इस दिव्य स्वरूप को देखकर आपकी महिमा का ज्ञान हुआ है। जब आप मेरे साथ रहते थे तो मैं आपकी महिमा को बिल्कुल ही नहीं जानता कि आप कौन हैं और कैसे हैं? आपकी महिमा को न जानने के कारण मुझसे बहुत बहुत अपराध हो चुके हैं।
अपराध क्या हुए हैं ?तो सुनिऐ –
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तम्
मैं आपको भगवान नहीं समझता था, मैं तो आपको अपना अच्छा सखा, मित्र मानता था इसीलिए –
हे कृष्ण हे यादव हे सखेति
मैं आपको सदा ही आपको नाम लेकर बुलाता था। कभी हे कृष्ण! कहता था, तो कभी हे यादव ! हे सखा! कह देता था। अनेकबार नाम लेता था, जो मुझे नहीं लेना चाहिए था। मुझे ही आपकी बात मानना चाहिए थी, किन्तु आप ही मेरी बात मानते रहे ,और मैं हठ पूर्वक मनवाता रहा। किन्तु इसमें आपका दोष नहीं है भगवन्! मेरा ही दोष है कि मैं आपको नहीं पहचान पाया और न ही आपकी महिमा को जान पाया।
किस दोष के कारण नहीं जान पाए? तो बताते हैं?
मया प्रमादात् प्रणयेन वापि
प्रमाद के कारण और प्रणय अर्थात प्रेम के कारण आपके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान नहीं हो पाया। बस,यही प्रमाद ही, यही सम्बन्ध प्रेम ही भगवान और गुरु की महिमा को जानने नहीं देता है। एक महापुरुष के साथ रहकर भी इस मनुष्य को यह ज्ञान नहीं हो पाता है कि गुरु के हृदय में क्या है? भगवान के हृदय में क्या है? मात्र शरीर के सम्बन्ध को ही देख पाते हैं।
अब अर्जुन के हृदय की बात आगे के श्लोक में देखिए –
यच्चावहासार्थमसत्कृतोह्यसि
विहारशय्यासनभोजनेषु।
एकोह्यथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।। 42।।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोह्यसि
अर्जुन के हृदय में आज श्री कृष्ण भगवान के प्रति किए गए अपने व्यवहार के कारण अपार ग्लानि हो रही है। अर्जुन ने कहा कि हे नाथ! अवहासार्थ अर्थात हंसी मजाक में , विनोद विनोद में आपका मैंने अनेक बार अनादर किया है। असत्कार किया है। आपका ही मजाक बनाया है।
एकोह्यथवाप्यच्युत तत्समक्षम्
कभी तो हम दोनों ही अकेले थे, अथवा सभी के समक्ष भी अनेक बार आपको अपमानित किया है। आपकी बात को काटा है। अनेक बार तो आपकी बात ही नहीं मानी है। फिर भी आप मेरी ओर देखकर मुस्कराते हुए मेरी ही बात मानते रहे। मैं अपमान करता रहा और आप चुपचाप सहते रहे! आज आपका स्वरूप देखकर मेरे मन में बहुत ग्लानि हो रही है। धिक्कार भावना जागृत हो रही है कि मैं आपके साथ क्या क्या व्यवहार करता रहा।
अब अर्जुन स्थान गिना रहे हैं।
विहारशय्यासनभोजनेषु
विहार अर्थात खेल में, एकसाथ विचरण करने में, शय्या अर्थात एकसाथ सोने में, आसन अर्थात एकसाथ बैठने उठने में, तथा भोजन करने में, अनेकबार मैं ही ऊपर आगे होता रहा। आप नीचे बैठ गए और मैं ऊपर बैठा रहा। अनेकबार मैं आसन में और आप बिना आसन के बैठे रहे। कहां तक गिनाऊं और क्या क्या गिनाऊं?
हे नाथ! अब तो एक ही प्रार्थना है बस, –
तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्
मेरे पास तो अब आपसे क्षमा माँगने के अतिरिक्त और कोई दूसरा उपाय ही नहीं है। आप अप्रमेय अर्थात असीम हैं, अनन्त हैं। इसलिए आप मेरे इस प्रमाद और अज्ञान के कारण जो जो अपराध हो चुके हैं, उनको आप क्षमा कर दीजिए। अर्जुन को आज जब भगवान के स्वरूप का ज्ञान हुआ, तब अपने व्यवहार पर अति अति ग्लानि हो रही है। किन्तु अब करे क्या? जो हो गया सो हो गया। इसी प्रकार जब कोई गुरु को, माता पिता को या किसी सच्चे हितैषी को श्रेष्ठतम होते हुए भी नहीं समझ पाते हैं तो उनके जाने के बाद मात्र पश्चात्ताप ही शेष रहता है। इसलिए समय रहते गुरु की महिमा को समझ लीजिए, भगवान की महिमा समझ लीजिए। अन्यथा समय और गुरु के चले जाने के बाद कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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