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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

संसार का सुख तो चौमासे के गड्ढे के पानी जैसा है

संसार का सुख तो चौमासे के गड्ढे के पानी जैसा है

ओ हो! इस विधि से मृत्यु हो तो क्या कहना!ओ हो! इस विधि से मृत्यु हो तो क्या कहना!
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आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के छठवें स्कन्ध के 12 वें अध्याय के 22 श्लोक में भगवान इन्द्र ने युद्ध में रक्त से लथपथ पड़े हुए वृत्रासुर को भगवान नारायण की स्तुति करते हुए देखकर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ नि:श्रेयसेश्वरे।
विक्रीडितोह्यमृताम्भोधौ किं क्षुद्रै: खातकोदकै:।।
भगवान इन्द्र ने कहा कि – हे दानव वृत्रासुर! जिस स्त्री पुरुष का मन साक्षात् कल्याण के स्वामी , भगवान श्रीहरि में लगा हुआ है, समझो कि वह तो आनन्द के अमृत समुद्र में निवास कर रहा है। संसार के दुखरूप सुख तो चातुर्मास के गड्ढों के पानी के समान हैं,जो कुछ दिनों बाद निश्चित ही सूख जानेवाला है। भगवान श्री हरि की भक्ति में निमग्न स्त्री पुरुषों को संसार के ऐसे सुख से कोई लेना देना नहीं रहता है। वे सदैव ही सुखी रहते हैं,उनको कभी दुखी होना ही नहीं है। भगवान इन्द्र ने कहा कि हे दानव! वास्तव में तुम सिद्ध पुरुष हो, क्यों कि वास्तव में ऐसी पीड़ा से भरे दुखदायी युद्धस्थल में, तथा साक्षात् मृत्यु को सामने खड़ा देखकर भी तुम्हारे मन बुद्धि स्थिर हैं और भगवान जगदीश्वर का स्मरण कर रहे हो।
किं क्षुद्रै: खातकोदकै: –
खातक अर्थात गडढ़ा, उदक अर्थात जल। खातकोदक अर्थात गड्ढे का जल। संसार का प्रत्येक सुख, गड्ढे का पानी है। कुछ समय बाद नष्ट होनेवाले ऐसे सुख से क्या लाभ है? अर्थात कुछ नहीं। इस संसार का प्रत्येक सुख युवावस्था के प्रारम्भ काल से प्रारम्भ होता है, और कुछ समय के पश्चात् अपने आप ही घटते घटते समाप्त हो जाता है। मायामय संसार में दो ही तत्त्व होते हैं, (1) भगवान और (2) शरीरधारी जीव। शेष तो सब जड़ पदार्थ हैं। ये सभी जड़ पदार्थ भी खाद्यपदार्थ हैं। सभी शरीरधारी जीवों का भोजन ही ये संसार है। यहां तक कि यह शरीर भी खाद्य पदार्थ है। सभी जीवों का जीवन एक दूसरे के शरीर से ही चल रहा है। जीव ही जीव का जीवन है। नेत्रों से संसार ही दिखता है। युवावस्था में संसार की छोटी सी छोटी वस्तु भी दिखाई देती है। किन्तु वृद्धावस्था में नेत्रज्योति कम होने पर या समाप्त होने पर यही वस्तुएं फिर नहीं दिखाई देतीं हैं। इसी प्रकार युवावस्था में प्रिय लगनेवाली सुगन्धि भी कुछ समय बाद ग्रहण नहीं कर सकते हैं। दांत टूटने के बाद जिह्वा से स्वादिष्ट भोजन भी नहीं कर सकते हैं। कुछ समय बाद ही कोमल स्पर्श का सुख भी समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार मधुर संगीत का आनन्द भी कानों से ग्रहण नहीं होता। स्त्री पुरुष के संयोग का सुख भी समाप्त हो जाता है। अर्थात शरीर की इन्द्रियों के शिथिल होने के कारण संसार के प्रत्येक सुख स्वत: ही समाप्त हो जाते हैं। जैसे वरषात के समय में चौमासे में पृथिवी के गड्ढे