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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

यदि आप व्रत उपवास करते हैं तो थोड़ी ये भी जानिए समझिए

यदि आप व्रत उपवास करते हैं तो थोड़ी ये भी जानिए समझिए

जानिए गुरुमंत्र एक आसन पर बैठकर और चलते फिरते करने का क्या महत्व हैजानिए गुरुमंत्र एक आसन पर बैठकर और चलते फिरते करने का क्या महत्व है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत 9 वें स्कन्ध के 49 वें अध्याय के 32 वें श्लोक में जरत्कारु ऋषि ने अपने ही नामवाली पतिव्रता पत्नी नागकन्या जरत्कारु से कहा कि –
व्यर्थं व्रतादिकं तस्या: या भर्तुश्चापकारिणी।
तपश्चानशनं चैव व्रतं दानादिकं च यत्।
भर्तुरप्रियकारिण्या: सर्वं भवति निष्फलम्।।
जरत्कारु ऋषि ने कहा कि हे साध्वि! जो स्त्री अपने पति के साथ दुव्र्यवहार करती है, बात बात पर अपमानित करती है, पति पर क्रोध करती है, उसका अपकार करती है, ऐसी कलहकारिणी, अकारण क्रोध करनेवाली, स्त्री जो भी दान करतीं हैं, जो भी उपवास करतीं हैं, तथा निर्जल, निरन्न व्रत भी करतीं हैं, कठोर से भी कठोर तपस्या भी करतीं हैं, उनका किया गया ये सबकुछ व्यर्थ हो जाता है। मात्र शारीरिक कष्ट ही समझो। उसका किया गया सारा सत्कर्म निष्फल हो जाता है। अर्थात व्रत उपवास तपस्या आदि के नियमों को सतर्कता से पालन करने पर भी सबकुछ ऐसे निष्फल हो जाता है, जैसे कोई व्यक्ति फलदार वृक्ष लगाए, उसकी रक्षा करे, समय समय पर जल भी दे किन्तु उस वृक्ष में एक भी पुष्प तक न आए, एक भी फल ही न आए, इसी को निष्फल कहते हैं।
व्रत उपवास आदि क्यों किए जाते हैं? सबसे पहले इस विषय पर विचार कर लीजिए! व्रत और उपवास जिह्वा के नियन्त्रण के लिए किए जाते हैं। व्रतों के नियमों में जो भोज्य पदार्थ का या फल भोजन करने के लिए विधान किया जाता है, उस एक ही पदार्थ का रात दिन में एकबार सेवन करने से अनेक स्वादिष्ट पदार्थों में जानेवाले मन का नियन्त्रण होता है। मन को नियंत्रित करने की विधि को ही व्रत उपवास का फल समझना चाहिए। जिह्वा को नियंत्रित करना तथा मन को नियंत्रित करना ही तो सबसे अधिक दुष्कर कार्य है। उपवास में तो किसी भी अन्न का उपयोग नहीं किया जाता है। यदि सहन नहीं हो रहा है तो फलों का आहार किया जाता है। उनमें भी कुछ फलों का निषेध होता है। व्रत उपवास में कौन से फल का आहार करना चाहिए और कौन से फलों का आहार नहीं करना चाहिए? इसका भी नियम होता है। कब करना चाहिए और कितनी मात्रा में करना चाहिए? इसका भी नियम होता है। कितनी बार करना चाहिए? इसका भी नियम होता है। जिह्वा और मन जिनका स्वतन्त्र होता है, वह अधिक दिनों तक निरोगी नहीं रह सकते हैं। अनियंत्रित मन ही तो संसार में अपयश बदनामी के कार्य करने को प्रेरित करता है।
इसलिए शास्त्रों में सभी जाति के स्त्री पुरुषों के लिए व्रत उपवास तप आदि का विधान किया गया है। शरीर में भूख सहने करने की क्षमता में वृद्धि होती है। मिलिट्री में भर्ती हुए जवानों को हर परिस्थिति में जीवित रहने की ट्रेनिंग दी जाती है। वजन लादकर दौडऩा, कम से कम भोजन में पूरे पूरे दिन रहना, भयानक ठंड में रहना तथा भयानक गर्मी में ,तपन में रहना आदि शारीरिक क्षमता को बढ़ाता है। मनोबल को बढ़ाता है। वे लोग भी वास्तव में तपस्या और व्रत उपवास के समान ही क्रिया करते हैं, सहते रहते हैं। किन्तु उनकी इस क्रिया में ईश्वरीय भावना नहीं रहती है, स्वतन्त्रता भी नहीं रहती है। उनको ऐसा करना ही पड़ता है। ये वहां का नियम ही है। मिलिट्री के जवानों को अपने अधिकारी की आज्ञा मानना ही पड़ेगी। वो जो भी कहेगा, जब भी कहेगा, वो करना ही पड़ेगा । जवानों को अपने क्रोध पर भी नियन्त्रण रखना पड़ता है। अपने अधिकारी पर क्रोध आने पर भी क्रोध में कोई एक वाक्य या एक शब्द भी नहीं बोल सकते हैं। यदि कोई जवान क्रोध में अपने अधिकारी को कुछ भी बोलता है तो निकाल दिया जाएगा। उसका किया गया इतना सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। उसका परिश्रम फिर देश की रक्षा के काम नहीं आएगा। वह सब किया कराया निष्फल हो गया। बस, ऐसा ही व्रत उपवास करने का फल समझिए। क्रोध में नियन्त्रण करने के लिए, तथा भोग में नियन्त्रण करने के लिए ही व्रत उपवास आदि हैं। जब मन पर नियंत्रण हो जाता है, शरीर पर नियंत्रण हो जाता है, तभी ये कहा जाता है कि व्रत उपवास तप आदि से अन्त:करण हृदय शुद्ध होता है।
मन और तन दोनों को नियंत्रित करने का नाम ही मन और तन की शुद्धि है। आप व्रत उपवास आदि भी करते जाएं और अपने पुत्र पुत्री, पति, सास, ससुर, देवर, देवरानी, बहु, माता पिता आदि पर क्रोध भी करते जाएं, तो समझिए कि जिस मन को, जिस तन को नियंत्रित करने के लिए आपने व्रत उपवास किए थे, वह नियन्त्रण नहीं हो रहा है, इसी को व्रत उपवास की निष्फलता कहते हैं। इसलिए सभी व्रत उपवासों में मौन रहने के लिए कहा जाता है। नियन्त्रित निश्चित अन्न या फलाहार करने के लिए कहा जाता है। यदि आप बोलेंगे तो बस, बोलते ही चले जाएंगे। बात बात में बात बढ़ती जाएगी, और फिर क्रोध भी आने लगेगा। बस, फिर क्या है? आपके मुंह से किसको क्या निकल रहा है, ये भी पता नहीं चलेगा। इसलिए भगवान पर श्रद्धा विश्वास करते हुए व्रत उपवास आदि के नियमों का पालन करते हुए आत्मनियंत्रण करना चाहिए। यही व्रत उपवास आदि का फल होता है। यदि आत्मनियंत्रण नहीं रहा तो इसीलिए उसको निष्फल कहा जाता है। सार्थक व्रत उपवास करेंगे तो ज्ञान भक्ति तथा शक्ति सबकुछ प्राप्त होता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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