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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

श्रीराम जी जैसा प्रेम, और लक्ष्मण जी जैसी सेवा, कोई मनुष्य नहीं कर सकता है

श्रीराम जी जैसा प्रेम, और लक्ष्मण जी जैसी सेवा, कोई मनुष्य नहीं कर सकता है

संसार का व्यवहार, प्रेम से अधिक बलवान होता हैसंसार का व्यवहार, प्रेम से अधिक बलवान होता है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के 142 वें दोहे की पहली चौपाई में श्रीराम जी के प्रेम का वर्णन और दूसरी चौपाई में लक्ष्मण जी की सेवा का वर्णन करते हुए तुलसीदास जी ने कहा कि –
सबसे पहले श्री राम जी के प्रेम और सतर्कता का उदाहरण देखिए –
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसे।
पलक बिलोचन गोलक जैसे।।1।।
श्री राम जी, सीता जी की रक्षा तथा प्रसन्नता का, और लक्ष्मण जी की रक्षा और प्रसन्नता का ऐसे ध्यान रखते हैं कि जैसे – आंख की पलकें, आंखों की गोलक की रक्षा करतीं हैं। आंख की पलकों की सतर्कता और आजीवन सुरक्षा का उदाहरण है।
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसे –
भगवान श्री राम जी, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ अयोध्या से चित्रकूट पर्वत में निवास करने के लिए आ गए हैं। अयोध्या के सुखों की सीमा नहीं थी तो आज वनवास काल में दुखों की भी सीमा नहीं है। चित्रकूट एक पर्वत है। उस पर्वत पर अनेक वर्षों से अनेक ऋषि मुनि निवास कर रहे हैं। ऋषि मुनियों को प्राकृतिक ऋतुओं को सहन करना आ गया है। ठंडी, गर्मी, वर्षात ,आंधी, तूफान, वर्षाकाल की श्रावण, भाद्रपद के महीने की अंधेरी रात में वर्षाकाल के मेघों की भयानक गर्जना, बिजली की भयानक चमक, अनेक बार देख चुके हैं। घास पात की कुटियों में बैठे हुए समाधिनिष्ठ महात्माओं के लिए वन पर्वतों की भयानकता कोई नई बात नहीं है। किन्तु सीता जी ने और लक्ष्मण जी ने न तो कभी ये दृश्य देखे हैं और न ही उन परिस्थितियों में रहे हैं। गर्मियों के दिनों के सूर्य भगवान के उस प्रचण्ड प्रखर ताप ये सुकोमल तन कैसे सहेंगे? हेमन्त ऋतु की वह माघ पौष की हिमालय के बर्फ जैसी शीतलता को बिना भवन के और बिना वस्त्रों के ये सीता और लक्ष्मण भला कैसे सहन कर सकेंगे?श्री राम जी के मन में सीता जी की कोमलता का विचार तथा लक्ष्मण जी की कोमलता का विचार बार बार हृदय में आता है। श्री राम जी, दोनों से आगे चलते हैं और बार बार पीछे मुड़ मुड़कर देखते हैं कि सीता जी कैसे चल रहीं हैं और लक्ष्मण जी कैसे चल रहे हैं? आगे के मार्ग को भी देखते जा रहे हैं कि ऐसे मार्ग से चलें कि जहां कांटे, कंकड़ अधिक न हों। श्री राम जी को अपनी तो बिल्कुल ही चिंता नहीं है। बस, पीछे चलनेवाली जनकनन्दिनी के मुख देखते जाते हैं और सीता जी के पीछे चलते हुए लक्ष्मण जी को और अधिक मुड़कर देखते हैं। दोनों के मुख में पसीना देखकर श्रीराम जी के हृदय में ऐसा विचार आता है कि ऐसा क्या करूं कि इन दोनों को थकान न लगे। ऐसा क्या कहूं कि ये दोनों चलते भी चलें और हंसते भी जाएं?
तुलसीदास जी ने श्री राम जी के चित्त का चित्रण करते हुए उदाहरण देते हुए कहा कि –
पलक बिलोचन गोलक जैसे।
सतर्कता का और रक्षा का इससे अच्छा उदाहरण कोई और हो भी नहीं सकता है। आंखों की पलकों के स्थान में श्रीराम जी को रखा है, और आंख की गोलक के स्थान में सीता जी को और लक्ष्मण जी को रखा है। चित्रकूट पर्वत में ऋषिमुनियों का आवागमन हो रहा है। श्री राम जी सबसे वार्तालाप भी करते हैं। सभी प्रकार की वार्ता भी करते हैं। ऋषिमुनि भी राक्षसों के अत्याचार की चर्चा करते हैं। उनके दुखों को भी सुनते हैं। इतना सबकुछ करते हुए भी श्री राम जी का मन सीता जी में और लक्ष्मण जी में रखा है। पास में बैठे हुए लक्ष्मण जी को बार बार देखते जाते हैं और कुटिया में बैठी हुई सीता जी के मुख की ओर भी देखते जाते हैं। अब आप स्वयं ही सोचिए कि आपकी पलकें आंखों का ध्यान कैसे रखतीं हैं? आप लोग आंखों से कुछ देखते हैं तो आपकी पलकें बार बार बीच में आकर देखने में विघ्न नहीं करतीं हैं। हां! एकबात अवश्य है कि जब आंखें, बहुत देर तक देखतीं रहतीं हैं तो पलकें एक क्षण के लिए आंखों को ढंककर आंखों को टटोल लेतीं हैं कि मेरी आंखें कहीं देखते देखते थक तो नहीं गईं हैं? पलकों के रहते कोई भी कुछ भी आंखों तक पहुंच नहीं सकता है। आंखों में धूल का एक कण भी आंखों में जाने के पहले पलकों से टकराता है। यदि धोखे में आंखों में कुछ चला भी जाता है तो फिर पलकें आंखों के ऊपर ऐसी छा जातीं हैं कि आंखों को खुलने ही नहीं देतीं हैं। अब आप समझ चुके होंगे कि श्री राम जी को पलकों के समान क्यों कहा गया है।
अब दूसरी चौपाई में लक्ष्मण जी की सेवा का उदाहरण देखिए –
सेवहिं लखन सीय रघुबीरहिं ।
जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।
लक्ष्मण जी भी जानकी जी की सेवा और राम जी की सेवा, ऐसे कर रहे हैं, जैसे अविवेकी स्त्री पुरुष, अपने शरीर की सेवा करते हैं। सेवा के उदाहरण पर विशेष ध्यान देने योग्य है। अविवेकी स्त्री पुरुष अपने शरीर के सुख के लिए वह सारे नियमों को तथा धर्म को छोड़कर एकमात्र शरीर के सुख पर ही ध्यान देते हैं। विवाहित स्त्री पुरुषों के माता पिता, भाई,बन्धु,बहिन, रिश्तेदार आदि ही मिलकर उनको सहयोग करते हैं। आपत्तिकाल में भी यही सम्बन्धी काम आते हैं। कोई बाहर का अपरिचित व्यक्ति काम नहीं आता है। माता पिता तो साक्षात् ही उसके शरीर को पालते पोषते हैं। शिक्षा देते हैं। सुरक्षा करते हैं। स्वयं दुख उठाकर सन्तान को सभी प्रकार के सुख देते हैं। किन्तु पुत्र और पुत्री ही माता पिता को सबसे अधिक दुख देते हैं। ये अविवेकी पुत्र और अविवेकिनी पुत्री, अपने शरीर सुख के लिए, माता पिता की इच्छा के विरुद्ध आचरण करते हैं। कुल, परिवार तथा समाज की मर्यादा का उल्लंघन कर जाते हैं। इनको इतना भी विवेक नहीं होता है कि हम जिस परिवार के विरुद्ध, जिस समाज के विरुद्ध तथा जिस कुल के विरुद्ध चल रहे हैं, उसी समाज के बिना, उसी परिवार और कुल के बिना जीवन भी पार नहीं कर सकते हैं। न तो भविष्य का विचार करते हैं, और न ही किसी भी नियम को उल्लंघन करने में विचार करते हैं। दुष्परिणामस्वरूप जीवनपर्यंत दुख भोगते रहते हैं, किन्तु आजीवन किसी भी नियम के अनुसार नहीं चलते हैं। इसी को अविवेकी कहते हैं। अविवेकिनी स्त्रियां, भोग और भोजन के सुख के लोभ में वह सबकुछ कर बैठतीं हैं, जो नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार अविवेकी पुरुष भी भोग और भोजन के लोभ में वह सबकुछ कर बैठते हैं, जो नहीं करना चाहिए। अर्थात लक्ष्मण जी भी माता जानकी जी की सेवा तथा श्री राम जी की सेवा करने में ये विचार नहीं करते हैं कि ये धर्म है कि अधर्म है? मेरे ऐसा बोलने से या ऐसा करने से मुझे राम जी छोड़ देंगे कि रखेंगे? सांसार के लोग मेरा अपयश करेंगे या यश करेंगे? मैं जीवित रहूंगा कि मर जाऊंगा? इत्यादि विचार ही नहीं करते हैं। श्री राम जी के विरुद्ध या अपमानजनक एक भी शब्द नहीं सुन सकते हैं। भले ही 21 बार क्षत्रियरहित पृथिवी करनेवाले परशुराम जी ही क्यों न हों। वे मार डालें तो मार डालें, जनकपुरी की जनता भले ही कितना भी बड़ा असभ्य कहें, किन्तु परशुराम जी ने राम जी के लिए जो बोला है, उसका तो उत्तर देना ही है। महाराज दशरथ जी ने राम जी को वनवास दिया है तो अब दशरथ जी को ही मारडालना है। भले ही पिता के मारने से नरक ही जाना पड़े। भरत जी के कारण ही कैकेयी ने वनवास दिया है तो अब भरत को भी मारडालना है। इतना ही नहीं, जिस अयोध्या में भरत जी राज्य करना चाहते हैं, अब उस अयोध्या की जनता को ही मार डालेंगे।
किसके ऊपर राज्य करेंगे?
भाई को मारने का जो फल होगा, पिता को मारने का फल होगा, जनता को मारने का जो फल होगा, जो विनाश होगा इत्यादि कुछ भी विचार नहीं करना है। श्री राम जी ही मेरे सर्वस्व हैं। संसार में कोई भी व्यक्ति मेरे प्रभु को कुछ थोड़ा भी विपरीत बोलेगा तो मर जाऊंगा और मार डालूंगा। न कोई पत्नी, न कोई भोगकामना, न ही कोई और इच्छा है। बस, श्री राम जी ही हैं। इनको ही चाहिए और कुछ चाहिए ही नहीं। अपने धर्म अधर्म, पाप पुण्य,यश अपयश, हानि लाभ, जीवन मरण आदि का विचार ही नहीं करना है। अपना शरीर ही सुखी होना चाहिए। बस, अविवेकिनी स्त्रियों का और अविवेकी पुरुषों का यही सिद्धांत होता है। धन्य हैं लक्ष्मण जी! श्री राम जी के प्रति तथा माता जानकी के प्रति एकधारा वृत्ति हो गई। श्री राम और जानकी जी, शरीर हो गए और लक्ष्मण जी अविवेकी पुरुष हो गए। अब इन दोनों की ही चिंता करना है। इन दोनों की ही सुरक्षा करना है, इन दोनों को ही सुखी करना है। भले ही रात दिन अखण्ड जगना पड़े, अखण्ड भूखा रहना पड़े और भले ही प्राण ही चले जाएं, बस, मेरी प्रसन्नता तो दोनों की प्रसन्नता में है और इनका दुख ही मेरा दुख है। सेवा करनेवाले का ऐसा अविवेकरूप दोष भी आभूषण है, अलंकार है। अपने सुख का परित्याग करना तथा जिसकी सेवा करना है, उसके लिए सभी प्रकार दुखों को सहने में ही सुख मानना अद्भुत समर्पण है। विलक्षण एकात्मता है। मृत्यु को भी स्वीकार कर लेना। अहा! ओहो! आश्चर्य है! इस संसार में ऐसे सेवक तो मात्र भगवान के भक्त ही ऐसे हो सकते हैं। जिस अविवेकी का उदाहरण दिया गया है, वह मनुष्य है। किन्तु जिसके लिए उदाहरण दिया गया है, वे लक्ष्मण जी मनुष्य नहीं हैं। क्यों कि मनुष्य में अविवेक तो होता ही है किन्तु ऐसा समर्पित सेवक मनुष्य नहीं हो सकता है। जिस स्त्री या पुरुष में सेवा के ऐसे गुण होंगे तो वो मनुष्य नहीं होंगे, वे भगवान के भक्त ही होंगे, और जो मनुष्य होंगे तो उनमें लक्ष्मण जी जैसे सेवाभावी गुण नहीं होंगे। इसलिए लक्ष्मण जी को साक्षात् शेषनाग कहा जाता है,और प्रभु श्री राम जी को भगवान नारायण कहा जाता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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