Please assign a menu to the primary menu location under menu

Sunday, September 24, 2023
डेली न्यूज़

क्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया है

क्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया है

क्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया हैक्या आपके मन में कभी ऐसा विचार आया है
Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के लंकाकाण्ड के 61 वें दोहे की 7 वीं और 8 वीं चौपाई में भगवान श्री राम ने वीरघातिनी शक्ति से मूर्छित पड़े हुए लक्ष्मण जी को देखकर विलखते हुए कहा कि –
सुत वित नारि भवन परिवारा।
होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।।
श्री राम जी ने कहा कि हे लक्ष्मण! कोई भी जीव किसी भी योनि में जन्म लेता है, उसको इतनी वस्तुएं तो बार बार बिना प्रयास ही मिल जातीं हैं। यदि वह पुरुष शरीर में जाएगा तो ये पांच सम्बन्धी सहज में ही मिल जाएंगे।
(1) सुत (सन्तान)
(2)वित्त (धन ) (भोजन का साधन)
(3)नारि
(4)भवन (निवास)
(5) परिवारा ( चाचा, चाची आदि)
ये पांचों सम्बन्ध सहज में ही मिल जाते हैं।
व्याकरण शास्त्र में प्रथमा द्वितीया से लेकर सप्तमी तक सात विभक्तियां होतीं हैं।इन सात विभक्तियों में षष्ठी विभक्ति को सम्बन्ध विभक्ति के नाम से जाना जाता है। षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता है। क्योंकि जिस क्रिया को कोई कर्ता करता है, उसे ही कारक कहते हैं। जब कोई बालक या बालिका माँ के गर्भ से पैदा होते हैं तो उसके सम्बन्धी पहले से ही होते हैं। माता पिता, चाचा चाची, मौसा, मौसी, बहिन, भाई बन्धु आदि को कोई भी व्यक्ति उत्पन्न नहीं करता है। वे पहले से ही उत्पन्न हुए होते हैं। इसलिए सम्बन्ध का कर्ता कोई भी नहीं हो सकता है। इसलिए षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता है। कारक अर्थात स्वयं करनेवाला। अब देखिए कि भगवान श्री राम जी क्या कह रहे हैं स्त्री के रूप में जन्मे जीव को पुरुष, सन्तान, भोजन, आवास तथा परिवार उसको बिना किए ही अनेक बार एक ही जन्म में प्राप्त हो सकते हैं। अकाल में पति के चले जाने पर दूसरे तीसरे पुरुष प्राप्त हो जाएंगे ।पत्नी चले जाने पर अनेक स्त्रियां भी मिल जाएंगी। एक सन्तान के समाप्त होने पर दूसरी सन्तान भी कर सकते हैं। एक आजीविका समाप्त होने पर आजीविका का दूसरा साधन भी कर सकते हैं। एक भवन छूट जाए तो दूसरा भवन भी बनाया जा सकता है। अर्थात भोग और भोजन की व्यवस्था कहीं भी कभी भी, किसी भी उपाय से की जा सकती है। क्योंकि ये पांचों वस्तुएं पुरुषार्थ से मेहनत से मिल जातीं हैं। किन्तु इस संसार में एक ऐसी भी वस्तु है, जो आप एक बार ही प्राप्त करते हैं। यदि वह नष्ट हो जायेगी तो पुन: नहीं मिलेगी। ये तो संसार में एक बार ही मिलता है।
अस बिचार जियँ जागहु ताता।
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता।।8।।
श्री राम जी ने रोते हुए कहा कि हे लक्ष्मण! मैंने जो कहा है कि नारी, धन, पुत्र, भोजन, भवन तो इसी जन्म में ही अनेक बार मिल जाते हैं। सब जगह मिल जाते हैं।
किन्तु
मिलइ न जगत सहोदर भ्राता
माँ के एक ही उदर से अर्थात गर्भ से जन्मे भाई को सहोदर कहते हैं। तथा बहिन को सहोदरा कहते हैं। बहिन भाई की उत्पत्ति मात्र माता पिता के अधीन होती है। किसी व्यक्ति के हाथ में नहीं है। संसार में कोई भी व्यक्ति सगे भाई तथा सगी बहिन को किसी अन्य स्त्री के गर्भ से उत्पन्न नहीं करवा सकता है। सहोदर तो अपने माता पिता से ही उत्पन्न होता है। और फिर एकबार सहोदर भ्राता या बहिन समर्थ हो जाते हैं। बड़े हो जाते हैं तो फिर माता पिता से भी दुबारा कोई सहोदर भ्राता उत्पन्न नहीं हो सकता है। इस संसार में भाइयों में ऐसा मतभेद हो जाता है कि सहोदर भ्राता से शत्रुभाई हो जाता है। जब दोनों भाइयों को ऐसा लगता हो कि संसार में सबकुछ तो अनेकबार मिलता है किन्तु सहोदर सगा भाई, सगी बहिन एक ही बार मिलते हैं। एकबार किसी भाई की मृत्यु हो जाएगी तो मैं सदा के लिए ही बिना भाई का हो जाऊंगा, ऐसा लगेगा तभी अटूट सम्बन्ध तथा अटूट स्नेह हो सकता है। अन्यथा रामायण और महाभारत तो सबके सामने है। वर्तमान के पारिवारिक विघटन भी सबके सामने हैं। भाईयों से भाई को होनेवाली हानि भी सबके सामने है। ऐसे सहोदर भाई तो इस संसार में बहुत कम होते हैं, जो अपने भाई के लिए संसार के सभी सम्बन्धों को तिलांजलि दे देते हैं । पत्नी, पुत्र और धन, जमीन के लिए सम्बन्धों को तोडऩेवाले स्त्री पुरुष घर घर में हर घर में दिखाई दे रहे हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »