Please assign a menu to the primary menu location under menu

Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

भगवान श्री राम ने रावण का वध क्यों किया, और अश्वथामा को क्यों छोड़ दिया? दोषी तो दोनों थे

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावन धाम
सोने से लेकर सोने तक के बीच के समय में जो क्रियाएं मनुष्य करता है,उसे ही तो चरित्र कहते हैं। रावण के अहंकारी स्वभाव और चरित्र का वर्णन तुलसीदास जी ने बालकाण्ड के 183 वें सोरठे औऱ छंद मेंं किया है।
छंद
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।आपन उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना। तिहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह वेद पुराना।।
रावण को कहीं से भी कोई भी बता देता था कि वहां कोई जप,तप,यज्ञ हो रहा है तो,राक्षसों को ही नहीं भेजता था अपितु स्वयं भी ब्राह्मणों को,तपस्वियों को मार मार कर देश से निकाल देता था। कोई वेद पुराण की चर्चा भी नहीं कर सकते थे। धर्म की बात भी नहीं कर सकते थे।
सोरठा – बरनि न जाइ अनीति, घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति,तिन्ह के पापहि कवन मिति “।।
रावण औऱ रावण के अनुचर निशाचरों के पापों की कोई गिनती नहीं थी।फिर श्री राम जी ने, हनुमान जी ने,अंगद जो आदि ने कितना नहीं समझाया है?
इसलिए रावण को मारने के
अतिरिक्त और कोई मार्ग ही नहीं बचा था। अब अश्वत्थामा का चरित्र देखिए।
महाभारत में लिखा है कि अश्वत्थामा ने मात्र अपने जीवन में दुर्योधन के साथ मिलकर अभिमन्यु औऱ द्रौपदी के पांच पुत्रों को मारने के अतिरिक्त कभी कोई अपराध नहीं किया था। दुर्योधन के साथ मिलकर उसने दुर्योधन के अनेक यज्ञ करवाए।उसका स्वभाव धर्म और वेद पुराण,ब्राह्मण विरोधी नहीं था। संगदोष के कारण एक बार किए गए पाप के कारण ही भगवान ने उसे नहीं मारा। फिर भी प्राण दण्ड से बढक़र आजीवन दुख भोगने का दण्ड बड़ा दण्ड है । शास्त्रों का रहस्य तथा भगवान से जुड़े हुए पात्रों के चरित्र का रहस्य किसी विद्वान महापुरुष की सेवा करते हुए शुद्ध हृदय से किए हुए अध्ययन से ही ज्ञात होता है।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »