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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

जिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं है

जिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं है

जिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं हैजिनके पास सबकुछ है, वास्तव में उन्हीं के पास कुछ नहीं है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के 1 स्कन्ध के दूसरे अध्याय के 26 वें श्लोक में सूत जी ने शौनकादि ऋषियों से कहा कि –
मुमुक्षव: घोररूपान् हित्वा भूतपतीनथ।
नारायणकला: शान्ता: भजन्ति ह्यनुसूयव:।।
जो स्त्री पुरुष संसार के इस अनादि अनन्त संसार के अनन्त प्रकार के दुखों से सदा के लिए मुक्त होना चाहते हैं, उनको मुमुक्षु कहते हैं। ऐसे मुमुक्षु स्त्री पुरुष भगवान नारायण की कलाएं हैं। शान्तस्वरूप होते हैं। वे तो भगवान नारायण का ही भजन करते हैं। शनि, राहु आदि भयानक ग्रहों का तथा संसार के दुखरूप सुखों को देनेवाले, कभी प्रसन्न होकर सुखदेनेवाले तथा कभी क्रुद्ध होकर दुख देनेवाले इन भयानक भूतपतियों अर्थात संसार के स्वामी देवताओं आदि का भी भजन नहीं करते हैं। इन सांसारिक सुखों के दाताओं को त्यागकर भगवान नारायण को छोड़कर किसी देवताओं की भी उपासना व्रत, उपवास आदि पूजा नहीं करते हैं।
इसको थोड़ा समझना होगा
जिन महात्माओं के पास तथा जिन ब्राह्मणों के पास संसार की सभी सुविधाएं दिखाई दे रही हैं, जनता उसी को सबसे अच्छा ज्ञानी महापुरुष मानते है। उनके पास जाकर उनसे आशीर्वाद की कामना से अनेक प्रकार के कष्ट उठाते हैं। उनकी बताई गई उपासना पद्धति को अपनाते हैं, धन खर्च करते हैं, फिर भी न तो मानसिक शांति मिलती है और न ही इच्छा के अनुसार कुछ सुख सम्पत्ति ही मिलती है। जैसे सभी स्त्री पुरुष तृष्णालु, श्रद्धालु होते हैं, उतने ही वैसे ही उनके वैभवशाली महात्मा आदि भी तृष्णालु और श्रद्धालु होते हैं। ऐसी सुख शान्ति की भूखी जनता ही वहां जाकर उनको धन देकर चली आती है, फिर उसको धनवान ,विद्वान ज्ञानी महापुरुष आदि शब्दों से कहने लगती है। भगवान के भक्तों को तथा ज्ञानियों को पहचानना इसीलिए तो कठिन है। क्योंकि वे महात्मा ज्ञानी जन, भगवान के अतिरिक्त संसार के किसी भी व्यक्ति से, किसी भी स्थान से, या किसी भी पदार्थ से, किसी भी प्रकार का सम्बन्ध ही नहीं रखना चाहते हैं। क्योंकि उनको संसार का अस्थिर नाशवान सुख चाहिए ही नहीं। संसार की प्रत्येक वस्तु का सम्बन्ध भी सुख और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होने से ही है। शारीरिक सुख तथा सामाजिक प्रतिष्ठा ही नहीं चाहिए, तो वे भला संसार से क्यों सम्बन्ध बनाएंगे वे तो यहां के प्रत्येक वस्तु से तथा प्रत्येक व्यक्ति से मुक्त होना चाहते हैं। जो मुक्ति ही चाहते हैं, वे भला क्यों किसी देवता की पूजा, उपासना, व्रत उपवास आदि करेंगे अर्थात जो सच्चे संत हैं, उनको, न तो इस दुखी जनता से कोई लेना देना है, और न ही जनता की सेवा