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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

जिन गृहस्थों के यहां महात्मा आते हैं, वही सद्गृहस्थ हैं

जिन गृहस्थों के यहां महात्मा आते हैं, वही सद्गृहस्थ हैं

वैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता हैवैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के 360 वें दोहे की 5 वीं, 6 वीं 7 वीं और 8 वीं चौपाई में महात्माओं के प्रति महाराज दशरथ जी की श्रद्धा और निष्ठा का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने कहा कि-
विश्वामित्र चलन नित चहहीं
महाराज दशरथ जी के चारों पुत्रों के विवाह के पश्चात् विश्वामित्र जी अयोध्या से जाने की प्रतिदिन ही तैयारी कर लेते हैं, किन्तु जा नहीं पाते हैं।
क्यों नहीं जा पाते हैं तो कारण देखिए –
राम सप्रेम विनय बस रहहीं।
प्रात:काल होते ही राम जी जब भी विश्वामित्र जी को प्रणाम करने जाते हैं तो विश्वामित्र जी आशीर्वाद देने के बाद कहते हैं कि राम! अब हम आज अभी अपने आश्रम की ओर जाएंगे। राम जी विश्वामित्र जी से नम्रता के साथ बार बार कहते हैं कि बस, आज रुक जाइए, कल जाइएगा। जब कल होता है तो फिर वही प्रार्थना, फिर वही कथन सुन सुनकर विश्वामित्र जी को रुकने के लिए विवश कर देते हैं। महात्माओं को गृहस्थों के घर में अधिक समय तक निवास नहीं करना चाहिए। क्योंकि गृहस्थ के यहां अधिक निवास करने से गृहस्थ के दैनिक जीवन की क्रियाओं में बाधा होने लगती है। महात्माओं को भी सद्गृहस्थ की सेवा के कारण मोह, ममता होने लगती है। लेकिन आज तो विश्वामित्र जी ने निर्णय ही कर लिया है कि अब तो कोई कुछ भी कहे, किन्तु रुकना नहीं है। आज विश्वामित्र जी ने महाराज दशरथ जी से कह ही दिया कि हम अब जा रहे हैं। अब देखिए कि महाराज दशरथ जी ने विश्वामित्र जी के ऐसा कहने पर क्या किया?
मांगत बिदा राव अनुरागे।
सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।।5।।
महाराज दशरथ जी ने विश्वामित्र जी के जाने की आज्ञा सुनकर, चारों पुत्रों को आगे किया और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। विश्वामित्र जी की ओर अत्यधिक प्रेमपूर्ण दृष्टि से देखते हुए बोले –
नाथ सकल संपदा तुम्हारी।
मैं सेवक समेत सुत नारी।।6।।
दशरथ जी ने कहा कि हे नाथ! हम राजा तो प्रजा के लिए हैं। प्रजा हमारी सेवक है, और हम उनके राजा हैं। राजा, अपनी प्रजा का नाथ होता है। स्वामी होता है। प्रजा को जब भी कुछ दुख होता है, वह जनता अपने राजा से कहती है। राजा अपने तनबल से, धनबल से, तथा सैन्यबल से, बुद्धिबल से सभी प्रकार से जनता के दुख को दूर करने का प्रयत्न करता है। किंतु हे नाथ! जब राजा को दुख होता है तो उसके दुख को दूर करने के लिए प्रजाजन समर्थ नहीं होते हैं।सर्वसमर्थ राजा को दुखी देखकर जनता उसको असमर्थ समझकर त्याग देती है। शाशकों के दैहिक, दैविक तथा भौतिक दुख को महात्मा ही दूर कर सकते हैं और कोई नहीं। हे नाथ! आप ही हमारे सभी प्रकार के सुखों के दाता हैं, और सभी प्रकार के दुखों को दूर करनेवाले हैं। ये सारा राज्यकोष आपकी ही सम्पत्ति है। आप जब चाहें, जहां चाहें, जितना चाहें, जिसके लिए चाहें, दे सकते हैं। आप हमें आज्ञा देंगे तो हम राज्य का सम्पूर्ण धन आपके चरणों में समर्पित कर देंगे। आपकी आज्ञा के विरुद्ध चलनेवाला हमारे घर में कोई भी नहीं है।
मैं सेवक समेत सुत नारी।
चारों पुत्रों के सहित तथा सभी पत्नियों के सहित मैं आपका सेवक हूं। आप जब भी जैसी जो भी आज्ञा देंगे, हम सब मिलकर आपकी आज्ञा का पालन करेंगे।
आपसे एक प्रार्थना है, उसको ध्यान से सुनिए –
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू।
दरसन देत रहब मुनि मोहू।।7।।
महाराज दशरथ जी ने विश्वामित्र जी से कहा कि हे नाथ ! आपसे विशेष प्रार्थना यह है कि हो सकता है कि मैं अपने पुत्रों और पुत्रबधुओं के मोह के कारण आपका दर्शन करने न आ पाऊं। ऐसा भी हो सकता है कि मेरे चारों पुत्र भी अपनी पत्नियों के मोह में प्रेम में मग्न होकर दर्शन करने न आ पाएं। प्रार्थना यह है कि यदि हम कोई भी आपकी सुध नहीं ले पाते हैं तो आप ही इन बालकों पर कृपा करिएगा। हम ध्यान न दे पाएं तो आप ही हमारा ध्यान दीजिएगा।
दरसन देत रहब मुनि मोहू
हे गाधितनय! आप मुझे दर्शन देते रहिएगा। अर्थात आप ही हमारे भवन में आकर हमारी विस्मृति को क्षमा करके अपना स्मरण दिलाते रहिएगा। आप ही हमसे सेवा लेते रहिएगा। मायामोह में फंसा हुआ गृहस्थ तो महात्माओं को तथा भगवान को भूल ही जाता है, किन्तु महात्मा, जिन गृहस्थों पर अनुग्रह करते रहते हैं, उन गृहस्थों का कल्याण अवश्य ही हो जाता है। इसलिए आप ही हमारे घर पधारकर हमें सेवा का अवसर प्रदान करें।
अन्तिम और सबसे विलक्षण बात!
अस कहि राव सहित सुत नारी।
परेउ चरन मुख आव न बानी।।8।।
ये सब कहते कहते महाराज दशरथ का गला भर आया। अपने चारों पुत्रों के सहित और कौशल्या आदि रानियों के सहित महाराज दशरथ जी विश्वामित्र जी के चरणों में गिर पड़े, शिर रख दिया, दोनों हाथों से विश्वामित्र जी की पिड़रियों को पकड़कर ऐसे रोने लगे कि जैसे संसार का सबसे प्रियबन्धु प्रियसुहृद, प्रियमित्र, विछड़कर जा रहा हो।
परेउ चरन मुख आव न बानी
महाराज दशरथ जी अपने पुत्रों सहित और रानियों के सहित चरणों में पड़े थे, बस, मात्र आंसू ही गिर रहे थे। मुख से अब एक भी शब्द नहीं निकल पा रहा था। अब आप सोचिए कि जिस गृहस्थ के घर के सभी सदस्य निर्विरोध रहकर एक महात्मा के प्रति इतने समर्पित होंगे, उस गृहस्थ को भला किस महात्मा के यहां जाना पड़ेगा? अर्थात ऐसे स्नेही, समर्पित गृहस्थ के यहां तो विद्वान, तपस्वी, महात्माजन वर्ष में एकबार तो अवश्य ही पहुंच जाते हैं। जिसके घर में ऐसे समर्थ विद्वान महापुरुषों का आगमन होता रहता है, उस गृहस्थ को ज्ञान और शान्ति दोनों ही घर बैठे प्राप्त हो जाते हैं। जिन गृहस्थों का, विद्वान महापुरुषों से सम्पर्क नहीं होता है, वहां दुर्गुणों का निवास हो जाता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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