Please assign a menu to the primary menu location under menu

Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

भय तो दुष्टों को भी लगता है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के लंकाकाण्ड के 18 वें दोहे की 9 वीं और 10 वीं चौपाई में लंका में अंगद के प्रवेश करते ही लंकावासी राक्षस भय के कारण आपस में चर्चा करते हुए कहते हैं कि –
अब धौं कहा करिहि करतारा।
अति सभीत सब करहिं बिचारा।।
वालिपुत्र अंगद ने लंका में निर्भय होकर जैसे ही प्रवेश किया तो सभी राक्षस और राक्षसियां अंगद को देखते ही चिन्ता मग्न होकर भय के कारण बिचार करने लगे कि –
अब धौं कहा करिहि करतारा!
अब पता नहीं विधाता क्या करनेवाला है एक वानर आया था तो उसने लंका में आग लगाकर सारी लंका को दरिद्र बना दिया था। दैनिक जीवन का सारा सामान अग्नि में भस्मसात् कर गया था। गर्भवती नारियों के गर्भ भी गिरा गया था। अभी तो शान्ति से भोजन वस्त्र की भी व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। अभी तो अच्छे से व्यस्थित ही नहीं हो पाए थे कि ये दूसरा बंदर आ गया।
अब पता नहीं है कि ये आकर अब क्या करेगा
आगे की 10 वीं चौपाई में राक्षसों का भय तो देखिए –
बिनु पूंछे मग देहिं दिखाई।
जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
मेघनाद के ब्रह्मपाश में बंधे हुए हनुमान जी को तो इनने बहुत लात घूंसे मारे थे। पूंछ में आग लगाने के पहले पूरी लंका में हनुमान जी को घुमाया गया था। लेकिन आज वही राक्षस अंगद को देखते ही रावण की सभा का मार्ग बिना पूंछे ही बताने लगे हैं।
जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई
वालिपुत्र अंगद के देखने का कुछ ऐसा ढंग था कि जैसे सिंह किसी हिरण की ओर देखता है। अंगद जिसकी ओर देख देते हैं, वह खड़े खड़े सूख जाता है। बड़े मुश्किल से अंगुली उठाकर रावण की सभा का मार्ग दिखा देते हैं। सत्य और असत्य में यही अंतर है। एक सत्य जब बलवान असत्य में आग लगा देता है तो शेष असत्य बिना बल लगाए ही सत्य को स्वीकार कर लेते हैं। सज्जनों को लगता है कि ये दुष्ट पुरुष है, इसकी सह लेने में ही भलाई है। बस, इसी विचार से वह कमजोर पड़ जाता है। किन्तु जब कोई सज्जन धर्मात्मा बीरता पूर्वक दुष्ट व्यक्ति का सामना करके उसके सहायकों का सम्पत्ति का नाश करने में लग जाता है तो कितना भी बड़ा बलवान दुष्ट हो, उसका कोई भी साथ नहीं देता है। उसके सेवक उसका साथ छोडक़र अपने अपने बालबच्चे सम्हालने में लग जाते हैं। जो धर्म का आचरण करते हुए भी कायर है, ऐसे धर्मात्मा को राक्षस खा जाते हैं। धर्म किसी को कायर और दुष्ट नहीं बनाता है। जो व्यक्ति धर्मात्मा होते हुए भी दुष्ट है, वह दुष्ट ही है, धर्मात्मा नहीं है। तथा जो व्यक्ति कायर होते हुए भी धर्मात्मा है, वह कायर ही है, वह भी धर्मात्मा नहीं है। इन दोनों को धर्म का ज्ञान नहीं होता है। भगवान श्री राम जी ने धर्मात्मा होकर भी बीरता का परिचय दिया है। रावण ने तथा रावण के अनुयायी राक्षसों ने तपस्या करके, लंका में वेदपाठ करके तथा यज्ञ आदि करके भी दुष्टता का परिचय दिया है। आज सारी लंका के राक्षसों को नींद नहीं आ रही है। भोजन वस्त्र मकान सब जलकर राख हो गए हैं। सारी लंका सोने की थी, आज वहां दरिद्रता और भय तथा चिन्ता का राज्य चल रहा है। रावण का राज्य समाप्त हो गया है। धर्म का ढोंग बताकर दुष्टता करनेवाले को दुष्ट ही मानना चाहिए, धर्मात्मा नहीं मानना चाहिए। एक सच्चे धर्मात्मा को आत्मरक्षा के लिए तथा धर्म की रक्षा के लिए, हानि पहुंचाने वाले दुष्ट से लडऩे में कोई संकोच या भय नहीं होना चाहिए। ऐसी बीरता से लडऩा चाहिए कि दुष्टों की नींद उड़ जाए। उसकी सम्पत्ति और सहयोगी ही तो उसका बल है। उसका सबकुछ नष्ट हो जाता है तो वह एक दरिद्र असहाय अनाथ के समान निर्बल हो जाता है। यही तो धर्मात्मा का बल और बीरता है कि वह दुष्ट को जड़ से उखाडक़र नष्ट कर देता है। चाहे रामायण का रावण देख लो और चाहे महाभारत के कौरव देख लो। दोनों का नाश बीर धर्मात्माओं ने ही किया है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »