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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

हां जी, इस प्रकार के भी स्त्री पुरुष होते हैं

कुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना हैकुमार्गगामियों पर विश्वास करना, आत्महत्या करना है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भगवद्गीता के 18 वें अध्याय के 39 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को तीसरे प्रकार के तमोगुणी सुख का लक्षण बताते हुए कहा कि
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन:।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत् तामसमुदाहृतम्।।
जो स्त्री पुरुष, निद्रा को ही सुख मानकर सोते रहते हैं, आलस्य प्रमाद करके कोई भी कार्य समय पर नहीं करते हैं। कार्य करने के बाद कहते हैं कि मैं नहीं करता तो ये कार्य नहीं होता। समय पर कोई कार्य न होने पर भी सुख का अनुभव करते हैं। इस प्रकार की अव्यवस्थित कार्यशैली में भी, रात दिन सोने में तथा आलस्य में भी जिसका मन सुख मानकर फंसा रहता है। ऐसे सुख को तामस सुख कहते हैं।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं सुखम्,
निद्रा अर्थात सोना, आलस्य अर्थात जागते हुए भी इन्द्रियों का सोना। निद्रा और आलस्य इन दोनों से ही जो सुख का अनुभव होता है, उसे तामससुख कहते हैं। तमोगुण में नींद बहुत आती है और स्नान करने के बाद भी नींद जैसी स्थिति बनी रहती है, उसको आलस्य कहते हैं। फुर्ती नाम की चीज ही नहीं होती है। दो मिनिट का कार्य दस मिनिट में धीरे धीरे करते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से एक ऐसे सुख को बताया, कि जिसमें मन सदा ही डूबा रहता है। ऐसे स्त्री पुरुष को संसार में कोई भी कभी भी किसी भी उपाय से नहीं समझा सकता है। क्योंकि उनका मन ही घोर अंधकार में डूब जाता है। तमोगुणी सुख को ही तामससुख कहते हैं। तमस अर्थात अन्धकार। तमस को ही तामस कहते हैं। जैसे अंधेरे में खड़े हुए किसी व्यक्ति को संकेत दिखाकर मार्ग नहीं दिखा सकते हैं, मात्र दाहिने बाएं, सीधे, पीछे आदि शब्दों को ही बोल सकते हैं। अंधेरे में खड़ा हुआ व्यक्ति यदि आपके बताए हुए दाहिने बाएं, सीधे, नीचे आदि शब्दों के अर्थ ही नहीं समझता है तो उसके सुनाई देने का कोई मतलब नहीं है।
आप दाहिने कहेंगे तो वह बाईं ओर चलता हुआ कहेगा कि ऐसे, ऐसे..। तो बतानेवाला ही थक जाएगा और छोड़कर बैठ जाएगा। सोचेगा कि अब मैं इनको न तो दुख से बचा सकता हूं और न ही अकालमृत्यु से बचा सकता हूं।
सुखं मोहनमात्मन:
निद्रालु तथा आलसी स्त्री पुरुषों को सोने में तथा आलस में भी सुख का अनुभव होता है। उनका मन इसी सुख में मोहित रहता है। इस अवस्था को वे समझाने पर भी नहीं बदलते हैं। क्योंकि सुख में ही मन भ्रमित होता है। जिन स्त्री पुरुषों में तमोगुण की मात्रा अधिक होती है, वे सदा ही गंदे कपड़े पहनने में भी लज्जित नहीं होते हैं। युवावस्था में होते हुए भी , शरीर से व्यवस्थित सुगठित होने पर भी, कार्य करने में सक्षम होने पर भी, स्वच्छता से कोसों दूर रहते हैं। कितनी भी गंदी जगह में बैठ जाते हैं, कहीं भी कभी भी सो जाते हैं। बिना हाथ धोए गंदे हाथों से ही खाने लगते हैं। सो जाते हैं तो जबतक जगाओ नहीं तो जगते ही नहीं हैं। कितना भी स्वच्छ सुन्दर भवन दे दिया जाए, उसे नरक बना देते हैं। न तो कोई वस्तु व्यवस्थित सुरक्षित होती है और न ही वे स्वयं ही स्वच्छता से रहते हैं।
पूरे दिन काम करते हुए भी उनका काम समाप्त नहीं होता है। अपने शरीर को ही नहीं सम्हाल पाते हैं। ऐसे स्त्री पुरुषों का विवाह भी होता है, बच्चे भी होते हैं, किन्तु वे अपने बच्चों को भी इसी गंदी परिस्थिति में ही पालते पोषते हैं। आपको देखकर दया आती है कि बेचारे कितने दुखी हैं, किन्तु वे दुखी नहीं होते हैं, वे उसी में सुख का अनुभव करते हैं। क्योंकि दुख आनेपर तो वे भी रोते चिल्लाते हैं। यदि उनको ऐसी अवस्था में दुख होता तो वे ऐसे रहते ही नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि एक अच्छा व्यक्ति जिस अवस्था को दुख की अवस्था मानता है, उस दुख की अवस्था को निद्रालु आलसी तमोगुणी स्त्री पुरुष सुख का अनुभव करते हैं। गंदगी को ही जीवन का अंग मानते हैं। ऐसे तमोगुण प्रधान स्त्री पुरुषों की बुद्धि जड़ होती है। न तो वे कुछ सीख पाते हैं और न ही किसी को देखकर अच्छे आचरणों का अनुकरण कर सकते हैं। वे जैसे हैं, वैसे ही आजीवन रहते हैं। काम और क्रोध तो भरा ही रहता है।
यदग्रे चानुबन्धे च
अनुबन्ध अर्थात एक निश्चित कर्म में ही शारीरिक क्रियाएं ही सबसे पहले होतीं हैं। उनमें भी आलस्य और निद्रा से भरे हुए रहते हैं। ऐसे स्त्री पुरुष दुखी होने पर भी अपने आप को सुखी मानते हैं। न तो इनको समाझाया जा सकता है और न ही शिक्षित किया जा सकता है। यदि ऐसा पति या पत्नी या पुत्र पुत्री है तो एक अच्छे सामाजिक धार्मिक व्यक्ति को भगवान की सृष्टि मानकर स्वयं को व्यवस्थित रखे, इनके आचरणों से दुखी नहीं होना चाहिए। अपना कर्तव्य समझकर पालन पोषण भी करना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति आपके घर में है तो उसको व्यवस्थित करने में अपना समय बरबाद नहीं करना चाहिए। स्वयं को भगवान और सद्गुरु तथा शास्त्रों की सेवा में संलग्न रखना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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