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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

एक गृहस्थ को माता पिता की सेवा छोड़कर मात्र संतों की सेवा करना धर्म नहीं है

एक गृहस्थ को माता पिता की सेवा छोड़कर मात्र संतों की सेवा करना धर्म नहीं है

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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
स्वामीनारायण भगवान ने अपने आश्रित गृहस्थों को माता पिता तथा गुरु की सेवा की आज्ञा देते हुए शिक्षापत्री के 139 वें श्लोक में कहा कि –
यावज्जीवं च शुश्रूषा कार्या मातु: पितुर्गुरो:।
रोगार्तस्य मनुष्यस्य यथाशक्ति च मामकै:।। शिक्षापत्री, 139।।
मेरे गृहस्थों को अपने माता पिता की सेवा तथा गुरु की सेवा यावज्जीवन करना चाहिए। तथा रोगी स्त्री पुरुषों की सेवा भी यथाशक्ति करना चाहिए। गृहस्थों को संतों का संग करते करते अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए, अपितु संसार के विषयों से विरक्त होना चाहिए । सत्संग से अन्तर्वासना का नाश करना चाहिए। किन्तु अपने कर्तव्य का पालन भी करना चाहिए। कुछ ऐसे श्रद्धालु गृहस्थ होते हैं कि संतों की वाणी सुन सुन कर तथा भगवान की कृपा कथा, लीलाचरित्र सुन सुनकर संसार के प्रत्येक व्यवहार से विरक्त होने लगते हैं। पत्नी का पालन पोषण करते हुए तथा अपनी संतानों का भरण पोषण करते हुए तीर्थयात्रा भी करते हैं और यथाशक्ति धन, अन्न, वस्त्र आदि का दान भी करते हैं। इतना सबकुछ पवित्र कार्य करते हुए भी, हृदय में भगवान के प्रति तथा संतों के प्रति निष्ठावान होते हुए भी अपने माता पिता की उपेक्षा कर देते हैं। माता पिता दुखी रहते हैं, औषधि के लिए, तथा सेवा के लिए तरसते रहते हैं। स्वामिनारायण भगवान ने अपने आश्रित गृहस्थों को धर्म का यथार्थ मर्म समझाते हुए कहा कि
यावज्जीवं च शुश्रूषा कार्या मातु: पितुर्गुरो:
यावज्जीवम् अर्थात जब तक माता पिता का जीवन शेष है, तथा पुत्र का जबतक जीवन शेष है, तथा गुरु जी का जीवन भी जबतक शेष है, तबतक सभी गृहस्थों को अपने माता पिता तथा ज्ञानप्रदाता , भगवान की भक्ति प्रदाता गुरु की औषधि से, धन से तथा शरीर से इन तीनों की सभी प्रकार से सेवा करना चाहिए , यही गृहस्थ स्त्री पुरुषों का सर्वप्रथम धर्म है। कोई गृहस्थ स्त्री पुरुष यदि अपने माता पिता की सेवा को छोड़कर संतों की सेवा बहुत श्रद्धा से भी करता है तो भगवान को ऐसी सेवा स्वीकार्य नहीं है। भगवान भी ऐसे कर्तव्यविमुख श्रद्धालु से प्रसन्न नहीं होते हैं।
रोगार्तस्य मनुष्यस्य यथाशक्ति च मामकै:
किसी भी जाति का, किसी भी देश का तथा किसी भी आयु का रोगी व्यक्ति मिल जाए तो उसकी भी यथाशक्ति धन, औषधि आदि से सेवा करना चाहिए। अर्थात गृहस्थ धर्म मात्र इतना ही नहीं होता है कि आप पति और पिता बन गए तो बस, अपनी पत्नी का ध्यान रखें, और अपनी सन्तानों का ध्यान रखें। यदि माता पिता सभी प्रकार से समर्थ हैं, और वे प्रसन्नता से आपको अपनी पत्नी तथा सन्तानों का विशेष ध्यान देने के लिए कहते हैं तो भी एक पुत्र का कर्तव्य है कि वह माता पिता की स्थिति परिस्थिति का समाचार लेता रहे। वर्ष में अनेक बार उनके पास आता जाता रहे। माता पिता तो आपको खुश देखकर ही खुश रहते हैं। आप उनका बार बार समाचार और आवश्यकता ही पूंछते रहेंगे, तो इतने से ही प्रसन्न रहते हैं। किन्तु आवश्यकता पडऩे पर पुत्र और शिष्य को चाहिए कि अपने माता पिता की तथा गुरू की तन मन धन से पूर्ण रूप से समर्पित होकर सेवा करे। अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करनेवाले गृहस्थ से भगवान तो सहज में ही अतिप्रसन्न हो जाते हैं। यदि आप विरक्त साधु हो गए हैं तो यावज्जीवन अपने गुरु की सेवा करना शिष्य का परमधर्म है। इनकी सेवा को भगवान के भजन का विघ्न नहीं मानना चाहिए। माता पिता तथा गुरु की सेवा भी भगवान का ही भजन मानना चाहिए। भगवान की आज्ञा स्वरूप धर्म का पालन करने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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