Please assign a menu to the primary menu location under menu

Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

कभी कभी अपने प्रियजन ही मृत्यु का कारण बन जाते हैं

कभी कभी अपने प्रियजन ही मृत्यु का कारण बन जाते हैं

इतने बड़े देश के गुलाम होने का मुख्य कारण,धन और भोगवासना हैइतने बड़े देश के गुलाम होने का मुख्य कारण,धन और भोगवासना है
Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के 34 वें दोहे की 5 वीं और 6 वीं चौपाई में महाराज दशरथ की मानसिक स्थिति का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने कहा कि –
लखी नरेस बात फुरि सांची।
तिय मिस मीचु सीस पर नाची।।5।।
अयोध्या नरेश महाराज दशरथ ने कैकेयी को अपने दो वरदानों में से रामवनवास के वरदान को वापस लेने के लिए बहुत कहा। किन्तु कैकेयी जब हठ पकड़कर रह गई, कैसे भी नहीं मानी तो महाराज दशरथ के मन में ऐसा विचार आया कि –
तिय मिस मीचु सीस पर नाची।
महाराज दशरथ जी को यह बात निश्चित रूप से समझ में आ गई कि आज मेरी मृत्यु स्त्री के स्वरूप में वो भी प्रियपत्नी के स्वरूप में आ गई है। यहां राम जी वन के लिए गए , और मेरी मृत्यु निश्चित है।
इस पर थोड़ा विचार कर लीजिए –
तिय मिस मीचु
पत्नी ही आज मेरी मृत्यु का कारण बन रही है। मृत्यु का अपना कोई अलग से स्वरूप नहीं होता है। मृत्यु तो शरीरधारी जीव जन्तु को प्रेरित करती है। सांप, विच्छू, कुत्ता, सिंह, आदि भक्षक हिंसक जीव ही आपकी मृत्यु का कारण नहीं होते हैं, अपितु यहां का प्रत्येक पदार्थ, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक व्यक्ति आपकी मृत्यु का साधन बन सकते हैं। आप जो पदार्थ, भोजन करके जी रहे हैं, जिससे प्राणधारण कर रहे हैं, वे ही अजीर्ण होकर मृत्यु का कारण भी बन सकते हैं। आप जिस वाहन में बैठकर यात्रा कर रहे हैं, वही वाहन ही आपकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं। आप जिस घर में निवास कर रहे हैं, वह घर ही आपकी मृत्यु का कारण बन सकता है। आप जिस धन का उपयोग करके सुख के साधन इक_े करते हैं, वह धन ही आपकी मृत्यु का कारण बन सकता है। अर्थात मृत्यु के लिए भगवान ने अलग से कोई साधन नहीं बनाए हैं। जिनसे जीवन चल रहा है, वही मृत्यु के कारण भी बनेंगे। पति, पत्नी, माता पिता, पुत्र, पुत्री, भाई बहिन आदि जो भी आपके जीवन से सम्बन्धित सम्बन्ध और सम्बन्धी होते हैं, आनन्द के सुख के देनेवाले होते हैं, वही आपके दुख और मृत्यु के कारण भी बनते हैं। भले ही आपकी मृत्यु का कारण उनका प्रेम बने, या शत्रुता बने। महाराज दशरथ जी ने कैकेयी के लिए क्या कुछ नहीं किया होगा? कैकेयी स्वयं भी एक राजपुत्री है। अब राजपत्नी भी है। क्या कमी रही होगी, या आज उसे क्या कमी हो रही है, अथवा आगे भी क्या कमी रहेगी? अपार धन सम्पत्ति तथा सेवक सेविकाएं थीं और आज भी हैं तथा आगे भी रहेंगीं। किन्तु महाराज दशरथ का कैकेयी के प्रति निश्छल निष्कपट प्रेम ही दशरथ जी की मृत्यु का कारण बना है। दशरथ जी ने ऐसा कभी भी नहीं सोचा था कि कैकेयी मेरे किए गए निर्णय में अपनी हानि देखेगी। इसलिए उनने बिना पूंछे ही राज्याभिषेक का निर्णय कर लिया था। किन्तु कैकेयी की रामवनवास के वरदान की दृढ़ता को देखकर समझ लिया कि आज मेरी मृत्यु भी स्त्री के रूप में ही आ गई है। अब आप छठवीं चौपाई में देखिए कि फिर भी दशरथ जी ने मृत्यु को टालने का एक ऐसा प्रयास किया कि जो न तो दशरथ जी के लिए उचित था और न ही कैकेयी के लिए उचित था।
गहि पद विनय कीन्ह बैठारी।
जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।।
महाराज दशरथ जी ने कैकेयी के गहि पद अर्थात पैरों को पकड़कर, बैठने के लिए कहा। कैकेयी जब बैठ गई तब विनय अर्थात हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए समझाया कि ये दिनकरकुल है। सूर्यवंश का वृक्ष है। ऐसे धर्मात्मा सूर्यवंश के वृक्ष के लिए कुठार अर्थात कुल्हाड़ी फरसा मत बनो। कुल्हाड़ी को तो एकमात्र बेंट ही चाहिए। जिस वृक्ष ने अपना जीवन देकर तुम्हें बेंट दिया है, आज तुम उसी पेड़ को काट रही हो? अर्थात तुम्हें जो शेष जीवन के लिए जो जो चाहिए, वो तो बहुत ही कम चाहिए। इस थोड़े से बचे हुए जीवन के लिए इस विशाल, यशस्वी वंश का विनाश क्यों कर रही हो ? अब आप ही सोचिए कि राजा दशरथ ने पैर पकड़ लिए, विनय भी कर ली, फिर भी कैकेयी नहीं मानी। इसका तात्पर्य यह है कि मृत्यु अटल है, अकाट्य है, अनिवार्य है। आपका अतिप्रियजन भी जब आपकी मृत्यु का कारण बनेगा तब आप धन,धर्म धाम कुछ भी त्यागने को तैयार हो जाइए , किन्तु मृत्यु तो टलनेवाली नहीं है। बस, इस बात का दुख अधिक रहेगा कि जिसके लिए हमने तन, मन,और धन सबकुछ समर्पित कर दिया था, वही हमारी मृत्यु का कारण बन गया है। यदि कोई शत्रु ही आपकी मृत्यु का कारण बनता है तो कुछ लडऩे का उपाय भी कर सकते हैं। किन्तु जब अपने ही दांतों से जीभ कटती है तो दांत तोड़ते नहीं बनते हैं। आप मोहवश जिसे बहुत अधिक प्रेम करते हैं, वह आपके साथ कभी न कभी अवश्य ही ऐसा दुव्र्यवहार करता है, जिसको आप सहन भी नहीं कर सकते हैं और न ही किसी को कुछ बता सकते हैं। इसलिए किसी से भी इतना प्रेम नहीं करना चाहिए, जो मृत्यु के रूप में ही उपस्थित हो जाए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »