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Saturday, April 20, 2024
धर्म कर्म

आप, अमृत के धोखे में विष तो नहीं खा रहे हैं ?

कुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना हैकुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भगवद्गीता के 18 वें अध्याय के 38 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने रजोगुणी सुख की विशेषता बताते हुए कहा कि –
विषयेन्द्रियसंयोगात् यत् तदग्रेह्यमृतोह्यपमम्।परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्।।
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे पार्थ! संसार के रजोगुण सुख का परिणाम दुख ही है।

इन्द्रियों का विषयों से जब संयोग होता है तो क्षणिक सुख मिलता है। यही सुख रजोगुणी सुख कहा जाता है। इन्द्रियों से जो शारीरिक सुख का अनुभव होता है, वह प्रारम्भ में तो अमृत जैसा ही लगता है, किन्तु परिणाम तो विष के समान ही होता है। अर्थात परिणाम तो विनाशक ही होता है। अर्थात संसार में शारीरिक सुख को मीठा सुख कहना चाहिए। संसार के सभी स्त्री पुरुष इसी सुख में फंसकर विविध प्रकार के दुखदायी कर्म करके दुखी रहते हैं।
विषयेन्द्रियसंयोगात् यत्
संसार में सभी शरीरधारी जीवों के शरीर में 5 इन्द्रियां होतीं हैं।
(1) नेत्र (2) नासिका (3) कान (4) जिह्वा (5) त्वचा ये 5 इन्द्रियां हैं। इनसे ही संसार के प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान होता है, इसलिए इनको ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं।
अब इनके 5 विषय देखिए –
(1) नेत्र से रूप का ग्रहण करते हैं। रूप विषय है।
(2) नासिका से सुगन्ध दुर्गध का ग्रहण करते हैं। गन्ध विषय है।
(3) कान से शब्द का श्रवण करते हैं। शब्द विषय है।
(4) जिह्वा से रस का ग्रहण करते हैं। रस विषय है।
(5) त्वचा अर्थात चमड़ी से ठंडे गरम गुण को ग्रहण करते हैं। शीत उष्ण स्पर्श विषय है।
शब्द, स्पर्श, रूप रस और गन्ध इनके अतिरिक्त इस संसार में छठवां कोई विषय ही नहीं है।
विषय का अर्ध होता है, बांधनेवाला। वि अर्थात विशेषरूप से, षय अर्थात बांधनेवाला। जीवों को जो बांध लेता है, उसे विषय कहते हैं। शब्द आदि गुण, विषय कहे जाते हैं। ये गुण जड़ पदार्थों में रहते हैं। यदि इन्द्रियों का संयोग नहीं होता है, या इन्द्रियों में विकलांगता है तो विषयों का आनन्द नहीं आता है। बहरे को शब्द का सुख नहीं मिलता है। अंधे को रूप का आनन्द नहीं मिलता है। त्वचा की विकलांगता से स्पर्श का आनन्द नहीं मिलता है। जिह्वा की विकलांगता से रस का आनन्द नहीं मिलता है।

नासिका की विकलांगता से गन्ध का आनन्द नहीं मिलता है। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि हे अर्जुन! जब स्वस्थ इन्द्रियों का संयोग ,विषयों के साथ होता है, तभी वह सुख मिलता है। यह विषय सुख इन्द्रियों की स्वस्थता पर आश्रित है। इन्द्रियां भी सदा स्वस्थ नहीं रहतीं हैं। वे भी काल अर्थात समय के अधीन है। कुछ समय के बाद इन्द्रियां भी शिथिल होती हैं। फिर तो विषय उपस्थित होने पर भी आनन्द नहीं ले सकते हैं। अब देखिए कि इस आनन्द में बांधनेवाला और बंधनेवाला मन भी है। ये मन भी बहुत सूक्ष्म है। ये दिखता नहीं है, किन्तु सम्पूर्ण शरीर का संचालन करता है। यदि मन दुखी हुआ तो स्वस्थ इन्द्रियों से भी सुख नहीं मिलता है। इसका तात्पर्य यह है कि मन तथा इन्द्रियों के संयोग के पश्चात ही विषयों का संयोग होता है, तभी विषयानन्द मिलता है।
यह आनन्द कैसा होगा तो सुनिए –
तदग्रेह्यमृतोपम् –
यह शारीरिक तथा मानसिक आनन्द अग्रे अर्थात प्रारम्भ में तो अमृत जैसा लगेगा। जैसे देवता और दैत्य अमृत के लिए लड़ रहे थे, ऐसे ही सारे स्त्री पुरुष इस विषयामृत के लिए लड़ते रहते हैं। उनको लगता है कि यदि इस संसार में यह सुख नहीं मिलता है तो सबकुछ व्यर्थ है। यह जीवन ही इसी के लिए है। इसलिए सभी स्त्री पुरुष इस प्रारम्भिक अमृततुल्य विषयभोग के लिए धैर्य, संयम ,नियम धर्म आदि सब छोड़कर अपनी पूरी शारीरिक शक्ति का तथा बौद्धिक शक्ति का उपयोग करने लगते हैं। बस, इसी विषयामृत के लिए चोरी, डकैती, ठगी, बेईमानी, घूस, धोखा आदि करने लगते हैं। अब ऐसे भोगी स्त्री पुरुषों की बुद्धि इतनी विकृत हो जाती है कि सोचने की शक्ति समाप्त हो जाती है। इस विषयामृत के लिए मानवसमाज के विपरीत कार्य करने लगते हैं।
अब इस विषयामृत पान करने का परिणाम भी देखिए –
परिणामे विषमिव
अब जब धैर्य और धर्म ,तथा संयम नियम छोड़कर विषयों का ग्रहण करते हैं तो लोभ की वृद्धि होती है। धन के लिए ऐसे भगे कि जेल ही चले गए। विषय ग्रहण में विघ्न आए तो क्रोध में विघ्नों के नाश के लिए हत्याएं भी करते हैं। अब विषयामृत का परिणाम दुख ही दुख है। यदि ऐसा नहीं भी किया तो प्रारम्भिक विषयामृत के लोभ की वृद्धि से मोह की वृद्धि होती है। बस, पत्नी, पति, पुत्र, पुत्री, पौत्र ,रिश्तेदारी आदि में ऐसा खोया कि सम्पूर्ण जीवन इनकी चिंता में ही चला गया। न सामाजिक यश हुआ और न ही धार्मिक कार्य कर पाए, तथा न ही कोई जप, तप, ध्यान सत्संग कर पाए। बस, जैसे आए थे वैसे ही चले गए। यह परिणाम भी अच्छा नहीं रहा।
पारिवारिक सुख को क्या कहते हैं?
तत् सुखं राजसं स्मृतम्
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि ऐसे दुखदायी सुख को राजसी अर्थात रजोगुणी सुख कहते हैं। वास्तव में ये शान्ति और संतोष देनेवाला सुख नहीं है। ऐसे पारिवारिक, शारीरिक, सामाजिक सुख को दुखदायी सुख कहते हैं।
मात्र इसी सुख के पीछे भागनेवाले स्त्री पुरुष या तो अपराधी हो जाते हैं, या फिर वे न समाज के काम के रहते हैं और न ही धार्मिक पुण्यात्मा होते हैं। इनके जीवन के आदि, मध्य और अन्त में दुख ही दुख रहता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA

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