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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

अहंकारी, अज्ञानी मनुष्य,अपशकुन में ध्यान नहीं देते हैं, हानि भी भोगते रहते हैं

अहंकारी, अज्ञानी मनुष्य,अपशकुन में ध्यान नहीं देते हैं, हानि भी भोगते रहते हैं

घूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं हैघूस लेकर काम करना, ये कोई ईमानदारी नहीं है
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
रामचरित मानस के लंकाकाण्ड के 78 वें दोहे की 9 वीं चौपाई के छन्द में तुलसीदास जी ने रावण के मृत्युसूचक अपशकुन बताते हुए कहा कि –
असगुन अमित होहिं तिहि काला।
गनइ न भुजबल गर्व बिसाला।।
रावण जिस समय अपने भवन से युद्ध के लिए युद्धस्थल की ओर सेना के साथ निकला तो मृत्युसूचक जितने अपशकुन होते हैं, वे सभी अपशकुन होने लगे। किन्तु रावण उन मृत्युसूचक तथा पराजयसूचक अपशकुनों पर बिल्कुल ध्यान ही नहीं दे रहा था। क्यों ध्यान नहीं दे रहा था, इसका कारण तुलसीदास जी लिखते हुए कहते हैं कि –
गनइ न भुजबल गर्व बिसाला
अपनी बीस भुजाओं के अहंकार के कारण, गर्व के कारण उन अपशकुनों को तुच्छ समझ रहा था। उसे लगता था कि ये अपशकुन मेरा क्या बिगाड़ लेंगे? संसार में सबके दो हाथ ही हैं, मेरे तो बीस हाथ हैं। शकुन अपशकुन तो बुद्धि के कमजोर तथा बल के कमजोर लोग मानते हैं।
आखिर में रावण की मृत्यु तो उस दिन हो ही गई ।जैसे आजकल के पेटभरनी विद्या के पढ़े लिखे लोगों को विज्ञान का अहंकार रहता है। कहते हैं कि वैज्ञानिक युग में ये सब बातें मानना मूर्खता है।ढकोसले बाजी है। ये आज के शिक्षित व्यक्ति अहंकार के कारण भले ही आध्यात्मिक आधिदैविक शकुन अपशकुन नहीं मानते हैं, किंतु जब कुछ प्राकृतिक आपदा आती है तो रावण के समान ही अन्त में इनकी दुर्दशा होती है। आध्यात्मिक और आधिदैविक प्राकृतिक नियमों को नकारनेवाले आधुनिक शिक्षित मनुष्यों की आगे भी ऐसे ही दुर्दशा होती रहेगी, जैसी दुर्दशा, अपशकुन को न माननेवाले अज्ञानी रावण की हुई थी।
अब छन्द में बताए गए मृत्युसूचक अपशकुनों पर ध्यान दीजिए –
प्रथम अपशकुन
(1) अति गर्व गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते।
रावण तो भले ही इन अपशकुनों कुछ भी नहीं मान रहा था। फिर जो प्राकृतिक रूप से होना था, वो तो होने ही लगा था। रावण के हाथ में जो आयुध अर्थात अस्त्र शस्त्र थे, वे अकारण ही अपने आप हाथ से छूटकर गिरने लगे थे । वह बार बार उठाता था, शक्ति लगाकर पकड़ता था, फिर भी शस्त्र हाथों से फिसल कर रथ में , धरती में गिर गिर पड़ते थे।
दूसरा अपशकुन
(2) भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते।
रावण के योद्धा चलते चलते अपने आप ही गिरने लगे थे। बाजि अर्थात घोड़े हिननहिनाकर उलटे मार्ग में भगने लगे थे । गज अर्थात हाथी भी चिग्घाड़ते हुए अकारण ही सेना का साथ छोड़कर विपरीत दिशा में भगने लगे।
तीसरा अपशकुन
(3) गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने।
गोमायु अर्थात जंगली कुत्ता सियार, गीध, खर अर्थात गधा और श्वान अर्थात कुत्ते घने अर्थात लगातार ही रावण के आगे पीछे बोल रहे थे। अतिघने अर्थात एक का बोलना बंद हो नहीं पाता था कि दूसरा चिल्लाने लगता था।
इन अपशकुनों का फल लिखते हुए तुलसीदास जी ने कहा कि –
जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने।
सियार, गीध, गधा, कुत्ते तथा उल्लू ये सब काल अर्थात मृत्यु के दूत हैं। काल ने रावण के सामने अपने इन दूतों को भेजकर मानो सूचित कर दिया है कि हे रावण! आज तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। तुम्हारा आज का युद्ध ये अन्तिम युद्ध है। अब घर लौटकर नहीं आओगे। यदि किसी के द्वार पर या यात्रा में कहीं सियार, कुत्ते, गधे, गीध आगे पीछे भयानक ध्वनि करते हैं। या उल्लू दिन में या रात में घर के आस पास चिल्लाते हैं तो निश्चित ही है कि कोई न कोई भयानक घटना घटनेवाली है। ये सब कालदूत हैं। दुर्घटना घटने के पहले ही ये सूचित करते हैं। यदि आप कुछ उपाय कर सकते हैं तो किसी अपशकुन शकुन के ज्ञाता महापुरुषों से पूंछिए और बन सके तो उपाय करिए । हो सकता है, कि प्राणघातक दुर्घटना से बच जाएं। इन जीवों की अकारण भयानक क्रिया ही मनुष्य जाति के दुर्दिनों की तथा दुर्दशा की सूचना है। उपाय भी हैं। देवाताओं की आराधना के करने से बड़ी से बड़ी आपत्ति भी हलकी हो जाती है। प्राणघातक दुर्घटनाएं भी अंग भंग होकर निकल जातीं हैं। जो स्त्री पुरुष धन के अहंकार के कारण, बल के अहंकार के कारण तथा वैज्ञानिक शिक्षा के अहंकार के कारण इन प्राकृतिक सुलक्षणों को तथा कुलक्षणों को रावण के समान ही अवहेलना कर देते हैं, मानते ही नहीं हैं, उनके बचने का तो कोई उपाय ही नहीं है। मृत्यु होने के पहले तो कोई भी उपाय हो सकता है, किन्तु मरने के बाद तो फिर कोई भी उपाय नहीं होता है। विज्ञान रक्षा नहीं करेगा। आधिदैविक क्रिया ही मनुष्य की रक्षा करेगी। सभी के पास वैज्ञानिक साधन नहीं होते हैं, किन्तु देवताओं की आराधना के साधन सभी मनुष्यों के पास होते हैं। पूजा सामग्री तथा अपना शरीर और मन तो सभी के पास है। देवाराधन से तो बड़ी से बड़ी आपत्ति भी दूर हो जातीं हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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