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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

पुत्रियों को सेवा की शिक्षा भी देना चाहिए

पुत्रियों को सेवा की शिक्षा भी देना चाहिए

वैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता हैवैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के बालकाण्ड के 334 दोहे की चौथी, 5 वीं, छठवीं और 7 वीं चौपाई में सीता जी की विदा का समाचार सुनकर माता सहित अन्य रानियों ने तथा सीता जी की बुद्धिमती विवाहिता सखियों ने सीता जी को ससुराल में रहने की शिक्षा देते हुए कहा कि –
चलिहि बरात सुनत सब रानीं।
बिकल मीन गन जनु लघु पानी।।2।।
रनिवास में समाचार आया कि अब बारात की विदाई होनेवाली है , सीता जी की विदा की तैयारी करिए। बस, इतना सुनते ही सभी रानियां ऐसे तड़प उठीं कि –
बिकल मीन गन जनु लघु पानी।
जैसे किसी तालाब का पानी सूखता जाता है, और मछलियां कम पानी में तड़पने लगतीं हैं। आप अब इन मछलियों की उपमा से ही अनुमान लगाइए कि जैसे कम पानी में मछलियों की मृत्यु निश्चित होती है, भले ही कितना भी छटपटाएं, कितना भी तड़पें, किंतु पानी के अभाव में मृत्यु ही निश्चित है। इसी प्रकार कन्या के माता पिता का अपनी पुत्री से वियोग निश्चित ही है। कोई माता पिता अपनी पुत्री से कितना भी प्रेम स्नेह करते हों, किन्तु जैसे जैसे कन्या बढऩे लगती है, वैसे वैसे ही माता पिता के अपनी पुत्री से वियोग का समय समीप आता जाता है। विवाह के पश्चात तो वह वियोग का क्षण आ ही जाता है ।आज सीता जी का सभी से वियोग का काल आ गया और सभी का सीता जी से वियोग का काल आ गया। विवाह एक ऐसी विधि है, जिसमें संयोग और वियोग का समय एकत्र हो जाता है। हर्ष और वियोग का दुख एक ही समय में उपस्थित हो जाता है। एक जीवन की समाप्ति और दूसरे जीवन का प्रारम्भ भी एकसाथ होता है। आनन्द का उपभोग और तन मन का उपयोग तथा बुद्धि का प्रयोग एकसाथ हो जाता है। विवाह का समय अद्भुत समय है। अवर्णनीय है। जैसे ही माताओं ने सुना कि सीता की विदा करना है तो माता ने सीता जी को गोद में बैठाया और इतनी बार चूमा कि जन्म से अब तक इतनी बार नहीं चूमा होगा।
सबसे पहले तो आशीर्वाद दिया –
होएहु संतत पियहि पियारी।
चिर अहिबात असीस हमारी।।4।।
माता जी ने सीता जी को दो आशीर्वाद देते हुए कहा कि हे सीते! यह हमारा आशीर्वाद है कि तुम सदा ही आजीवन अपने पति को प्यारी बनी रहोगी। और तुम्हारा अहिबात अर्थात सिन्दूर सदा ही मांग में सुशोभित बना रहे। मांग को अहिबात क्यों कहा जाता है? तो सुनिए! अहि अर्थात सर्प, वात अर्थात गया हुआ। सांप जहां से निकल जाता है, वहां धूल में एक लम्बी रेखा खिंच जाती है। सधवा स्त्रियों के मस्तक के ऊपर केशों अर्थात बालों को दोनों तरफ कर देने पर एक सीधी रेखा दिखाई देती है। उस रेखा को अहिवात कहते हैं।
व्याकरण में पररूप सन्धि में एक वार्तिक लिखा है –
