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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

चाटुकारों की पहचान, ऐसे की जाती है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के लंकाकाण्ड के 9 वें दोहे की 8 वीं और 9 वीं चौपाई में प्रहस्त ने रावण को चाटुकार मंत्रियों की झूठी प्रशंसा को सत्य न मानने का परामर्श देते हुए कहा कि –
ऐसे लोगों की कहीं भी कमी नहीं है, ऐसे लोग तो सर्वत्र मिल जाते हैं –
प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं।
ऐसे नर निकाय जग अहहीं।।
इस संसार में ऐसे स्त्री पुरुषों की बहुत अधिक मात्रा होती है, जो प्रिय बोलते हैं और प्रिय ही सुनना चाहते हैं।
प्रहस्त ने भरी सभा में रावण से कहा कि हे पिता जी! आपके मंत्री गण आपको प्रसन्न करने के लिए ही श्री राम जी की निंदा कर रहे हैं। जबकि स्वयं ही मन ही मन डर भी रहे हैं। बन्दरों के सहित श्री राम जी को खा जाने की बात करके आपको खुश करना चाहते हैं। आप भी अपनी प्रशंसा सुनकर तथा श्री राम जी की निंदा सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं। इसलिए ये सभी मंत्री अपने भय को छिपाकर ऐसी बातें कर रहे हैं जो स्वयं भी नहीं कर सकते हैं। इसलिए इनकी बातों को अपनी प्रशंसा और इनका बल मत समझिए। प्रहस्त ने कहा कि हे पिता जी ! कैसे व्यक्ति के द्वारा की गई प्रशंसा ही प्रशंसा मानना चाहिए, तो सुनिए!
बचन परम हित सुनत कठोरे।
सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।।
प्रहस्त ने कहा कि हे तात! संसार में ऐसे स्त्री पुरुष बहुत कम होते हैं जिनके वचन सुनने में बहुत कठोर लगते हैं, किन्तु –
बचन परम हित
उनकी कही गई बात को मान लेने पर अपना परम हित ही होता है। परिणाम सुखदायी होता है। भले ही आपको उनकी कही गई बात बहुत बुरी लग रही हो। क्योंकि जिनको आपसे कोई स्वार्थ नहीं होता है, जिनको आपसे धन और यश कमाने की कामना नहीं होती है। तथा न ही उसे किसी भी प्रकार की अपनी हानि से भय लगता है, वही व्यक्ति यथार्थ वचन बोलते हैं। आपके बल और बुद्धि का यथार्थ वर्णन करके आपके द्वारा किए जानेवाले कार्य का सही निरूपण करते हैं।
किन्तु –
सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे।
किन्तु ऐसे सत्य और हितकारी परामर्श देनेवाले भी बहुत कम मिलते हैं। तथा अपने विषय का सत्य सुननेवाले भी बहुत ही कम मिलते हैं। जब से सृष्टि हुई है तब से ही इस संसार में अच्छे व्यक्ति तथा अच्छी वस्तु और अच्छे स्थान सदा ही कम ही होते आए हैं। इसलिए आत्मज्ञानी महापुरुष, तथा भगवान के भक्त और वैराग्यवान महात्मा सदा से ही कम होते आए हैं। लाखों स्त्री पुरुषों में दो चार स्त्री पुरुष ही विवेकी और बुद्धिमान, धर्मात्मा होते हैं। कुछ व्यक्ति ही उनपर श्रद्धा विश्वास करके उनके कथनानुसार चलनेवाले होते हैं। जो अच्छे व्यक्तियों के कथनानुसार नहीं चलना चाहते हैं, किन्तु उनके साथ रहने से अपना स्वार्थ सिद्ध होता है, ऐसे व्यक्ति ही चाटुकारिता करते हैं। आपके गुणों का सही आंकलन करनेवाले, तथा आपके हितैषी इस संसार में बहुत कम होते हैं। वही आपको आपके गलत निर्णय को गलत, और सही निर्णय को सही बताएंगे। ऐसे व्यक्तियों के परामर्श मानना चाहिए, भले ही उनके बोलने में कठोरता लग रही हो।
संसार में न तो कोई ऐसा पुरुष है, जिसे अपने बल का, अपने धन का तथा अपनी बुद्धि का ज्ञान न हो,तथा न ही ऐसी कोई स्त्री है, जिसे अपने तन, धन तथा रूप और बल का ज्ञान न हो । सभी जानते हैं कि हम कैसे हैं और हमारे कितना बल, बुद्धि तथा धन है। अधिक मात्रा में बतानेवाला ही तो चाटुकार है। जो काम आप नहीं कर सकते हैं, उसको करने के लिए आपकी प्रशंसा की जा रही हो, जितना धन, जितना बल और जितना प्रभाव आपमें नहीं है, यदि कोई स्त्री या पुरुष उतना बढ़ा चढ़ा कर बड़ी मधुर वाणी में कह रहा है ,तो समझ जाइए कि यही चाटुकार है। अपना कुछ काम बनाना चाहता है, बस,।
ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए, क्योंकि जिनकी अधिक मात्रा होती है, उनसे ही संसार के कार्य चलते हैं।
ऐसी स्थिति में बुद्धिमान व्यक्ति को चाटुकारों का काम करके अपना काम निकालना चाहिए। किन्तु जब किसी महत्त्वपूर्ण कार्य का निर्णय लेना हो तो, न तो चाटुकारों को वह महत्त्वपूर्ण कार्य बताना चाहिए और न ही उसके विषय में उनसे परामर्श करना चाहिए। परामर्श तो सदा उनसे करना चाहिए, जो आपके कार्य के दोष भी आपसे बताएं, और उस कार्य का परिणाम भी बताएं, तथा आपकी भी कमी बता सकें। यदि कुछ बिगड़ भी रहा हो तो उसको सम्हाल सकें। ऐसे दुर्लभ व्यक्तियों के द्वारा बताए हुए दोष को दोष नहीं समझना चाहिए, अपितु उनके वचनों को हितकारी मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। सत्य सुनने की हिम्मत रखना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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