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Saturday, April 20, 2024
धर्म कर्म

किए गए शुभ अशुभ कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत के 9 वें स्कन्ध के 29 वें अध्याय के 69 वें श्लोक में धर्मराज यमराज ने सत्यवान की पतिव्रता पत्नी सावित्री से कहा कि –
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मशुभाशुभम्।।
धर्मराज यमराज ने कहा कि हे सावित्री पतिव्रते! संसार की निरन्तर प्रक्रिया कर्म के अनुसार ही चल रही है।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि
कर्म का फल बिना भोगे करोड़ों कल्पों तक भी कर्म अपने आप नष्ट नहीं होते हैं। अर्थात जन्म लेने के बाद शरीर के मोह में या परिवार के मोह में जिस स्त्री पुरुष ने जिस प्रकार के जो भी जैसे जहां कर्म किए हैं, उन कर्मों का फल उन स्त्री पुरुषों को भोगना ही पड़ता है। बिना भोगे कर्म की समाप्ति नहीं होती है।
कर्मों के कारण ही जन्म होता है और जन्म होने के बाद पुन: कर्म करने पड़ते हैं।
संसार में कोई व्यक्ति महात्मा हो जाए, सर्वस्व त्याग कर भक्ति करने लगे तो…?
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्
इस जन्म में यदि कोई सबकुछ त्याग कर महात्मा हो जाए तो भी उसने जो पूर्वजन्म में शुभ अथवा अशुभ जो भी कर्म किए हैं, उनका फल तो भोगना ही पड़ता है। इसलिए बड़े बड़े सन्तों को भी शारीरिक कष्ट तो सहन करने ही पड़ते हैं। भक्ति करने का, त्याग करने का परमफल यह होगा कि अब दूसरा जन्म नहीं होगा। सदा के लिए जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाएंगे। किन्तु पूर्वजन्म के किए गए कर्मों को तो इस शरीर में भोगना ही पड़ता है।
जो स्त्री पुरुष भगवान की भक्ति भजन करते हैं, उनको शारीरिक कष्ट होने पर भी मानसिक कष्ट नहीं होता है। क्योंकि वे जानते हैं कि मुझे पूर्वजन्म के शुभ कर्मों के कारण ही संसार में धन, वैभव, प्रतिष्ठा प्राप्त हो रहे हैं। इसलिए महात्मा भगवान के भक्तजन सांसारिक वैभव प्राप्त होने पर अहंकार नहीं करते हैं और किसी प्रकार का दुख प्राप्त होने पर दुखी नहीं होते हैं। इसलिए बुद्धिमान, भक्तिमान, विद्वान, ज्ञानवान महात्माओं के कष्ट देखकर अश्रद्धा नहीं करना चाहिए। क्योंकि सांसारिक अज्ञानी मूढ़ स्त्री पुरुषों के मन में ये बात बहुत जल्दी हृदय में बैठ जाती है कि ये तो बहुत पूजा भक्ति करते थे, लेकिन इतने दुखी क्यों हैं? संसार के कर्मों के सिद्धान्त तो सभी के लिए समान रूप से लागू होते हैं। शरीर के कष्ट, रोग आदि तो शारीरिक स्तर पर सभी को होते हैं। ज्ञान, भक्ति तथा योग, संसार के दुखों से सदा के लिए छूटने के लिए होते हैं, वर्तमान के शरीर के दुखों से छूटने के लिए नहीं होते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA

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