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Tuesday, December 6, 2022
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दवा विक्रेता दवाओं के माध्यम से कर रहे मुनाफाखोरी

दवा विक्रेता दवाओं के माध्यम से कर रहे मुनाफाखोरीदवा विक्रेता दवाओं के माध्यम से कर रहे मुनाफाखोरी
Visfot News

छतरपुर। स्वास्थ्य के नाम पर मेडिकल दुकानों से जिन दवाओं को आप खरीदते हैं उन दवाओं के माध्यम से मुनाफाखोरी का बेहिसाब खेल जारी है। शुगर की जो गोली सामान्य मेडिकल स्टोर पर विभिन्न कंपनियों के नाम से बेची जा रही है उसकी कीमत आमतौर पर 6 रूपए से लेकर 15 रूपए होती है जबकि यही दवा जेनरिक दवा दुकानों पर महज एक रूपए से 3 रूपए के बीच मिल जाती है। दुर्भाग्य ये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा जन औषधि केन्द्रों के माध्यम से आम जनता को सस्ती दरों पर दवा उपलब्ध कराने के लिए भले ही जेनरिक दवा स्टोर हर शहर में खोले गए हों लेकिन मेडिकल माफिया के बरगलाने और जागरूकता की कमी के कारण लोग अब भी कंपनियों के नाम पर महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर हैं।
फर्क इतना कि आप हैरान हो जाएं
जेनरिक दवा दुकान और सामान्य मेडिकल स्टोर से कई तरह की दवाओं के दामों का तुलनात्मक अध्ययन बताता है कि किस तरह आम जनता मेडिकल माफिया के शिकंजे में आकर लुटने को मजबूर है। जेनरिक दवा दुकान में मल्टी विटामिन के 10 कैप्सूल जो 30 रूपए में उपलब्ध हैं अन्य मेडिकल स्टोर पर यही 10 कैप्सूल 100 रूपए में मिलते हैं। कैंसर की जो दवा जेनरिक दुकान पर साढ़े 3 सौ रूपए में मिलती है वही दवा मेडिकल स्टोर पर 1800 रूपए में मिल रही है शुगर की दवा का 10 कैप्सूल का पत्ता जहां सामान्य मेडिकल स्टोर पर 100 रूपए से अधिक का मिलता है तो वहीं यही दवा जेनरिक मेडिकल स्टोर पर 26 रूपए में मिल रही है। कैल्शियम की जो गोली 7 रूपए में जेनरिक स्टोर पर मिलती है उसी गोली के सामान्य मेडिकल स्टोर पर आपको 60 रूपए चुकाने पड़ते हैं। सिर्फ दवा ही नहीं स्वास्थ्य संबंधी उपकरण भी कंपनियों के नाम पर भारी भरकम दामों पर बेचे जा रहे हैं। शुगर जांचने वाला ग्लूको मीटर आम दुकानों पर एक हजार रूपए से अधिक का है जबकि जेनरिक मेडिकल स्टोर पर यही 525 रूपए में उपलब्ध है।
मॉलीक्यूल वही सिर्फ कंपनी के नाम पर लूट
प्रधानमंत्री जन औषधि केन्द्र संचालित करने वाले मोहित गुप्ता बताते हैं कि सरकार ने फार्मा कंपनियों की बेहिसाब लूट को रोकने के लिए जेनरिक दवा स्टोर्स खोले हैं। इन दवा स्टोर्स पर मिलने वाली दवा बिना किसी कंपनी ब्राण्ड के उपलब्ध होती है जबकि सामान्य मेडिकल स्टोर्स पर यही दवा किसी कंपनी के ब्राण्ड के नाम पर मिलती है। श्री गुप्ता बताते हैं कि दवा को बनाने वाले मॉलीक्यूल दोनों ही दुकानों पर मिलने वाली दवाओं में एक समान होते हैं लेकिन कंपनियां अपने ब्राण्ड का टैग लगाकर इन्हीं दवाओं के मनमाने दाम वसूलती हैं। उधर मेडिकल स्टोर पर मौजूद दुकानदार और फार्मा माफिया से कमीशन लेने वाले कई डॉक्टर लोगों को बरगलाते हैं कि जेनरिक दवा का निर्माण साधारण मटेरियल से होता है जो ठीक से काम नहीं करती। श्री गुप्ता कहते हैं कि यह पूरी तरह झूठ है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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