सीमन्त: केशवेशे, केशों की शोभा अर्थ में सीमन्त शब्द का प्रयोग होता है। अर्थात सीमन् अन्त यहां पर अन् को पररूप होकर अन्त के अ में मिला दिया जाता है। तो सीमन्त शब्द बनता है। यदि किसी देश अथवा स्थान की सीमा का अन्त बताना हो तो सन्धि नहीं होती है। तब उसे सीमान्त कहा जाता है। सीमा का अन्तिम भाग। इसलिए सीमन्त एक संस्कार है। पांचवें छठवें महीने में गर्भवती नारियों का होता है। उसी को सीमन्त कहते हैं। विवाहिता स्त्रियों की शोभा तो अहिवात अर्थात सीमन्त से ही होती है। बिना मांग भरी हुई स्त्री ऐसी लगती है, जैसे बिना तिलक का कर्मकाण्डी ब्राह्मण लगता है। इन दोनों आशीर्वादों को देने के बाद माता ने सीता जी को ससुराल में रहने की शिक्षा देते हुए कहा कि –
सास ससुर गुर सेवा करेहू।
पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।।5।।
सीता जी से माता जी ने कहा कि पति को प्रसन्न रखने के लिए तीन व्यक्तियों की सेवा बहुत मन लगाकर करना चाहिए।
(1)सास (2) ससुर तथा (3)ससुराल के गुरु
प्रत्येक पुत्र चाहता है कि जिन माता पिता ने मुझे पाल पोषकर बड़ा किया है, वे किसी भी प्रकार से दुखी न रहें। घर के बाहर तो पति रहता है और घर के अन्दर पत्नी रहती है। धन कमाकर लानेवाला पुत्र अपने माता पिता की उतनी सेवा नहीं कर सकता है, जितनी सेवा उसकी पत्नी कर सकती है। सास ससुर को समय समय पर स्नान, भोजन, तथा धुले हुए वस्त्र और अस्वस्थ अवस्था में औषधि की ही आवश्यकता होती है। बस, इससे अधिक सेवा ये है कि सास ससुर के कुछ भी कहने पर नहीं करनाकितना करूं, कबतक करूं आदि शब्दों का उपयोग नहीं करना है। यही सबसे बड़ी सेवा है। इनके साथ रहते हुए भी इनसे कम बोलने में ही उनका सम्मान है।
ये तो हुई सास ससुर की सेवा ।
सास ससुर गुर सेवा करेहू
अब एक विशेष बात यह है कि पति के यहां जो उनके कुल में गुरु या कुलपुरोहित होते हैं, वे भी कभी कभी घर आते जाते हैं। सास ससुर और पति तथा परिवार के लोग जिस ब्राह्मण को या महात्मा को गुरुस्वरूप में वरण कर चुके हैं, बहु के भी वही कुलगुरु हैं। बहु को भी उनको अपना गुरु मानकर वैसी ही उतनी ही सेवा करना चाहिए, जैसी जितनी सास ससुर और उसके पति करते आए हैं। आदरपूर्वक श्रद्धापूर्वकभोजन कराना,तथा प्रणाम आदि करना चाहिए। माता जी ने सीता जी से कहा कि बेटे! पति की प्रसन्नता का ध्यान भी रखना चाहिए। प्रसन्न पति ही अपनी पत्नी को सुखी करता है। जो पति अपनी पत्नी के व्यवहार से प्रसन्न नहीं रहता है, वह पति भला कैसे प्रसन्न रख सकता है? पत्नी से दुखी पति अपनी पत्नी से हृदय से प्रेम नहीं करता है।
अब पति के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? तो सुनिए –
पति रुख लखि आयसु अनुसरेहु
पति के संकेत को, पति के आचरण को ही रुख कहते हैं। रुख अर्थात स्थिति परिस्थिति। पति क्या कहना चाहते हैं, क्या करना चाहते हैं, क्रोध में हैं, कि व्याकुल हैं,कि शान्त हैं, कि प्रेम में हैं कि चिंता में हैं इत्यादि शारीरिक मानसिक स्थिति को देखकर ही उनके अनुसार बोलना चाहिए, और उनके अनुकूल करना चाहिए। इस संसार में करना और बोलना, इन दो क्रियाओं का ही विशेष महत्त्व है। समय पर किया नहीं, या समय पर बोला नहीं, तो इच्छा के अनुसार करने पर भी वह प्रसन्नता नहीं मिलती है, जो प्रसन्नता उस समय मिलना थी। पति की प्रसन्नता ही पत्नी के सुख का आधार है। अब देखिए कि सहेलियों ने सीता जी को क्या सिखाया?
