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Tuesday, May 28, 2024
धर्म कर्म

शत्रुपक्ष का प्रसंशक मंत्री,देश के लिए घातक होता है

क्या आपको कभी ये समझ में आ पाएगा?क्या आपको कभी ये समझ में आ पाएगा?
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत के 5 वें स्कन्ध के 32 वें अध्याय के 16 वें और 17 वें तथा 18 वें श्लोक में महाराज सुरथ ने अपने मन्त्रियों को शत्रु के पक्ष में जाते हुए देखकर स्वयं विचार करते हुए कहा कि –
पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्य: कदाचन।
किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा: नरा:।।16।।
लोभी लालची मंत्रियों को शत्रु की प्रसंशा करते हुए तथा अपने बल को कम बताते हुए देखकर महराज सुरथ समझ गए कि हमारे मंत्री धनलोभ के कारण शत्रु की प्रसंशा कर रहे हैं, तथा बिना लड़े ही अपनी पराजय की घोषणा कर रहे हैं। अपनी नीतियों की निंदा कर रहे हैं और शत्रु की नीतियों का बखान कर रहे हैं।
तब महाराज सुरथ ने आत्ममंथन करते हुए कहा कि –
पापबुद्धिषु विश्वासो न कर्तव्य: कदाचन
पापबुद्धि के स्त्री पुरुषों का विश्वास कभी भी नहीं करना चाहिए।
जिस राज्य के मंत्री धन की तृष्णा से पराभूत हो जाते हैं, वे जनता के साथ भी अत्याचार करते हैं तथा विवेकहीन होकर अपने देश के राजा शाशक के साथ भी कुछ भी कर सकते हैं।
किन्न ते वै प्रकुर्वन्ति ये लोभवशगा: नरा:
लोभ के वशीभूत होकर मनुष्य क्या नहीं कर सकते हैं? अर्थात धन के लोभी स्त्री पुरुष किसी के भी साथ कुछ भी धोखा कर सकते हैं। अब 17 वें श्लोक में देखिए कि लोभी लालची मंत्रिगण कहां तक गिर सकते हैं?
भ्रातरं पितर: मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा।
गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्ट: सदा नर:।।17।।
धन के लोभी स्त्री पुरुष, लोभ में इतने अधिक अंधे हो जाते हैं कि अपने हितैषियों से ही द्वेष करने लगते हैं।
भ्रातरं पितरं मित्रं सुहृदं बान्धवं तथा।
गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि
धन के लोभी स्त्री पुरुष, अपने ही भाई से, पिता से, मित्रों से तथा अपनी जाति के बन्धुओं से द्वेष करने लगते हैं।
गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि
समय समय पर सन्मार्ग दिखानेवाले अपने गुरू से भी द्वेष करने लगते हैं। उनकी बातों को हानिकारक बताने लगते हैं। धर्म और नीति को बुरा बताकर गुरु का तिरस्कार करने लगते हैं। जनता में जो पूज्य व्यक्ति होते हैं, उनकी उपेक्षा करने लगते हैं। देवताओं और ब्राह्मणों से भी द्वेष करने लगते हैं। अपने धर्म को छोडक़र दूसरे अधर्मियों के धर्म को श्रेष्ठ और अनुकरणीय बताने लगते हैं।
ये लोभवशगा: नरा:
जो स्त्री पुरुष धन के लोभी हो जाते हैं, उनको देश, समाज, परिवार तथा बन्धु बान्धव सभी उसके लोभ की निंदा करते हैं, इसलिए वह सबसे द्वेष करने लगता है। उसे लगता है कि जिनके लिए मैं अपार धन सम्पत्ति इक_ा कर रहा हूं, वे ही मुझे गलत क्यों बता रहे हैं? इसलिए उसे जो भी अच्छी बात बताता है, उसी को त्यागता चला जाता है। लोभी स्त्री पुरुषों का विश्वास नहीं करना चाहिए।
अब थोड़ी शाशक के लिए 18 वां श्लोक देखिए –
तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वास: सर्वथाधुना।
मन्त्रिवर्गेह्यथ पापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते।। 18।।
मन्त्रिवर्गेह्यथ पापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते
जब मन्त्रिवर्ग पापी और लोभी हो जाएं, शत्रुओं का पक्ष लेने लगें तो तो मुझ शाशक को उनका विश्वास नहीं करना चाहिए। ऐसे भ्रष्ट मंत्री मिलकर कभी भी अपने शाशक की हत्या तक कर सकते हैं। इसलिए मुझे इन मन्त्रियों का विश्वास नहीं करना चाहिए। ऐसा विचार करके महाराज सुरथ अपने राज्य का त्याग करके वन की ओर निकल गए। अंत में महाराज सुरथ ने मार्कण्डेय ऋषि से ज्ञान प्राप्त करके तथा देवी दुर्गा की आराधना करके पुन: अपने राज्य को प्राप्त किया था। अब आप समझ चुके होंगे कि जब अपने देश के मंत्री विधर्मियों की कूटनीति में आकर लोभी लालची हो जाते हैं तो निश्चित ही अपने देश का तथा परिवार और समाज का तथा धर्म का भी नाश करके स्वयं भी नष्ट हो जाते हैं। जब भी कोई देश पराधीन होता है, तो उसके कारणों पर विचार करने से स्पष्ट ही दिखाई देता है कि शाशक के मंत्रिगण धन के लोभ से, भोग के लोभ से शत्रुओं की ओर जाकर मिल गए थे।
आज भी यदि कोई देश किसी देश को अपने अधीन करेगा, तो भी यही कारण होगा। हमारे भारत देश में आजकल अपने सनातनधर्म की निंदा करके तथा अपने देश में सुरक्षा के नाम पर वोट के लोभ से, सामाजिक विघटनकारी कानून बनाकर समाज को बांटकर लड़वाकर आनेवाली भयानक विपत्ति को आमन्त्रण देने में लगे हैं। जिस दिन हमारे देश में अन्तर्कलह उत्पन्न होगा, उसका कारण आज के वर्तमान के शाशकों का लोभ ही कारण बनेगा। जब किसी एक वर्ग का पक्षपात करके किसी दूसरे वर्ग को अकारण ही निर्दोष होनेपर भी दुखी किया जाएगा तथा जिसको दण्ड देना चाहिए था उसको दण्ड न देकर स्वतन्त्र किया जाएगा, तथा जो दण्ड के योग्य नहीं है, उसको दण्ड मिलेगा, तो निश्चित ही है कि सारी जनता आपस में ही लडऩे लगेगी। हर गली, मुहल्ले में युद्ध होंगे। लोग एक दूसरे को चोरीछिपे मारने लगेंगे। चारोंतरफ घरों में आग ही आग दिखेगी। शाशक मंत्रिगणों की हत्याएं होने लगेंगीं। ये सब शाशकों मंत्रियों के लोभ का दुष्परिणाम होगा। यह दुष्परिणाम प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक धर्म के माननेवाले स्त्री पुरुषों भोगना होगा। अनीति और अन्याय का फल, न कभी अच्छा हुआ है और न ही कभी अच्छा फल होगा।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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