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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

शासक की पक्षपात पूर्ण राजनीति अन्तर्कलह उत्पन्न करती है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के सञ्जययान पर्व के 26 वें अध्याय के 9 वें श्लोक में धर्मराज युधिष्ठिर ने संजय से कहा कि –
स्वयं राजा विषमस्थ: परेषु, सामस्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु।
यथात्मन: पश्यति वृत्तमेव, तथा परेषामपि सोह्यभ्यपैतु ।।
युधिष्ठिर ने कहा कि हे सञ्जय! देखो तो, महाराज धृतराष्ट् को! स्वयं तो भेदभाव करते हैं और दूसरों से चाहते हैं कि वह हमारे साथ समानता का व्यवहार करें।
स्वयं राजा विषमस्थ: परेषु,
शासक तो सभी के लिए समान होता है। किन्तु वे स्वयं ही विषमता पूर्ण व्यवहार कर रहे हैं। हमारे प्रति जो व्यवहार कर रहे हैं और दुर्योधन आदि के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं, वह एक जैसा नहीं है, सारा संसार देख रहा है।
हमें कहा जाता है कि आप राज्य से बाहर रहकर ही कुशलता से रहेंगे। किन्तु दुर्योधन के द्वारा किए गए दुव्र्यवहार को अन्याय को एक भी बार सभा में नहीं कहते हैं। इस प्रकार स्वयं तो भेदभावपूर्ण व्यवहार करते हैं।
सामस्थ्यमन्विच्छति तन्न साधु
किन्तु दूसरों से चाहते हैं कि ये हमसे समानता का बर्ताव करें । किन्तु ये तो अच्छा नहीं है।
यथात्मन: पश्यति वृत्तमेव।
जैसा व्यवहार किसी से अपने प्रति करवाना चाहते हैं,
तथा परेषामपि सोह्यभ्यपैतु
वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ आपको स्वयं भी करना चाहिए।
ये संसार व्यवहार से चलता है , प्रेम से चलता है, नियम से चलता है तथा सुखपूर्वक चलता है और दुखपूर्वक भी चलता है। जनता के व्यवहार में तो भेद आपस में भले ही हो, होता ही है, किन्तु एक शासक का भेदभावपूर्ण व्यवहार करना उचित नहीं होता है। अपराध करनेवाले के प्रति कठोरता होती है तो वह कठोरता ही होना चाहिए। भले ही वह अपना ही पुत्र, भाई, या किसी भी प्रकार का सम्बन्धी क्यों न हो। अपराधी को अपराधी की दृष्टि से ही देखना, ये शासक की समानता की दृष्टि है। जिसका जो अधिकार है, वह उसको प्राप्त होना ही चाहिए, यदि किसी का अधिकार किसी को दिया जाता है तो यह शासक की विषमता ही है। यह समानता नहीं है। अन्याय और अनीति है। सहन करनेवाले को दुर्बल कर दिया जाए और दुव्र्यवहार करनेवाले का पक्ष लिया जाए तो भला वह किससे न्याय मांगने जाएगा? शासक की विषमतापूर्ण दृष्टि से ही जनता में अन्तर्कलह बढ़ता है। बढ़ता हुआ अन्तर्कलह शासन को विपरीत दिशा में ले जाता है। शासक की पक्षपात पूर्ण राजनीति से न तो राष्ट्र की उन्नति होती है और न ही ऐसे व्यवहार से शासक कभी जनता का प्रिय होता है। यदि पिता ही अपने पुत्रों में भेदभाव करने लगता है तो वह अपने घर परिवार को बिखरने से नहीं बचा सकता है, तो देश राष्ट्र की तो बात ही क्या है? इसलिए शासक को समानता का बर्ताव ही करना चाहिए। दूसरों से उदारता का व्यवहार चाहिए तो स्वयं को भी उदारता का व्यवहार करना चाहिए। शासक का भेदभावपूर्ण व्यवहार और अन्यायपूर्ण नीति, ये दोनों ही शासक के लिए तथा देश के लिए हितकारी नहीं है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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