अति सनेह बस सखीं सयानी।
नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।।6।।
अब माताओं से मिलने के बाद सीता जी, विवाहिता सखियों से मिलीं। रोतीं विलखतीं सखियों ने धैर्य धारण करके –
नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी
सखियों ने कहा कि हे सखि सीते! विवाह के पश्चात विवाहिता को नारी शब्द से कहा जाता है। नर की स्त्री को नारी कहते हैं। विवाह के पूर्व तो वह, कन्या है। विवाह के पश्चात ससुराल में, बहु, चाची, भाभी आदि सम्बन्धों से कही जाती है। किन्तु समाज में वह नारी ही कही जाती है। नर के सम्बन्ध में आते ही नारी है। नारी शब्द का प्रयोग सामाजिक व्यवहार की कुशलता के लिए होता है। नारि धरम की शिक्षा देते हुए कहा कि हे सीते! बहु के स्वभाव की चर्चा समाज में भी होती है। परिवार के अतिरिक्त ग्राम समाज तथा परिवार के स्त्री पुरुष आते जाते हैं। बाहर के परिवारों से आए हुए स्त्री पुरुषों से अपने घर की सदैव प्रसंशा ही करना चाहिए। रिश्तेदारों से भी अपने घर की किसी विशेष परिस्थिति की चर्चा नहीं करना चाहिए। घर में होनेवाली आय की चर्चा, लाभ की तथा हानि की भी चर्चा नहीं करना चाहिए। अर्थात घर में दुखी होने पर भी बाहर के लोगों को तथा रिश्तेदारों को अपने दुख का पता नहीं चलना चाहिए। पति पत्नी में तथा परिवार में कोई मतभेद हो रहा हो तो बाहर के किसी भी व्यक्ति से न कहना ही नारी की सबसे बड़ी कुशलता है। यही नारीधर्म है। अपनी पुत्री को आपने बहुत प्रेम से पाला है। उसके शील स्वभाव की रक्षा की है। शिक्षा भी दी है। ये सब तो ठीक है। किंतु ऐसा कैसे विचार करते हैं कि ससुराल में जाने के बाद मेरी पुत्री को कोई कष्ट न हो। संसार में ऐसा कोई भी जीव नहीं है, जिसको अपने जीवन में किसी न किसी वस्तु का अभाव न होता हो, किसी न किसी प्रकार का दुख न होता हो, या कभी शारीरिक दुख न होता हो । अर्थात सभी को कभी न कभी कोई न कोई दुख तो होता ही है। इसलिए ऐसी भावना रखना कि मेरी बेटी को ससुराल वाले दुख ही देंगे, दुख ही दे रहे हैं, इत्यादि अच्छा नहीं है। आपकी इसी भावना के कारण ही अपनी बेटी का घर उजाड़ लेते हैं। उसे स्वतन्त्र करके अनाथ बना देते हैं। जो दुख आपने उठाए हैं, वही दुख आपकी बेटी को भी उठाना ही पड़ेंगे। इसलिए ज्ञान भी दीजिए और धैर्य भी दीजिए। तभी आप और आपकी बेटी इस जीवन को पार कर सकेंगे । अन्यथा ससुराल छोडऩेवाली का तथा पति छोडऩेवाली का आप आदर नहीं करते हैं तो यदि आपकी बेटी ऐसी अवस्था में पहुंच गई तो उसका भी कहीं कोई आदर सम्मान नहीं होगा। सुखमय जीवन के लिए मात्र धन कमाने की आधुनिक शिक्षा ही पर्याप्त नहीं है,अपितु सामाजिक, पारिवारिक शिक्षा भी आवश्यक है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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