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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

एक क्षण के ज्ञान में मन एक क्षण के लिए ही शान्त होता है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के किष्किन्धा काण्ड के 7 वें दोहे की 13 वीं और 14 वीं चौपाई में तुलसीदास जी ने वानरराज सुग्रीव के क्षणिक ज्ञान का फल बताते हुए कहा कि –
पहले ज्ञान होने कारण देखिए
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती।
बालि बधब इन्ह भइ परतीती।
हनुमान जी ने सुग्रीव जी से श्रीराम जी को मिला तो दिया किन्तु सुग्रीव जी को यह विश्वास नहीं हो रहा था कि ये बाली को मार सकेंगे।
सुग्रीव जी ने दुन्दुभि दानव के अस्थिपञ्जर को दिखाते हुए कहा कि इसको बाली ने मारा था। इसके पहाड़ जैसे अस्थिपञ्जर को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि बाली कितना बलवान होगा!
भगवान श्री राम जी ने बिना परिश्रम के ही उठाकर फेंक दिया।
अब ये चौपाई है कि –
देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती
जब सुग्रीव जी ने श्री राम जी के अनन्तबल को देख लिया तब श्री राम जी पर ये विश्वास हुआ कि –
बालि बधब इन्ह भइ परतीती
हां, अब विश्वास हो गया कि श्री राम जी, बालि का बध कर सकते हैं। ठीक है न! समझते जाइएगा। भगवान भी कहें कि चिन्ता नहीं करना, हम तो हैं, तो भी किसी को विश्वास नहीं होता है। क्योंकि कहने मात्र से तो कोई विश्वास नहीं करता है। जो विश्वास दिला रहा है, उसे करके भी दिखाना पड़ेगा।
क्योंकि इस चौपाई के पहले ही 10 वीं चौपाई में श्री राम जी ने सुग्रीव जी से कहा था कि –
सखा सोच त्यागहु बल मोरे।
सब बिधि घटब काज मैं तोरे।।
भगवान ने कहा था कि सुग्रीव जी! आप चिन्ता न करो। मेरे ऊपर छोड दो। मेरा विश्वास करो, मैं आपके सभी कार्य कर दूंगा। सारे दुख दूर कर दूंगा। ऐसा कहने मात्र से सुग्रीव जी को विश्वास नहीं हो रहा था। जब दुन्दुभी के अस्थिसमूहों को श्री राम जी ने उठा कर फेंक दिया, तब विश्वास हुआ कि हां, अब विश्वास हुआ कि बाली को मार सकते हैं।
व्यक्ति की क्रिया को देखकर ही अनुमान लगता है कि कार्य सफल होगा कि नहीं? मात्र बातें करने से विश्वास नहीं होता है।
अब चलिए, उस क्षणिक ज्ञान का फल देख लीजिए!
इतना सब होने के बाद, सुग्रीव जी के विश्वास का फल बताते हुए तुलसीदास जी 15 वीं चौपाई में कहते हैं कि –
उपजा ज्ञान बचन तब बोला।
नाथ कृपा मन भयउ अलोला।।
सुग्रीव जी ने जब श्री राम जी के अनन्तबल को देख लिया, तब उनके बल का ज्ञान हो गया और बोला कि –
नाथ कृपा मन भयउ अलोला
लोल अर्थात चंचल, और अलोल अर्थात शान्त। हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन शान्त हो गया। जैसे ही एक क्षण के लिए ज्ञान उपजा अर्थात मन में जागृत हुआ तो तुरन्त लगने लगा कि ये सारा संसार व्यर्थ है।
ज्ञान का सर्वप्रथम फल यह है कि संसार ही व्यर्थ दिखने लगता है, और भगवान का भजन सार्थक लगने लगता है।
सुग्रीव जी राम जी से 16 वीं और 17 वीं चौपाई में बोले कि –
सुख संपति परिवार बड़ाई।
सब परिहरि करिहउं सेवकाई।।
ए सब राम भगति के बाधक।
कहहिं संत तव पद अवराधक।।
हे भगवान! संसार का सारा सुख, परिवार और मान सम्मान, सबकुछ छोडक़र आज से आपकी सेवा करूंगा। ये सब आपकी भक्ति के बाधक हैं। आपके चरणों की सेवा करनेवाले संत जन ऐसा कहते हैं। एक क्षण के ज्ञान में संसार व्यर्थ दिखने लगा और ऐसा लगने लगा कि सबकुछ छोडक़र आपकी सेवा करूंगा। किन्तु ये ज्ञान स्थिर नहीं हो सका।
बाली के मरने के बाद और राज्य पाने के बाद सुग्रीव अपनी माया में ऐसे तल्लीन हो गए कि श्री राम जी की खबर ही भूल गए। जब लक्ष्मण जी को भेजा, तब आकर बोले कि क्या करूं नाथ! आपकी माया में तो बड़े बड़े महात्मा ऋषि मुनि फंस जाते हैं, मैं तो बंदर हूं।
आपका ज्ञान वैराग्य भी कुछ ऐसा ही है। जब दुख पड़ता है तो सुग्रीव जी के समान मारे मारे फिरते हैं। जबकोई दुख दूर करनेवाले महात्मा ,विद्वान ब्राह्मण मिल जाते हैं तो बिना परीक्षा के विश्वास नहीं करते हैं। जब महात्मा विद्वान आपकी परीक्षा में सफल हो जाते हैं तो थोड़ी देर के लिए ज्ञान और वैराग्य दोनों ही आ जाते हैं। जैसे ही दुख दूर करनेवाले से दूर हो जाते हैं तो फिर वह ज्ञान और प्रतिज्ञा सबकुछ भुलाकर फिर से वही करने लगते हैं जिसके कारण दुख हुआ था। जब भगवान फिर से नाराज होकर कुछ हलचल मचा देते हैं, तब फिर माया को दोष देकर स्वयं को कमजोर बताते हुए ऋषि मुनियों का उदाहरण देकर निर्दोष साबित करने में लग जाते हैं।
ज्ञान और वैराग्य तथा भक्ति को स्थिर करना इतना सरल नहीं है। इनको स्थिर करने के लिए सत्संग और स्वाध्याय तथा संतों गुरुओं की सेवा निरन्तर होना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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