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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

अब कोई भी देश अपने देश को घूस और अकर्मण्यता से मुक्त नहीं करा सकता है!

अब कोई भी देश अपने देश को घूस और अकर्मण्यता से मुक्त नहीं करा सकता है!

इतने बड़े देश के गुलाम होने का मुख्य कारण,धन और भोगवासना हैइतने बड़े देश के गुलाम होने का मुख्य कारण,धन और भोगवासना है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
महाभारत के उद्योग पर्व के 34 वें अध्याय के 81 वें और 82 वें श्लोक में विदुर जी ने धृतराष्ट्र से कहा कि कोई भी मनुष्य, धर्म का और देवताओं का विनाश नहीं कर सकता है, अपितु देवता ही अन्यायी अधर्मी मनुष्यों का विनाश करते हैं।
यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम्।
बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोह्यवाचीनानि पश्यन्ति।।81।।
विदुर जी ने कहा कि हे महाराज धृतराष्ट्र! आपके पुत्रों ने देवताओं की अवहेलना की है। धर्म और न्याय की अवहेलना की है। इसलिए देवता जिस पुरुष का पराभव अर्थात विनाश करना चाहते हैं, उसके बुद्धि की विवेकशक्ति नष्ट कर देते हैं। विवेकबुद्धि नष्ट होने के कारण वह मनुष्य विनाशक कर्मों की ओर ही प्रवृत्त होता जाता है। नीच कर्मों को सही मानकर तबतक करता जाता है, जबतक वह नष्ट नहीं हो जाता है। भ्रष्टबुद्धि मनुष्य को अधार्मिक कार्य ही सत्य प्रतीत होते हैं।
यस्मै देवा: प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम्
मृत्युलोक का संचालन देवताओं के हाथ में है। समय समय पर अनुकूल जलवर्षा करना, आंधी तूफान आदि पर नियंत्रण करना, ओलावृष्टि का नियन्त्रण करना तथा पृथिवी को वनस्पति से तथा औषधियों से पूर्ण रखना आदि सभी प्रकार के कार्य देवताओं के अधीन होते हैं। यदि मनुष्य अपने धर्म का पालन करते हुए समय समय देवताओं को सन्तुष्ट करने के लिए यज्ञ पूजा, हवन आदि करते हैं तो देवता भी पृथिवी को धनधान्य से पूर्ण करते हैं।
तभी मृत्युलोक की रक्षा होती है।
गौ, ब्राह्मण और देवता इन तीनों की रक्षा से ही मनुष्य जाति की रक्षा होती है। ये तीनों ही देवताओं को प्रसन्न करने के साधन हैं। जब कोई शाशक धर्म का त्याग करके देवताओं की अवहेलना करता है, गौ और ब्राह्मण का विनाश करने में लग जाता है तब देवता भी ऐसे अधार्मिक अन्यायी धर्मनिरपेक्ष का विनाश करने के लिए उसकी बुद्धि ही विपरीत कर देते हैं, जिससे कि वह धर्मनिरपेक्ष मनुष्य ऐसे अधर्म और अन्याय की ओर चलता जाए, अधर्म अन्याय करता जाए कि वह स्वयं ही परस्पर युद्ध करके समाप्त हो जाए। हमारे देश में वर्तमान का शाशन धर्मनिरपेक्ष शाशन कहा जाता है। मन्दिर तोड़े जाते हैं। मन्दिरों में अनधिकृत व्यक्तियों से पूजन करवाया जाता है। शास्त्रों की मर्यादा और विधिविधान के विरुद्ध मंदिरों में पूजन का अधिकार दिया जाता है।
जो स्वयं धर्म का त्याग करके बैठे हैं, वे अपने बनाए हुए धर्मविरुद्ध नियमों को धर्म मानकर लागू करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि देवताओं ने ही अब इनकी अधार्मिक बुद्धि को ऐसी विपरीत दिशा में मोड़ दिया है कि ये ऐसा ही धर्मविरोधी कार्य करेंगे, जिसके कारण परस्पर या तो गृहयुद्ध में विनष्ट होंगे, अथवा किसी देश से प्रबल विरोध होने पर युद्ध होंगे। अकाल मृत्यु होंगी, अतिवर्षा होगी, या तो फिर वर्षा ही नहीं होगी। पकी हुई फसलों में ओलावृष्टि होगी। जंगल कट जाने के कारण औषधियां नष्ट हो जाएंगी। प्रत्येक स्त्री पुरुष विविध प्रकार के रोगों से पीडि़त होते रहेंगे। इत्यादि विनाश के कारण बनते रहेंगे।
अब भ्रष्टबुद्धि का परिणाम भी 82 वें श्लोक में देखिए –
बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते।
अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति।। 82।।
विदुर जी ने कहा कि हे महाराज धृतराष्ट्र!
बुद्धौ कलुषभूतायां विनाशे प्रत्युपस्थिते
जब धर्मनिरपेक्ष शाशकों की बुद्धि कलुषित अर्थात दूषित हो जाएगी तो विनाश ही प्रारम्भ हो जाएगा। विनाश प्रारम्भ होता है तो भय के कारण बुद्धि और भी अधिक विपरीत विचार करने लगती है।
कैसा विपरीत विचार आता है?
अनयो नय संकाशो हृदयान्नापसर्पति
धर्मनिरपेक्ष शाशक को अन्याय ही न्याय प्रतीत होने लगता है। जब अन्याय ही न्याय लगने लगता है तो उसके हृदय से अन्याय निकालने पर भी नहीं निकलता है । अर्थात अन्याय ही करता रहता है। जब तक विनाश नहीं हो जाता है। आज आप सभी देशों की बात तो बाद में करिएगा। अपने देश के शाशकों पर विचार कर लीजिए। भारत का सम्पूर्ण संविधान धर्मनिरपेक्ष है अर्थात धर्मरहित है। एकपक्षीय है। कोर्ट में जाइए तो वकील और जज केसों मुकदमों को अपनी आजीविका समझकर धन कमाने में लग जाते हैं। जिसका जितना धन, उसको उतना न्याय। ये पहला अधर्म है कि जहां अन्याय को न्याय मानकर चलाया जा रहा है। मुकदमों का कालनिर्धारित नहीं है। किसी भी पार्टी का सरकारी अधिकारियों पर एकछत्र अधिकार है। सभी विभाग के छोटे बड़े कर्मचारी का घूस लेकर काम करना, अथवा नहीं करना। पदों में बैठे हुए व्यक्ति का बीसों वर्षों तक निरन्तर एक जैसा अन्याय करते रहना क्या सिद्ध कर रहा है ? किन्तु वर्तमान में जनता के साथ निरन्तर अत्याचार होना, अपने अपने घरों को धन वैभव से पूर्ण करना आदि से सिद्ध होता है कि विश्व में धर्महीनता का रोग फैल गया है। देवता ही इनकी बुद्धि को विपरीत करके विनाश की ओर ले जा रहे हैं। इसलिए ये सभी शाशनाधिकारी अन्याय को न्याय मानकर अन्याय और अधर्म करते जा रहे हैं। अन्यायी अधर्मियों के विनाश होने पर ही अन्याय और अधर्म का विनाश होता है। अर्थात मानवजाति का विनाश अन्याय और अधर्म के कारण ही होता है। वह विनाशकाल ही चल रहा है। आनेवाले विनाश को अब कोई भी नहीं रोक पाएगा। न तो कोई भी घूस, चोरी, बलात्कार आदि रोक पाएगा और न ही कोई इनसे होनेवाले विनाश को रोक पाएगा।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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