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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

भोगियों की संगति से गुण नष्ट हो जाते हैं

भोगियों की संगति से गुण नष्ट हो जाते हैं

भोगियों की संगति से गुण नष्ट हो जाते हैंभोगियों की संगति से गुण नष्ट हो जाते हैं
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के तीसरे स्कन्ध के 31 वें अध्याय के 33 वें और 34 वें श्लोक में भगवान कपिलदेव जी ने माता देवहूति से कल्याणमार्ग की ओर जानेवाले साधक को इनसे दूर रहने के लिए बताते हुए कहा कि –
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धि:श्रीर्हीयर्श: क्षमा।
शमो दमो भगश्चेति यत् सङ्गाद् याति सङ्क्षयम्।।33।।
कल्याण मार्ग में चलनेवाले स्त्री पुरुषों में 12 गुण होना चाहिए।
(1) सत्य (2)शौच (पवित्रता) (3)दया (4) मौन(5) बुद्धि (अच्छे बुरे का विवेक) (6)श्री (मनोबल) (7)ह्री (लज्जा) (8)यश:(9)क्षमा (10)शम(कामक्रोध में नियन्त्रण) (11)दम( आंख कान इन्द्रियों का नियन्त्रण) (12) भग (संयम की सम्पत्ति)
आपके शरीर में 12 इन्द्रियां हैं।
(1)नेत्र(2)कान(3)नाक(4)जिह्वा (5)त्वचा (6)हाथ(7)पैर(8)लिंग (9)गुदा(10)वाणी(11)(12)बुद्धि
इन बारहों गुणों को धारण करने से इन बारहों इन्द्रियों का नियन्त्रण होता है।
(1) वाणी और जिह्वा का नियन्त्रण –
सात्विक भोजन करने से तथा सत्य बोलने से और मौन रहने से स्वाद लेनेवाली जिह्वा और वाणी का नियन्त्रण होता है।
(2)हाथों पैरों का नियन्त्रण
बुद्धि में अच्छे बुरे का विवेक करने से अच्छे स्थानों में ही जाने का निश्चित करने से तथा अपने परिश्रम से प्राप्त धन का ही उपयोग से हाथ और पैरों का नियन्त्रण होता है।
(3) मन का नियन्त्रण –
किसी के अपराध का चिंतन न करना ही क्षमा है। क्षमा करने से मन का नियन्त्रण होता है।
(4) मानसिक संकल्प का नियन्त्रण –
ह्री अर्थात लज्जा । धर्म और गुणों के विपरीत कर्मों में लज्जा का गुण धारण करने से, बाहर की वस्तुओं का उपयोग न करने से स्त्री पुरुष के भोगने के संकल्प का नियन्त्रण होता है। अर्थात गुणों को धारण करने से दुर्गुणों का नाश होता है। भविष्य में आनेवाले दुर्गुणों की सम्भावना भी नहीं रहती है।
यद् संगात् याति संक्षयम्
किन्तु ये जो बारहों दिव्य गुण बताए गए हैं, वे सभी जिस स्त्री पुरुष की संगति से नष्ट हो जाते हैं, उनकी संगति नहीं करना चामनहिए। क्योंकि सत्य, दया, क्षमा आदि गुणों को धारण करने के लिए जितना परिश्रम किया है, वह सब परिश्रम पानी में चला जाएगा। यदि एकबार संयम टूट गया तो फिर इन गुणों को धारण भी नहीं कर सकते हैं। संसार के विषय बहुत बलवान होते हैं। काम, क्रोध लोभ मोह आदि को रोकने के लिए आन्तरिक शक्ति भी क्षीण हो जाती है। इसलिए ऐसे व्यक्ति से दूर रहना चाहिए, जो व्यक्ति हमारी संयम सम्पत्ति का विनाशक हो। कितने प्रकार के व्यक्तियों से विशेष दूर रहना चाहिए? तो ध्यान दीजिए।
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु।
सङ्गं न कुर्यात् शोच्येषु योषित् क्रीडामृगेषु च।।34।।
अशान्त, मूढ़, खण्डितात्मा अर्थात चरित्रहीन, असाधु अर्थात दुष्ट मांसाहारी हिंसक,तथा जो स्त्री, पुरुषों में भोगबुद्धि रखती है,तथा जो पुरुष स्त्रियों में ही सदा भोगबुद्धि रखते हैं।
योषित्क्रीडामृगेषु
जिन पुरुषों को स्त्रियां अपने अधीन रखकर खेलने का हिरण बनाकर रखे हुईं हैं। अर्थात जो पुरुष, स्त्रियों के ही कथनानुसार करते हैं, ऐसे स्त्रीभोगी, सिद्धांत हीन पुरुषों की संगति नहीं करना चाहिए। अब आप ऐसा भी कह सकते हैं कि जो पुरुष, स्त्री और धन तथा भोग और भोजन को ही मुख्य मानता है, ऐसे स्त्री पुरुषों की संगति करने से, इनकी वार्ता करने से तथा इनके भोगरूप सुख को सुख मानने से अच्छे से अच्छे गुण नष्ट हो जाते हैं। ऐसे भोगी स्त्री पुरुषों की संगति करने से लज्जा नष्ट होकर निर्लज्जता आ जाएगी। निर्लज्जता आने के कारण कोई भी दुष्कर्म करने का साहस आ जाएगा। निर्दयता, निर्लज्जता, क्रोध, काम, लोभ मोह आदि दुर्गुण तो संसार का वास्तविक स्वरूप है। किन्तु इस संसार के विरुद्ध दया, क्षमा, सत्य आदि गुण जिस व्यक्ति में होते हैं तो संसार के सभी स्त्री पुरुष ऐसे महापुरुष के समीप जाकर अपने दुखों को दूर करने के लिए सेवा भी करते हैं और धन, मान आदि देते हैं। किन्तु साधक को ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए। अधिक सम्पर्क में आने से साधक की साधना में न्यूनता आने लगती है। सोए हुए दुर्गुण पुन: जागृत होने लगते हैं। इसलिये मोक्षकामी स्त्री पुरुषों को संसारभोगी स्त्री पुरुषों की संगति नहीं करना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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