Please assign a menu to the primary menu location under menu

Saturday, November 26, 2022
खास समाचारडेली न्यूज़

मोतियाबिंद का केन्द्र बन रहा छतरपुर जिला

मोतियाबिंद का केन्द्र बन रहा छतरपुर जिलामोतियाबिंद का केन्द्र बन रहा छतरपुर जिला
Visfot News

छतरपुर। पिछले डेढ़ साल से लोग कोरोना महामारी पर चर्चा कर रहे हैं। इसी बीच कई दूसरे रोग भी हैं जिनके रोगी तेजी से बढ़ रहे हैं। छतरपुर जिले में आंखों के रोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक जिले भर में हर साल लगभग 10 हजार से अधिक मोतियाबिंद के मरीज मिल रहे हैं। इसके अलावा इस रोग को लेकर क्षेत्र में कई तरह की गलत धारणाएं हैं। कुछ लोग मोतियाबिंद होने के बाद भी लैंस प्रत्यारोपण कराने से डरते हैं और फिर यही मोतियाबिंद कांचिया बिंद अथवा ग्लूकोमा में बदल जाता है जिससे आंख की रोशनी पूरी तरह से चली जाती है।

नेत्र शिविरों में मिल रहे मरीजों के चौकाने वाले आंकड़े

जिले में हर साल सामने आने वाले मोतियाबिंद के मरीजों का सही-सही आंकड़ा कहीं उपलब्ध नहीं है लेकिन यदि मरीजों की पहचान के लिए मौजूद केन्द्रों के आंकड़ों को समझें तो यह संख्या 10 हजार से ऊपर हो सकती है। सिर्फ जिला मुख्यालय पर ही हर महीने तीन नेत्र परीक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं। हनुमान टौरिया सेवा समिति के द्वारा हर महीने की 26 तारीख को नेत्र शिविर आयोजित किया जाता है। समिति के गिरजा पाटकर बताते हैं कि कोरोना के कारण पिछले एक साल में कई बार शिविर रद्द करना पड़ा फिर भी सिर्फ इसी शिविर से लगभग 1500 मोतियाबिंद के मरीज साल भर में हमें मिले हैं। दो अन्य शिविरों में भी मोतियाबिंद के मरीजों की संख्या 2000 के आसपास है। ये तो हुए वे शिविर जो गरीब और आम लोगों के लिए सामाजिक संस्थाएं सिर्फ जिला मुख्यालय पर लगा रही हैं। इनके अलावा जिले में मौजूद 6 से ज्यादा नेत्र चिकित्सकों के क्लीनिक पर एवं जिला अस्पताल में भी मरीज पहुंचते हैं। इन सभी केन्द्रों पर पहुंचने वाले मरीजों की संख्या को जोड़ा जाए तो यह अनुमान सामने आता है कि हर साल 10 हजार से ज्यादा मोतियाबिंद के मरीज सामने आ रहे हैं।

क्या है मोतियाबिंद, कैसे करें उपचार

छतरपुर के जाने-माने नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. कपिल खुराना बताते हैं कि कुदरत हमें कैमरे की तरह आंख में एक लैंस देती है इसी लैंस के माध्यम से रोशनी आंख के भीतर मौजूद रेटीना नामक पर्दे तक पहुंचती है जब इस लैंस पर सफेदी छा जाती है तो रोशनी रेटीना तक नहीं पहुंचती और इंसान को धुंधला नजर आने लगता है। इसी रोग को मोतियाबिंद कहा जाता है। आमतौर पर लोगों की धारणा है कि यह बीमारी सिर्फ उम्रदराज लोगों को होती है यह धारणा गलत है। मोतियाबिंद छोटे बच्चों से लेकर हर उम्र के लोगों को हो सकता है। इसके अलग-अलग कारण होते हैं। कई बार गर्भवती महिलाओं के द्वारा गलत दवाएं लेने अथवा समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों में भी मोतियाबिंद पाया जाता है। मोतियाबिंद का बड़ा कारण उम्र ही है लेकिन आंख में लगी चोट, अनियमित शुगर का स्तर या फिर करेंट लगने के कारण भी लोगों को मोतियाबिंद की बीमारी हो जाती है। इसके लिए एक मात्र उपचार लैंस का प्रत्यारोपण होता है। कुदरत ने जो लैंस हमारी आंख में दिया है उसे हटाकर उसकी जगह एक कृत्रिम लैंस लगा दिया जाता है जिससे व्यक्ति को पहले की तरह ही नजर आने लगता है।


… लेकिन ऑपरेशन में सावधानी जरूरी

डॉ. कपिल खुराना कहते हैं कि आधुनिक तकनीक के कारण लेजर और फेको पद्धतियां इस ऑपरेशन को बहुत आसान बना देती हैं। सिर्फ आधे घंटे में ही ऑपरेशन पूरा हो जाता है और वह घर जा सकता है। व्यक्ति 8 से 9 दिनों बाद बगैर काले चश्मे के सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं लेकिन डॉ. खुराना कहते हैं कि यह ऑपरेशन दो लिहाज से चुनौतीपूर्ण होता है। पहला इस ऑपरेशन के लिए लैंस का चयन आंख के हिसाब से करना होता है जो कि एक अच्छे नेत्र विशेषज्ञ के माध्यम से ही संभव है। दूसरी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह ऑपरेशन एक ही बार हो सकता है। इसलिए असफल ऑपरेशन की गुंजाइश नहीं है। यदि ऑपरेशन गलत हुआ तो उसे सुधारा नहीं जा सकता और व्यक्ति को धुंधलेपन की समस्या से निजात नहीं मिलती इसलिए लैंस और डॉक्टर का सही होना जरूरी है।

नि:शुल्क से लेकर 25 हजार तक का ऑपरेशन

मोतियाबिंद के मरीजों के लिए चिकित्सकीय सुविधाएं कई विकल्पों में मौजूद हैं। जिला अस्पताल में नेत्र वार्ड के प्रभारी डॉ. जीएल अहिरवार बताते हैं कि जिला अस्पताल में यह ऑपरेशन पूरी तरह नि:शुल्क किया जाता है। सद्गुरू नेत्र चिकित्सालय चित्रकूट में होने वाले ऑपरेशन के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता गिरजा पाटकर ने बताया कि यहां मोतियाबिंद के मरीजों की पहचान कर उन्हें तीन वर्गों में बांटा जाता है जो पूरी तरह से गरीब हैं उनके ऑपरेशन नि:शुल्क होते हैं। सक्षम लोग अपने हिसाब से तीन हजार से लेकर 5 हजार तक का लैंस लगवाते हैं और सक्षम लोग विदेशी लैंस 25 हजार रूपए तक का लगवाते हैं। इसी तरह निजी क्लीनिक में भी 5 हजार से लेकर 25 हजार रूपए तक की लैंस कीमत पर यह ऑपरेशन हो जाता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »