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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

जो कर्म प्रारम्भ में विष जैसे लगते हैं, वही कर्म अंत में सुखदायी होते है

कुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना हैकुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवद्गीता के 18 वें अध्याय के 37 वें श्लोक में अर्जुन को वास्तविक सुख प्राप्त करने की युक्ति बताते हुए कहा कि –
यत् तदग्रे विषमिव परिणामेह्यमृतोपमम्।
तत् सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्।।
जिस कर्म को करने में प्रारम्भ में तो विष जैसा लगता है, किन्तु परिणाम में प्रसन्न मन बुद्धि से जो सुख उत्पन्न होता है, वही सुख सात्विक सुख कहा जाता है। ऐसे सुख को ही वास्तविक सुख कहते हैं।
यत् तदग्रे विषमिव
संयम, नियम, स्वाध्याय, तथा सत्कर्म सभी स्त्री पुरुषों को अच्छे नहीं लगते हैं। एक निश्चित समय में प्रात:काल उठना, एक निश्चित समय में सोना, शरीर को स्वस्थ सुरक्षित रखनेवाला पवित्र भोजन करना, श्रेष्ठ जनों का संग करना, व्यर्थ की बात न करना, किसी की स्त्री की इच्छा न करना, किसी के पुरुष की इच्छा न करना, किसी के धन की इच्छा न करना, अपने परिश्रम से प्राप्त धन से ही जीवन चलाना, बेईमानी न करना, मुख से जो वाणी निकले, उसका पालन करना, असत्य नहीं बोलना, अपने धर्म का पालन करना आदि नियमों का पालन करना तथा मन बुद्धि को संयमित नियन्त्रित करना आदि कर्म किसी को अच्छे नहीं लगते हैं। विष जैसे लगते हैं।
इन सभी प्रकार के सत्कर्मों को करने के लिए आलस्य प्रमाद आता है। कठिनाई होती है। ये सत्कर्म करने के लिए कहनेवाले व्यक्ति माता पिता, गुरू आदि तक अच्छे नहीं लगते हैं। टोकना और रोकना तो आपको बहुत ही बुरा लगता है।
आप जब अपने मन के अनुसार कोई भी कर्म करते हैं, तो उस कर्म से आपका भविष्य ही अन्धकारमय हो जाता है। क्योंकि आपको तो देर से सोना और देर से जगना अच्छा लगता है। जो भी स्वादिष्ट होता है, वही खाना अच्छा लगता है। जहां जाने से आपका समय व्यर्थ में चला जाता है, वही अच्छा लगता है। अर्थात आपको अपने आप करना अच्छा लगता है, वह सभी कार्य अभी तो अच्छे लगते हैं,किन्तु अन्त में यही परिणाम देखने को मिलता है कि जो नियम संयम से शारीरिक क्रियाएं भी नहीं करते हैं, वे कुछ समय तक ही सुख का अनुभव करते हैं। कुछ समय बाद तो वह रोगी हो जाते हैं। समाज में उनकी कोई प्रतिष्ठा भी नहीं रह जाती है। अर्थात फिर वह बड़े होकर जो जो चाहते हैं, वह उसे जीवनभर नहीं मिलता है।
इसीलिए भगवान ने कहा कि सत्संग, स्वाध्याय, संयम,सत्कर्म, व्रत उपवास, जप तप आदि सभी नियम प्रारम्भ में तो विष जैसे ही लगते हैं, किन्तु कुछ वर्षों तक सदाचार करने के बाद मन प्रसन्न रहने लगता है, बुद्धि अच्छे बुरे का विवेक करने लगती है। कुसंग और कुसंगी मनुष्यों से दूर रहने से सभी प्रसंशा भी करते हैं। आप जीवनपर्यंत जो चाहते हैं, वह सुख सदा ही मिलता रहता है। इसी सुख को प्राप्त करने के लिए संयम, नियम, तपस्या, धर्म, पवित्रता आदि को धारण करना चाहिए।
परिणामेह्यमृतोपमम्
सुपाच्य, पवित्र भोजन करते रहने से शरीर निरोग रहता है। हां, पवित्रता रखने के लिए कठिनाई तो होती ही है। समय से भोजन करने के लिए समय से जागना सोना आदि करना होगा। अपने शरीर के लिए, अपने मन को प्रसन्न रखने के लिए तथा बुद्धि को विवेकिनी बनाने के लिए आलस्य प्रमाद उपेक्षा आदि दुर्गुणों को त्यागना पड़ता है, तब परिणाम अमृत के समान होता है। स्वस्थ शरीर में इंद्रियाँ, मन और बुद्धि सदा ही बिना भोग्य पदार्थ के ही प्रसन्न रहते हैं। इस प्रसन्नता को ही सात्विक सुख कहते हैं।
तत् सुखं सात्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्
मन और बुद्धि की प्रसन्नता से होनेवाले आत्मिक सुख को सात्विक सुख कहते हैं।
सात्विक सुख को प्राप्त करने के लिए सात्विक भोजन तथा शास्त्रों में कहे गए धर्म में सात्विक श्रद्धा तथा सात्विक सत्कर्म करने होंगे। तभी आदि से अन्त तक मन नियन्त्रित रहेगा तथा बुद्धि में विवेक करने की क्षमता रहेगी। संसार के बड़े से बड़े दुख आने पर भी धैर्य और धर्म दोनों धारण करने की शक्ति प्राप्त होती है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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