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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

ऐसी वृत्ति होना बहुत कठिन है, यदि ऐसी वृत्ति हो जाए तो कभी दुखी नहीं होंगे

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के आश्वमेधिक पर्व के 47 वें अध्याय के 8 वें श्लोक में वैशम्पायन व्यास जी ने जनमेजय जी को वास्तविक सुख प्राप्त करने की युक्ति बताते हुए कहा कि –
यो न कामयते किञ्चित् न किञ्चिदवमन्यते।
इह लोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते।।
जो स्त्री पुरुष शारीरिक मानसिक सुख प्राप्त करने की किसी भी प्रकार की कामना नहीं करते हैं, तथा कुछ भी सुखदायी वस्तु प्राप्त होने पर उसका तिरस्कार भी नहीं करते हैं। अर्थात स्वीकार कर लेते हैं। दुखदायी व्यक्ति, दुखदायी वस्तु या दुखदायी स्थान प्राप्त होने पर भी स्वीकार कर लेते हैं और दुखी नहीं होते हैं। सुखदायी वस्तु, सुखदायी व्यक्ति या सुखदायी स्थान प्राप्त होने पर भी सुख की कामना नहीं करते हैं तथा दुखदायी वस्तु, या दुखदायी व्यक्ति या दुखदायी स्थान प्राप्त होने पर दुख का अनुभव नहीं करते हैं। ऐसे आत्मचिंतक सहज वृत्ति के स्त्री पुरुष इस संसार में रहते हुए भी, सभी प्रकार के व्यवहार करते हुए भी ब्रह्म के समान निर्लिप्त रहते हैं। वे साक्षात् ब्रह्म ही हैं। अब इस विलक्षण वृत्ति पर बहुत विचार करने योग्य है।
यो न कामयते किञ्चित्
संसार में सभी शरीरधारी जीवों के शरीर में परिवर्तन होता है। बाल्यावस्था में खेलने की कामना होती है। युवावस्था में स्त्री को पुरुष की कामना होती है तथा पुरुष को स्त्री की कामना होती है। मनुष्य जाति के शरीर में सुन्दरता, असुन्दरता, सुगन्धि, दुर्गन्धि, कोमल कठोर आदि सभी प्रकार का ज्ञान सभी को होता है। जो जो शरीर के अनुकूल होता है, सुखदायक लगता है, उन सभी वस्तुओं की कामना होती है। जो जो व्यक्ति, मन को प्रसन्न रखनेवाले होते हैं, उनकी कामना होती है। जो जो स्थान और आचरण सुखदायक और अनुकूल लगते हैं, उन सबकी बार बार कामना होती है। अर्थात संसार में जितने भी प्रकार की क्रियाएं, व्यापार या निर्माण तथा संग्रह दिखाई देता है, वह सब कामनाओं का परिणाम है। कामनाओं की पूर्ति के लिए ही पाप और पुण्य होते हुए दिखाई दे रहे हैं। अच्छे बुरे सभी प्रकार के स्त्री पुरुषों की भीड़ दिखाई दे रही है। संसार में ऐसी स्त्री मिलना दुर्लभ है, जिसने संसार के स्वरूप को जानकर कामनाओं का त्याग कर दिया हो। तथा ऐसा पुरुष भी मिलना अति दुर्लभ है, जिसने संसार के स्वरूप को जानकर कामनाओं का त्याग कर दिया हो। संसार में रहते हुए भी, परिवार में रहते हुए भी, तथा शरीर के सभी प्रकार के कार्य करते हुए भी अपने मन को, चित्त को तथा बुद्धि को ब्रह्मतत्त्व में लीन रखना इतना सरल तो नहीं है।
