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Tuesday, May 28, 2024
धर्म कर्म

ये जड़ प्रकृति,बिना भगवान के न स्वयं बनती है, और न ही कुछ बना सकती है

ये जड़ प्रकृति,बिना भगवान के न स्वयं बनती है, और न ही कुछ बना सकती हैये जड़ प्रकृति,बिना भगवान के न स्वयं बनती है, और न ही कुछ बना सकती है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के द्वितीय स्कन्ध के 5 वें अध्याय के 32 वें और 33 वें श्लोक में ब्रह्मा जी ने नारद जी को ब्रह्माण्ड उत्पत्ति तथा की जड़रूपता बताते हुए भगवान को इस ब्रह्माण्ड का कर्ता बताते हुए कहा कि –
यदैतेह्यते भावा: भूतेन्द्रिय मनोगुणा:।
यदायतननिर्माणे न शेकुब्र्रह्मवित्तम।।31।।
(1)सम्पूर्ण प्रकृति का कारण काल,((2) जन्म का कारण कर्म, (3)परिणाम का कारण स्वभाव उत्पन्न होने के बाद (1)आकाश,(2)वायु (3)तेज, ((4) जल (5) पृथिवी ये पांच महाभूत उत्पन्न हुए। इन पांचों महाभूतों से शरीर की आंख, नाक, कान, जिह्वा, त्वचा, हाथ, पैर, लिंग, गुदा, वाणी ये दसों इन्द्रियां भी उत्पन्न हुईं। मन और शब्द, स्पर्श, रूप रस गन्ध भी उत्पन्न हुए, किन्तु ये सभी जड़ प्रकृति हैं। इनमें चेतना न होने के कारण अपने आप कोई क्रिया नहीं हो रही थी। सब एक दूसरे के विरोधी गुणवाले होने के कारण कुछ भी निर्मित नहीं हो रहा था।
यदायतननिर्माणे न शेकुब्र्रह्मवित्तम
ब्रह्मा जी ने कहा कि हे नारद जी! ये सब भगवान की माया से निर्मित होने पर भी स्वयं ही मिलकर अपनेआप शरीर का निर्माण नहीं कर सकते थे। क्योंकि जड़ पदार्थ में क्रियाशक्ति तो है किन्तु किसी चेतन के बिना जड़ पदार्थ में विद्यमान कोई भी क्रिया अपने आप नहीं हो सकती है। भगवान ने अनेकरूपों में होने की इच्छारूप अपनी माया से स्वयं में निवास करनेवाले काल अर्थात समय को उत्पन्न किया। काल, कर्म, तथा स्वभाव, ये तीनों ही भगवत्प्रेरणा से उत्पन्न हुए।
(1)काल:=
काल अर्थात समय। रात और दिन स्वरूप काल से सत्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुण रूप प्रकृति में क्रिया उत्पन्न हुई। अर्थात काल से परिणाम हुआ।
(2) स्वभाव:
स्वभाव से कर्म उत्पन्न हुआ है।
(3) कर्म से जीवों का अनेकयोनियों में जन्म हुआ। कर्म ही जन्म का कारण है।
किन्तु ये भी सभी जड़ ही हैं। कर्म भी जड़ है। अर्थात भगवान और जीव ही चेतन हैं, शेष सबकुछ जड़ ही है। जब सभी पदार्थ अपनेआप मिलकर किसी को निर्मित नहीं कर पाए तब –
तदा संहृत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिता:।
सदसत्त्वमुपादाय चोभयं ससृजुह्र्यद:।।32।।
भगवच्छक्तिचोदिता:
तब भगवान की सत् असत् शक्ति से प्रेरित होकर निर्मित सभी पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश,अपने अपने सीमित अंशों में मिले। तब कहीं जाकर शरीर का निर्माण हुआ। पंचमहाभूत मिले, इन्द्रियां और मन क्रियाशील हुआ। योनियों के अनुसार स्वभाव हुआ, स्वभाव के अनुसार कर्म हुए। काल के अन्तर्गत सभी ब्रह्माण्ड हुए और काल के अन्तर्गत ही बढ़कर नष्ट होते रहते हैं। आप एकबार स्वयं ही विचार करके देख लीजिए कि आपके घर में जितनी भी उपयोगी अनुपयोगी वस्तुएं हैं, उनको आप ही एक स्थान से दूसरे स्थानों में लाते हैं और ले जाते हैं। आप ही उनको साफ सुथरा रखते हैं। यहांतक कि शरीर को भी आप ही नहलाते धुलाते हैं। खिलाते पिलाते हैं। कपड़ा पहनाते हैं। यदि आप कुछ भी नहीं करें तो आपका शरीर भी मेज कुर्सी, झाड़ू आदि वस्तुओं के समान ही पड़ा पड़ा सड़ जाएगा। इस संसार में जब कोई भी शारीरिक क्रियाएं भी अपने आप नहीं हो सकतीं हैं तो भला इतना बड़ा ब्रह्माण्ड बिना ईश्वर के अपनेआप कैसे हो जाएगा? और फिर क्यों हो जाएगा? अपने आप को बुद्धिमान माननेवाले अल्पमति के पदार्थविज्ञानी मनुष्य कहते हैं कि सबकुछ अपने आप ही हो रहा है, इसमें भगवान और ईश्वर की सत्ता मानने की क्या आवश्यकता है? अरे भाई! इतनी बुद्धि लगाकर मिसाइलें, मोबाइल, बिजली आदि सबकुछ अपने आप क्यों नहीं हो गया? आपने कुछ किया है, तभी तो हुआ है न? इसी प्रकार संसार के सभी पदार्थ तथा उनकी शक्ति, तथा उनका सम्मिलन, निर्माण, नाश आदि करनेवाले भगवान ही हैं। इस विज्ञानबुद्धि को उत्पन्न करनेवाले भी भगवान ही हैं। आपकी विकासक, विनाशक बुद्धि करनेवाले भगवान ही हैं। भगवान की सत्ता , ईश्वर की सत्ता न माननेवाले अपना और दूसरों का विनाश ही कर सकते हैं, विवेक नहीं कर सकते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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