Please assign a menu to the primary menu location under menu

Saturday, April 20, 2024
धर्म कर्म

जबसे सृष्टि हुई है, तबसे अबतक किसी का भी वंश नहीं चल रहा है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के 6 वें स्कन्ध के 15 वें अध्याय के 4 वें श्लोक में नारद जी ने महाराज चित्रकेतु से कहा कि –
यथा धानासु वै धाना: भवन्ति न भवन्ति च।
एवं भूतेषु भूतानि चोदितानीशमायया।।
नारद जी ने कहा कि हे महाराज! सभी जीवों के शरीर तो बीज के समान ही होते हैं। जैसे धरती में बोए गए अनाज के सभी दाने नहीं अंकुरित होते हैं। कुछ बीज अंकुरित हो जाते हैं और कुछ बीज अंकुरित नहीं होते हैं। कुछ बीजों में अनेक बीज देने की शक्ति रहती है और कुछ बीज तो बिल्कुल ही व्यर्थ ही चले जाते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक स्त्री पुरुषों के शरीर से संतान नहीं होती है । किसी किसी के संतान हो जाती है और किसी किसी के संतान नहीं होती है। आपको अपने पुत्र की मृत्यु के कारण इतना दुखी नहीं होना चाहिए। क्योंकि यहां सभी का जीवन पृथक पृथक है।
एवं भूतेषु भूतानि चोदितानीशमायया
इसी प्रकार इस संसार के कर्ता भगवान की माया से प्रेरित होकर सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। कुछ प्राणियों के शरीर में उत्पत्ति करने की शक्ति होती है और कुछ शरीरों में उत्पत्ति करने की शक्ति नहीं होती है। जिन शरीरों में उत्पादन क्षमता अधिक होती है, उनसे तो न चाहते हुए भी सन्तान उत्पन्न हो जाती है और किसी किसी शरीर में तो चाहते हुए भी एक भी सन्तान नहीं होती है। कुछ स्त्री पुरुष तो सद्गुरुओं के ज्ञान के प्रभाव से संसार को दुखरुप जानकर विवाह ही नहीं करते हैं। आजीवन विवाह न करके अपना जीवन ही भगवान के चरणों में समर्पित करके आनन्द में रहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वर्तमान का जीवन ही सृष्टि का अन्तिम जीवन नहीं है। इस जन्म के पहले भी जीवन था और इस शरीर के छूटने के बाद भी पुन: नया जन्म मिलेगा। शरीर तो पुन: मिलेगा ही।
प्रत्येक जन्म का वंश तो किसी का भी नहीं चलता है। किसी न किसी जन्म में तो उत्पत्ति का अवरोध होना ही है, और होता ही है, तथा आगे भी ऐसा हो सकता है। इसलिए इस मनुष्य जन्म को सन्तान, धन, वैभव प्रभाव आदि की चिन्ता में व्यर्थ में नहीं गंवाना चाहिए। धन और सन्तान, तथा प्रभाव, मान सम्मान, युद्ध, शान्ति आदि तो संसार में होते रहेंगे। बचे हुए शेष जीवन को स्वाध्याय, जप, तप, परोपकार आदि में लगाकर आनन्द में रहना चाहिए। निरन्तर दुखी रहने से वर्तमान का कोई सुख नहीं मिलता है और आनेवाले भविष्य में भी ये मानसिक दुख, न तो भजन आदि ही करने देगा और न ही सुख का अनुभव होने देता है। मात्र शरीर का सुख ही सुख नहीं है, अपितु आत्मा का सुख भी सुख है। श्रेष्ठ पुरुषों की संगति से मानसिक दुख की निवृत्ति होती है, दुखियों की संगति से तो दुख की वृद्धि ही होती है।

RAM KUMAR KUSHWAHA

3 Comments

Comments are closed.

भाषा चुने »