जैसे आप सभी स्त्री पुरुष, भगवान की मूर्ति के सामने बैठे हुए भी, पूजा करते हुए भी, उनकी कथा सुनते हुए भी, भगवान की कथा करते हुए भी, आपका मन निरन्तर संसार के कार्यों का स्मरण करता रहता है, बुद्धि विचार करती रहती है, चित्त भी उसी का चिन्तन करता है। पूजा भी चलती रहती है। संसार में फंसे हुए मन में न तो भगवान की पूजा बाधा पहुंचाती है और न ही भगवान की कथा बाधा पहुंचाती है। आप अपने कार्यों को यथावत करते रहते हैं और यथावत सोचते रहते हैं। न तो भगवान से मिलने की कामना जागृत होती है और न ही सबकुछ त्याग कर भक्ति की कामना जागृत होती है। अर्थात संसार के कार्य करते हुए भगवान सम्बन्धी कामना जागृत नहीं होती है। ठीक इसी प्रकार किसी सद्गुरु की कृपा से, या अनेक जन्मों की साधना से या पुण्यों से, या भगवान की अहैतुकी कृपा से, कैसे भी एकबार इस संसार के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हृदय में स्थिर हो जाए, तथा आत्मा के यथार्थ स्वरूप का अनुभव हो जाए तो निश्चित ही है कि आपको इस संसार की किसी भी वस्तु की कामना नहीं होगी, न ही किसी व्यक्ति से मिलने की इच्छा होगी, तथा न ही किसी स्थान विशेष की इच्छा जागृत होगी। कुछ भी, किसी भी प्रकार की इच्छा ही नहीं होगी। कोई भी वस्तु सुखदायक दुखदायक ही नहीं लगेगी। मात्र शरीर ही बचेगा। मन बुद्धि चित्त सभी अपने अपने कर्म से निवृत्त होकर कर्म करते रहेंगे। न तो इस संसार का दुख, दुख जैसा लगेगा और न ही इस संसार का सुख, सुख जैसा लगेगा। क्योंकि जो होता ही नहीं है तो लगेगा भी कैसे जो मिल गया सो ठीक है, और जो नहीं मिल गया तो भी ठीक है। नष्ट हो गया तो ठीक है, तथा वर्तमान में है, तो भी ठीक है।
ऐसी वृत्ति बनाने के लिए ही सभी शास्त्रों का उपदेश और उद्देश्य है ।न तो कुछ पकडऩा है और न ही कुछ छोडऩा है। न तो कुछ चाहिए और न ही किसी भी प्रकार की हानि है। जो वस्तुएं जीवनोपयोगी जैसीं थीं, वे वैसीं हैं और वैसी ही रहेंगीं। आप उसका उपयोग करो या न करो। शरीर का उपयोग करेंगे तो उपयोग होने लगेगा और उपयोग नहीं करेंगे तो उपयोग नहीं होगा। सबकुछ तो आपके ही हाथ में है। तन, मन, बुद्धि आदि के सहित सम्पूर्ण शरीर का स्वामी तो आत्मा ही है।
इह लोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते
इस संसार में सबके मध्य में रहते हुए भी ज्ञानी महापुरुष ब्रह्मस्वरूप ही रहते हैं । चैतन्यस्वरूप ही रहते हैं । दुखदायक अवस्था में रहते हुए भी आनन्दस्वरूप रहते हैं। यही तो ब्रह्म का सच्चिदानन्दस्वरूप है। वही तो आत्मा का स्वरूप है। इस संसार में ज्ञान होना ही दुर्लभ और दुर्गम है। ऐसी वृत्ति होना ही कठिन है किन्तु असम्भव तो नहीं ही है। महात्माओं की ऐसी वृत्ति, निरन्तर आत्मचिन्तन से, भगवच्चिन्तन से तथा शास्त्रों के स्वाध्याय से, और सद्गुरु की कृपा से, भगवान के अनुग्रह से हुई है। आज भी ऐसे महापुरुष वर्तमान में विद्यमान हैं। आपकी भी ऐसी वृत्ति हो जाएगी। किन्तु वैसा ही करिए, जैसा इन महात्माओं ने किया है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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