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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

जैसा लिखा है, वैसा कहीं भी कोई भी नहीं कर रहा है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
आजकल संस्कृत भाषा को पढऩेवालों की संख्या तो बहुत है किन्तु स्तोत्रों स्तुतियों को समझनेवालों की संख्या बहुत ही कम है। संस्कृत भाषा का प्रयोग तो प्राय: ब्राह्मण समाज ही कर्मकाण्ड से लेकर विवाह, श्राद्ध आदि में करते हुए दिखाई दे रहे हैं। किन्तु उनको स्वयं ही उसका अर्थ और प्रयोजन पता नहीं है और न ही जानने का प्रयास करते हैं। सरकारी स्कूलों से लेकर सरकारी कार्यालयों में कोई न कोई संस्कृत का श्लोक लिखा ही मिल जाता है।
पुलिसचौकियों में गीता में भगवान के द्वारा कहा गया वचन लिखा रहता है कि –
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
सज्जनों की रक्षा के लिए और दुष्टों के विनाश के लिए।
किन्तु दुष्टों से ही पुलिसवालों की मित्रता दिखाई देती है।
न्यायालय के बाहर लिखा रहता है कि –
सत्यमेव जयते, सत्य की ही विजय होती है।
किन्तु वहां ही जाकर मनुष्य सबसे अधिक निराश होता है।
यदि आप इस पर विशेष ध्यान देंगे तो अनेक नेआओं के मुख से तथा टी. वी. चैनलों में पत्रकारों के मुख से एक प्रसिद्ध आधा श्लोक सुनने को मिलता है –
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
बस, ऐसे कुछ वाक्य बोलकर या लिखकर अपने आप को प्रमाणित कर लेते हैं। देखो, ये सही लिखा है और हमने प्रमाण दे दिया है। आजकल रामचरित मानस तो गांवों के हर व्यक्ति के मुख से चौपाई दोहा के रूप में निकल रही है। स्वयं को बता देते हैं कि देखो रामायण में ऐसा लिखा है। बस, जो बता देता है, वही समाज में अच्छे व्यक्तियों में गिना जाता है। रामायण के कथावाचक भी रामायण की कथा कहते हैं, किन्तु भगवान की स्तुतियों को छूते भी नहीं हैं। बस, इतना कहते हैं कि फिर ऋषि मुनियों ने भगवान की स्तुति की। स्तुति में क्या लिखा है, क्या कहा गया है? वो तो कहते ही नहीं हैं। नमामीशमीशाननिर्वाणरूपम् का अर्थ आजतक किसी भी श्रद्धालु श्रोता ने कथावाचकों के मुख से नहीं सुना होगा। अन्य स्तुतियां भी रामायण में हैं, उनको छूना ही नहीं है। जबकि स्तुतियों में ही भगवान के स्वरूप का तथा प्रभाव का वर्णन है। वही यथार्थ मर्म है। परन्तु क्या करें, वक्ता को वही नहीं सुनाना है, जो मुख्य है। जनता तो ज्ञान ध्यान हीन है। ज्ञान नहीं है, इसलिए ध्यान भी नहीं दे रहे हैं। कानून लिखा गया है। बिना नियम नीति के तो मनुष्य जाति का कोई व्यवहार हो भी नहीं सकता है। व्यापार के भी नियम हैं। व्यवहार के भी नियम हैं। मनुष्य जाति को सुखी और स्वस्थ रहने के लिए ही नियम बनाए जाते हैं। नियमों के अनुसार चलनेवाले स्त्री पुरुषों का समाज में बहुत आदर भी होता है।
जैसा जो भी लिखा है, वह उनने लिखा है जो स्वयं ही उन नियमों के अनुसार चलते थे और करते थे। किंतु जिनके लिए लिखा था, वे पहले से नीति नियमों के विरुद्ध चलते थे। जो नीति नियमों के विरुद्ध चलते हैं, उनसे ही तो समाज में दुख विपत्ति आते हैं। एकबात ध्यान देने योग्य ये है कि वर्तमान में वही व्यक्ति समाज को सबसे अधिक दुखी किए हुए है, जो नीति नियमों को जानते हैं, पढ़ते हैं और पढ़ रहे हैं। इन तीनों ने आध्यात्मिक सुख का नाश ,भौतिकसुख का नाश तथा दैविकसुख का नाश कर दिया है।
आध्यात्मिक सुख का नाश
(1) संस्कृत भाषा के ज्ञान से हीन कथावाचकों ने तथा कथावाचिकाओं ने शास्त्रों का रहस्य समाप्त कर के आध्यात्मिक सुख का नाश कर दिया है।
(2) ज्योतिष शास्त्र के संस्कृत भाषा के मूल ग्रंथों को छोडक़र अप्रमाणिक ज्योतिष की बातों ने दैविक सुख का नाश कर दिया है। शनि, राहु आदि का भय दिखाकर भगवान की भक्ति को छुड़वाकर शनि राहु आदि की पूजा, मंदिर प्रधान हो गए।इसलिए दैविकसुख भी पाखण्डी मनुष्य ने नाश कर दिया।
(3) भौतिक सुख का नाश वैज्ञानिक यंत्रों के सेवन ने कर दिया है।
अर्थात आज के मनुष्य ने अपनी मनुष्यता के सभी साधन नष्ट कर दिए हैं, और फिर सुख चाहते हैं। मनुष्यता की शिक्षा जिनसे मिलती है, उन नियमों को छोडक़र अपनी मनमानी करनेवाले मनुष्य न कभी सुख प्राप्त कर पाए हैं और न ही कर पाएंगे। अब तो चारों तरफ मृत्यु का भय और दुख का भय ही व्याप्त है। सभी एक दूसरे को दुखी किए हुए हैं। सुख की कामना तो रहती है, किन्तु विपरीत बुद्धि के कारण न तो किसी को सुखी कर सकते हैं और न ही स्वयं सुखी रह सकते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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