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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

सत्कर्म नहीं करेंगे तो न करने का भी फल मिलेगा

ये जड़ प्रकृति,बिना भगवान के न स्वयं बनती है, और न ही कुछ बना सकती हैये जड़ प्रकृति,बिना भगवान के न स्वयं बनती है, और न ही कुछ बना सकती है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत के 6 वें स्कन्ध के 11 वें अध्याय के 35 वें श्लोक में भगवान व्यास जी ने परीक्षितपुत्र जनमेजय जी को कलियुग के दोषों से बचने के लिए उपाय बताते हुए कहा कि –
सर्वं युगबलं राजन् वेदितव्यं विजानता।
प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्मविशेषत:।।
भगवान व्यास जी ने कहा कि हे जनमेजय! वर्तमान में स्त्री पुरुषों के जो कुछ भी विपरीत आचरण दिखाई दे रहे हैं, वे सब कलियुग के प्रभाव के कारण हो रहे हैं, ऐसा बुद्धिमान व्यक्ति को समझकर मौन रहकर शान्त होकर,मन न लगने पर भी प्रयत्नपूर्वक धार्मिक सत्कर्म करते रहना चाहिए।
सर्वं युगबलं राजन् वेदितव्यं विजानता
भगवान व्यास जी ने कहा कि आपके पिता परीक्षित जी ने जो ऋषि के गले में सर्प डाल दिया था, वह सब युग का बल ही समझना चाहिए। अर्थात आपको अपने पिता के इस विपरीत कर्म का विचार करके पिता के प्रति अश्रद्धा नहीं करना चाहिए। सभी युगों में ऐसे ही मनुष्य होते हैं। ऐसे ही पशु पक्षी, वनस्पति, नदी, तालाब, समुद्र आदि सबकुछ ऐसे ही होते हैं, जैसा आज वर्तमान में दिखाई दे रहा है। अन्तर मात्र इतना हो जाता है कि सतयुग के स्त्री पुरुषों के मन बुद्धि में मात्र सत्य ही सत्य होता है। कोई भी असत्य बोलकर अपने आप को लज्जित नहीं करता है। अपने अपने कर्तव्यों का सभी निर्वाह करते हैं। किसी को भी नहीं कहना पड़ता है कि सत्य बोलो, असत्य मत बोलो। सभी सत्य ही बोलते हैं। सभी सत्कर्म ही करते हैं।
सतयुग में सभी स्त्री पुरुष धर्मपरायण होते हैं।
त्रेता में स्त्री पुरुष, धर्म और अर्थ (धन)परायण होते हैं।
द्वापर युग में स्त्री पुरुष धर्म अर्थ (धन ) और काम (भोग) परायण होते हैं।
कलियुग में स्त्री पुरुष मात्र अर्थ (धन) और काम (भोग) परायण होते हैं।
सभी युगों के अनुसार ही स्त्री पुरुषों का स्वभाव और आचरण हो जाता है। इसलिए बुद्धिमान स्त्री पुरुषों को शास्त्रों का उपदेश सुनना चाहिए। विद्वान ब्राह्मण को ही गुरु के रूप में स्वीकार करना चाहिए। समय समय पर अपने गुरु से व्रत, उपवास, उपासना आदि के विषय में शास्त्रीय विधान पूंछते रहना चाहिए तथा प्रयत्न पूर्वक यथाशक्ति आचरण भी करना चाहिए।
प्रयत्नेन हि कर्तव्यं धर्मकर्मविशेषत:
धर्म के चार चरण होते हैं।
(1) सत्य
(2) दान
(3) दया
(4) तप
जहां तक बने तो कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए। जितना कर सकते हैं, उतना ही बोलना चाहिए। जो बोला है, उसको करना भी चाहिए। इसी को सत्य कहते हैं। सत्य असत्य तो मनुष्य ही बोलते हैं। पशु पक्षियों के लिए शास्त्रों में विधान नहीं किया जाता है। मनुष्य जाति के विकृत होने से ही पशु पक्षियों का तथा वनस्पति का विनाश होता है। प्रकृति का नाश तो मनुष्य जाति के जीव ही करते हैं। अपने द्वार में आए हुए जीवों को यथाशक्ति भोजन, जल आदर आदि देना ही दया है। अपने भोजन आवास आदि से अधिक धन होने पर वेदवेत्ता विद्वान ब्राह्मणों को यथाशक्ति धन, गाय सोना आदि देना, दान कहा जाता है। अल्पमति स्त्री पुरुषों के वचनों को सहते हुए यथाशक्ति व्रत,उपवास, नियम आदि का पालन करना तप कहा जाता है। इन सत्य, दान, दया और तप में कलियुग के स्त्री पुरुषों का मन लगाने पर भी नहीं लगता है।
इन चारों के विपरीत दुर्गुणों में ही मन लगता है।
अर्थात सत्य को छोड़कर असत्य में, दया को छोड़कर क्रूरता, दुष्टता निर्दयता में, दान को छोड़कर धन एकत्रित करने में,और तप अर्थात सहन करना छोड़कर युद्ध करने में, लडऩे में ही आज के स्त्री पुरुषों का मन जाता है। इसलिए व्यास जी ने कहा कि कलियुग के स्त्री पुरुषों का मन, धर्म और सत्कर्म के विपरीत ही चलता है। इसलिए प्रयास करते रहना चाहिए कि मन, धर्म और सत्कर्म में लगाते रहें। भगवान की कथा श्रवण करना चाहिए। इन सब साधनों को करते रहने से ही विवाद से, लड़ाई से, निंदा स्तुति से बच सकते हैं। यदि कुछ सत्कर्म नहीं करेंगे तो कलियुग का इतना अधिक प्रभाव बढ़ जाएगा कि इस छोटी सी आयु में ही पुलिस, वकील, जेल, डाक्टर, आदि के चक्कर लगा लगा कर धन और तन दोनों का नाश होता रहेगा। अपने ही समाज में बदनामी होने लगेगी। अधिक दुष्टता करेंगे तो कोई न कोई मार ही डालेगा। इसलिए कलियुग के चलते फिरते साक्षात स्वरूप दुष्टों और दुर्गुणों से बचने के लिए भगवान की भक्ति तथा भागवतादि पुराणों शास्त्रों का स्वाध्याय, और यथाशक्ति आचरण करते रहना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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