भर जाते हैं। वर्षाकाल समाप्त होते ही गड्ढ़ों का जल, सूर्य के ताप से धीरे धीरे सूखता चला जाता है और एक दिन पूरा ही सूख जाता है। इसी प्रकार युवावस्था के वृद्धिकाल में इन्द्रियों की शक्ति बढ़ती जाती है और, वृद्धिकाल समाप्त होने पर धीरे धीरे शक्ति क्षीण होने लगती है। बस, घटते क्रम में आते ही आंख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा इन इन्द्रियों की शक्ति समाप्त हो जाती है। इस शरीर में रहनेवाले जीव उस सुख के जल के लिए फिर मछली के समान तड़प तड़प कर समाप्त हो जाते हैं। भगवान की कृपा से तथा विद्वान महापुरुष के अनुग्रह से जिन स्त्री पुरुषों को यह विवेक जागृत हो जाता है तो उसे युवावस्था में ही भय लगने लगता है कि ऐसे सुख के लिए इतना दुख क्यों उठाया जाए, जिस सुख को थोड़े दिनों बाद स्वयं ही नष्ट हो जाना है। भगवान इन्द्र ने कहा कि – इस संसार में ऐसा विवेक जिन स्त्री पुरुषों को,जब कभी, जहां कहीं भी, किसी भी उपाय से, किसी भी प्रकार से, किसी भी महापुरुष की संगति से जागृत हो जाता है, उन स्त्री पुरुषों को संसार की सुखदायी प्रत्येक वस्तु से, प्रत्येक स्त्री पुरुषों से भय लगने लगता है। उनको लगता है कि ये स्त्री पुरुष मुझे दुख ही देंगे, ये भोग्य पदार्थ और भोज्य पदार्थ मुझे दुख ही देंगे। क्योंकि अभी तक जिस सुख के लिए मैंने इतने दुख उठाए हैं, वो सुख तो एक क्षण में ही समाप्त हो जाता है। किन्तु इनको प्राप्त करने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है। चौबीसों घंटों के परिश्रम के बाद एक ही क्षण, सुख का अनुभव हुआ है। जिनके लिए रात दिन चिंता करते हैं, वे बड़े होकर दुख ही देते हैं। इसलिए एकक्षण के सुख के लिए इतना समय बरबाद करना ठीक नहीं है। बस, ऐसा विचार आते ही वह इन दुखदायक सुखों को देखकर ऐसे भागता है कि जैसे कारागार से कैदी भागता है। भागते भागते ऐसे स्थानों पर जाना चाहता कि जहां न तो इन मनुष्यों का दर्शन हो, और न ही ये लोग मेरे पास आ पाएं। भागते भागते उसे कोई सद्गुरु के रूप में भगवान ही मिल जाते हैं। सद्गुरुभगवान उसे कहते हैं कि भागने से क्या लाभ है? स्थिर हो जाओ। रुको! इन्द्रियों से काम लेना बंद कर दो। बस, थोड़े दिनों बाद इस संसार के लोग तुम्हें स्वयं ही त्याग देंगे। फिर तो इनके ही बीच में बने रहोगे तो भी ये तुम्हारी तरफ नहीं देखेंगे।
यस्य भक्तिर्भगवति हरौ नि:श्रेयसेश्वरे।
विक्रीडतेह्यमृताम्भोधौ
जिन स्त्री पुरुषों का मन मोक्षदाता भगवान श्री हरि में लग जाता है, वह फिर अमृत अर्थात जो सुख कभी मृत नहीं होता है। अर्थात समाप्त ही नहीं होता है, ऐसे आनन्द के समुद्र में निमग्न हो जाते हैं। भगवान के भजननान्द के आनन्द समुद्र में विहार करनेवाले स्त्री पुरुषों की दृष्टि इन तुच्छ क्षुद्र सांसारिक शारीरिक सुख की ओर जाती ही नहीं है। स्वच्छनिर्झर निर्मल जलपान करनेवाले, कीड़े मकोड़ों से भरे इन गंदे गड्ढों का पानी नहीं पीते हैं। \ यही तो भगवान की भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता होती है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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