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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

निर्मल यश तो मात्र धार्मिक मनुष्य का ही होता है, अधार्मिक का नहीं

निर्मल यश तो मात्र धार्मिक मनुष्य का ही होता है, अधार्मिक का नहीं

जानिए गुरुमंत्र एक आसन पर बैठकर और चलते फिरते करने का क्या महत्व हैजानिए गुरुमंत्र एक आसन पर बैठकर और चलते फिरते करने का क्या महत्व है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के 27 वें अध्याय के 6 वें श्लोक में संजय ने महाराज युधिष्ठिर जी से कहा कि –
धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यं,
महाप्रताप: सवितेव भाति।
हीनो हि धर्मेण महीमपीमां
लब्ध्वा नर: सीदति पापबुद्धि:।।
संजय ने कहा कि हे महाराज युधिष्ठिर! हे तात! धर्म का पालन करनेवाले में तथा अधर्म के मार्ग में चलनेवाले में इतना अन्तर होता है कि जो स्त्री पुरुष अपने धर्म का पालन करते हैं, वे इस संसार में बिना धन के ही हजारों वर्षों तक अपने यश को सूर्य के समान प्रकाशित करते रहते हैं। वे सदा ही अपने सदाचार से सूर्य के समान सभी को मार्गदर्शन देते रहते हैं। सूर्य के समान चमकते रहते हैं। जो स्त्री पुरुष अधार्मिक होते हैं, वे असत्य, हिंसा, ठगी, धोखा, बलपूर्वक किसी की स्त्री,धन तथा प्राणों का हरण करते हैं, ऐसे अधार्मिक स्त्री पुरुष सारी पृथिवी का शाशक होकर भी दुखी रहते हैं।
धर्मं कृत्वा कर्मणां तात मुख्यम्
संजय ने कहा कि हे तात युधिष्ठिर! इस संसार में एकमात्र धर्म ही तो ऐसा आचरण है, जो मनुष्य को पशु पक्षी कीट पतंग के लक्षणों से पृथक दिखाता है। शास्त्रों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के अलग अलग कर्तव्य कर्म कहे गए हैं। गृहस्थों के धर्म तथा त्यागियों के धर्म भी अलग अलग कहे गए हैं। माता पिता, पति पत्नी तथा पिता पुत्र के भी धर्म अलग अलग कहे गए हैं। शाशक के तथा मन्त्रिमण्डल के भी अलग अलग धर्म कहे गए हैं। सभी स्त्री पुरुषों को अपने अपने मुख्य कर्तव्य कर्मों का दृढता से पालन करना चाहिए। इसी को धर्म कहते हैं। अपने अपने कर्तव्यों को जानकर तन, मन, धन से पालनकरनेवाले स्त्री पुरुषों का इस मानव समाज में भी आदर सम्मान होता है, तथा शरीर त्याग करने के पश्चात् भी हजारों वर्षों तक उनके दिखाए गए कर्तव्य मार्ग पर लाखों स्त्री पुरुष चलकर सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं तथा वे भी यशस्वी हो जाते हैं।
महाप्रताप: सवितेव भाति
जैसे सूर्य आकाशमण्डल में सदा ही विद्यमान रहते हैं, सबके मार्गदर्शक हैं। इसी प्रकार अपने धर्म कर्तव्य का पालन करनेवाले स्त्री पुरुष सूर्य के समान ही महाप्रभावशाली हो जाते हैं। सदा ही सूर्य के समान ही दमकते चमकते रहते हैं। अब अधार्मिक स्त्री पुरुषों के द्वारा किए गए अधार्मिक आचरणों का परिणाम देखिए-
हीने हि धर्मेण –
यदि कोई स्त्री पुरुष अपनी युवावस्था के अहंकार में आकर, शारीरिक रूप बल के अहंकार के कारण अपने धर्म का त्याग कर देते हैं। तथा परम्परा से पैतृक सम्पत्ति पाकर धन के अहंकार में आकर धर्म का त्याग करके दूसरों के धन का अपहरण करते हैं अथवा भोगवासना प्रधान हो जाते हैं तो अपार धनबल होने पर भी, अपार जनबल होने पर भी, उनका मन सदा ही उद्वेग से, व्याकुलता से तथा अशान्ति से भरा रहता है।
महीमपीमां लब्ध्वा नर: सीदति पापबुद्धि:
जिसकी बुद्धि में सदा ही पाप करने के विचार आते रहते हैं, उसे पापबुद्धि कहते हैं। ऐसे स्त्री पुरुषों को सम्पूर्ण पृथिवी की प्रत्येक वस्तु प्राप्त करने का अधिकार भी प्राप्त हो जाए तो भी वे सदा ही दुखी ही रहते हैं। पाप का परिणाम ही तो मानसिक व्याकुलता और अशान्ति है।
हे युधिष्ठिर! द्रौपदी का बीच सभा में अपमान होने पर भी, आप पांचों भाई वन में निवास करते हुए भी, भिक्षाटन करते हुए भी, अपने धर्म का पालन करने के कारण आज सम्पूर्ण पृथिवी में महाप्रतापी महायशस्वी के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सुखसाधनहीन रहने पर भी आप सभी के हृदय में शान्ति है। निर्भयता है तथा आत्मबल है। ये सब आपकी धार्मिकता के कारण ही है। धर्मपूर्वक आचरण करनेवाले स्त्री पुरुष दुखी और भयभीत नहीं होते हैं।दुर्योधन को सम्पूर्ण राज्य सामग्री प्राप्त है, सेवक सेविकाएं प्राप्त हैं। सुकोमल शय्या भी प्राप्त है,फिर भी आपके अधिकार को छीनने के कारण तथा आपको सदा ही दुखी देखने की कामना के कारण सदा ही दुखी रहता है, व्याकुल रहता है, अशान्त रहता है। यह अशान्ति तथा व्याकुलता उसके अधार्मिक आचरणों का परिणाम है।आज आप सभी ध्यानपूर्वक देखिए कि प्रत्येक विभाग के सरकारी अधिकारी, सरकारी कर्मचारी अपने अपने धर्म कर्तव्य को त्याग कर मात्र धन में ही अपनी बुद्धि लगाकर बैठ गए हैं। प्रथम अधर्म तो यह है कि वे जिस पद पर बैठे हैं, उस पद के अधिकार क्षेत्र के अनुसार नहीं चलते हैं। सामाजिक कार्य करने का अनर्गल रुपया लेते हैं। रूपए के लिए निर्दोषी को फंसा देते हैं और रुपए के लिए ही दोषी को बचा लेते हैं। थोड़े से समय में अपार धनराशि एकत्रित कर लेते हैं। बड़ा महल खड़ा कर लेते हैं। अच्छे स्कूलों में सन्तानों को शिक्षित करके व्यवस्थित कर देते हैं। इतना सब होने पर भी इनके हृदय में न तो शांति है और न ही इनकी सामाजिक प्रतिष्ठा है। तथा न ही पारिवारिक प्रेम है। कुछ भी तो नहीं है। इसी को अधर्म का फल कहते हैं। धर्म कर्तव्य का पालन करते रहने से सांसारिक आपदा आने पर भी, पारिवारिक आपदा आने पर भी, मन बुद्धि विवेकहीन नहीं होते हैं। इसलिए धार्मिक स्त्री पुरुष मानसिकरूप से दुखी नहीं रहते हैं ।धर्म कर्तव्य का पालन करते रहिए और इस घोर कलियुग में भी शान्ति और सुख प्राप्त करके यशस्वी रहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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