चाहिए, न ही जनता से सम्मान चाहिए, तथा न ही जनता धन वैभव आदि चाहिए। भगवान नारायण के ऐसे ही मुमुक्षु भक्त ही भगवान की कलाएं कहे जाते हैं। ऐसे भक्त ही जिनका चाहें, उसका कल्याण करने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुष संसार के सुख देने में भी समर्थ होते हैं तथा संसार से मुक्त करने में समर्थ होते हैं। शेष वैभवशाली दिखाई देनेवाले तो वैसे ही होते हैं, जैसे सामान्य स्त्री पुरुष होते हैं। ममुक्षु भक्त तो भगवान नारायण के ही अनन्यभक्त होते हैं। भगवान के भक्तों में दो गुण प्रधान होते हैं-
(1) शान्ता:
(2)अनुसूयव:
(1) उनके हृदय में परम शांति होती है। क्योंकि जब कुछ चाहिए ही नहीं तो उनके मन को विचलित भी कौन कर सकता है अर्थात जिसको कुछ चाहिए, उसी का मन अशान्त रहता है। वस्तु प्राप्त भी हो जाती है तो उसकी रक्षा के लिए मन अशान्त रहता है। अधिक वस्तु पाने के लिए भी अशान्त रहता है। भगवान के मुमुक्षु भक्तों को भगवान नारायण के अतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए, इसलिए उनके घर, वस्त्र, वैभव सुविधाएं आदि सांसारिक वस्तुएं ही क्यों होंगीं। परमवैराग्य, परमज्ञान तथा परमशान्ति आदि गुण ही होंगे। भोजन, आवास, आदि का भी कोई सम्बन्ध नहीं होता है। जो मिला, जहां मिला, जैसा मिला, लिया तो लिया, नहीं तो नहीं। इसीलिए वे शान्त हैं।
(2) असूया अर्थात ईष्र्या,
और अनसूया अर्थात ईष्र्या द्वेष रहित होते हैं। हमारे पास ये नहीं है, उसके पास है, हमारे पास भी यही होना चाहिए, इस कामना को असूया कहते हैं। भगवान नारायण परायण भक्त के हृदय में ऐसी कामना भी नहीं होती है। इसलिए अनसूया रहती है। असूया होती ही नहीं है। इन दोनों गुणों के कारण ही वे किसी भी शनि राहु आदि ग्रहों से लेकर इन्द्रादि देवताओं तक की उपासना भक्ति भी नहीं करते हैं। क्योंकि कि जब कुछ चाहिए ही नहीं है और पास में कुछ है ही नहीं है तो भला ये देवता और ग्रह सभी क्रोधित होकर क्या नष्ट कर देंगे नष्ट करने के लिए कुछ तो होना चाहिए। एकमात्र शरीर ही है। उससे भी मुक्ति ही चाहिए। वो भी चला जाए तो क्या है चला जाए तो चला जाए,किन्तु भगवान नारायण ही चाहिए और न ही कोई देवता चाहिए और न ही संसार चाहिए। न ही पुन: जन्म चाहिए और न ही पुन: मृत्यु चाहिए। न ही अपनी इच्छा से जीवित हैं और न ही अपनी इच्छा से मरना है। जबतक हैं, तो भगवान का ही भजन करते रहेंगे। भगवान के अतिरिक्त किसी का भजन भी नहीं करना है। ऐसे मुमुक्षु अनन्यभक्तों को पहचानने की शक्ति इन सांसारिक भोगियों में नहीं होती है। भगवान नारायण के अनन्यभक्तों को पहचानना ही अतिकठिन है। अतिदुर्गम है। संसार के लोग जिनकी सम्पत्ति सुख वैभव प्रभाव को देखकर पीछे पीछे भाग रहे हैं, वास्तव में उनके पास ऐसा कुछ भी स्थायी उपाय नहीं होता है कि वे मनुष्य को सदा के लिए ऐसा सुखी कर दें कि फिर कभी कोई दुख ही न मिले।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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