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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

वैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता है

वैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता है

वैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता हैवैरागी और रागी के मन में इतना अन्तर होता है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
पंचदशी ग्रंथ के द्वैतप्रकरण के 21 वें श्लोक में विद्यारण्य स्वामी ने वैराग्यवान् व्यक्ति के मन बुद्धि के गुण को और भोगी रागी के मन बुद्धि के गुण को बताते हुए कहते हैं कि –
हृष्यत्येको मणिं लब्ध्वा क्रुध्यत्यन्यो ह्यलाभत:।
पश्यत्येव विरक्तोह्यत्र न हृष्यति न कुप्यति।।
संसार के भोग्य पदार्थों में आसक्त तथा शारीरिक सम्बन्धियों में मोहित स्त्री पुरुषों को मणि प्राप्त हो जाती है तो प्रसन्न हो जाते हैं, और हानि होने पर क्रोधित हो जाते हैं। किन्तु जिन स्त्री पुरुषों के हृदय में वैराग्य होता है, वे वैराग्यवाले स्त्री पुरुष उसी मणि को देखते हुए भी, भोग्य पदार्थों को देखते हुए भी न तो प्रसन्न होते हैं और वह मणि आदि भोग्य पदार्थ खो जाने पर या नष्ट हो जाने पर न तो प्रसन्न होते हैं और नष्ट होने पर क्रोधित भी नहीं होते हैं। यही तो वैराग्य की सबसे बड़ी महिमा है। जब किसी स्त्री पुरुष को अपने गुरु के बताए हुए संसार के विषयों पदार्थों की नश्वरता का तथा आत्मज्ञान की बाधकता का यथार्थज्ञान हो जाता है तो उसको संसार की प्रत्येक वस्तुओं के प्रति वैराग्य हो जाता है। पदार्थों के प्रति भोग्यबुद्धि तथा सुख बुद्धि नष्ट हो जाती है। इसी को वैराग्य कहते हैं। जिस स्त्री पुरुष को संसार की प्रत्येक वस्तुओं के प्रति सुखबुद्धि रहती है। तब उसे प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति की कामना जागृत होती रहती है। यदि वह वस्तु मिल जाती है, तो सुख का अनुभव करते हैं। उस विषयवस्तु के लिए रात दिन प्रयास करते रहते हैं। उन भोग्य वस्तुओं के बिना सदा दुख का अनुभव करते रहते हैं, ऐसे स्त्री पुरुषों को रागी कहते हैं। रागी स्त्री पुरुषों को जिन वस्तुओं से कुछ सुख मिलता है,उन्हीं वस्तुओं से जीवनभर दुख भी मिलता रहता है, फिर भी उनका त्याग नहीं करते हैं, ऐसे स्त्री
पुरुषों को रागी कहते हैं।
हृष्यत्येको मणिं लब्ध्वा
अज्ञानी स्त्री पुरुष तो मनुष्यों की अपेक्षा बहुमूल्य तो वस्तुओं को मानते हैं। इसलिए मणि प्राप्त होने पर उसे अपार प्रसन्नता होती है। यही तो अज्ञान है। यही राग है। संसार को सुखरूप में देखनेवाले भोगी स्त्री पुरुषों को इस ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु बहुमूल्य प्रतीत होती है। एक छोटी सी सुई के लिए भी ऐसे लडऩे लगते हैं जैसे कि पूरे संसार में बस, एक ही सुई थी। कपड़ों के लिए, लोटा गिलास के लिए परिवार के सगे सदस्यों में इतनी अधिक शत्रुता हो जाती है कि भाई बहिन, नंद, भाभी, देवरानी, जिठानी, सास बहू आदि जैसे सगे सम्बन्ध भी शत्रुओं जैसे द्वेष ईष्र्या आदि से भर जाते हैं। अब आप विचार करिए कि परिवारों में, समाज में, देश विदेश में जितने भी युद्ध हो रहे हैं, शत्रुभाव बढ़ रहा है, इस सबका कारण राग ही है। आसक्ति ही है, अज्ञान ही है। अज्ञान के कारण ही वस्तुओं के प्रति और धन के प्रति लोभ जागृत रहता है। जब हृदय में वस्तुओं के प्रति लोभ जागृत रहेगा, तबतक भाई, बहिन, माता पिता आदि सभी सम्बन्धों की मुख्यता समाप्त हो जाएगी। सांसारिक सुख के लोभी स्त्री पुरुषों के हृदय में जीवित मनुष्यों की अपेक्षा संसार की प्रत्येक वस्तुओं का महत्त्व अधिक होता है। इससे बड़ा अज्ञान और क्या होगा वस्तुएं तो बाजार में मिलतीं हैं और मिलतीं रहेंगी। जब इच्छा हो, जितनी इच्छा हो, जहां इच्छा हो खरीद सकते हैं। किन्तु माता पिता, भाई बन्धु, बहिन आदि का शरीर एकबार नष्ट हो जायेगा तो इस संसार में दूसरे भाई बहिन माता पिता आदि नहीं मिलेंगे। रागी मनुष्य को इतना भी ज्ञान नहीं होता है।
क्रुध्यत्यन्यो ह्यलाभत:
यदि वस्तु का अलाभ होता है। अर्थात यदि कुछ प्राप्त नहीं होता है तो क्रोध करता है। यदि वस्तु को कोई और ले लेता है, या लेकर के लौटाकर नहीं देता है तो भी क्रोध आता है। यही तो संसार का वास्तविक स्वरूप है। अज्ञान तो सारे संसार में व्याप्त है। सभी जीवों के हृदय में ऐसा घोर अज्ञान रहता है। किंतु मनुष्य को ऐसी बुद्धि प्राप्त है कि वह चाहे तो संसार की प्रत्येक वस्तुओं को त्याग सकता है।
पश्यत्यत्र विरक्त: अत्र न हृष्यति न क्रुध्यति
किन्तु सद्गुरु की कृपा से संसार के यथार्थ स्वरूप को जाननेवाला विरक्त महात्मा इसी संसार को देखते हुए भी न प्रसन्न होता है और न ही क्रोधित होता है, न ही दुखी होता है।
वैराग्यवन्त: खलु भाग्यवन्त:
इस संसार में वैराग्यवाले ही भाग्यशाली हैं। संसार के सभी प्रकार के दुखों से यदि मुक्त रहना है तो वैराग्यसम्पन्न ज्ञानविज्ञान सम्पन्न सद्गुरु के समीप रहकर उनके बताए हुए ज्ञान को आत्मसात करिए और सदा के लिए संसार के दुखों से मुक्त हो जाइए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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