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Saturday, November 26, 2022
धर्म कर्म

जिस शाशक से महात्मा और ब्राह्मण दुखी रहते हैं वह शाशक सुखी नहीं रह सकता है

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल वृंदावन धाम
रामचरित मानस के अयोध्या काण्ड के 126 वें दोहे की दूसरी और तीसरी चौपाई में श्री राम जी ने महर्षि वाल्मीकि जी से कहा कि
मुनि तापस जिन्ह ते दुख लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।।
जिस शाशक के राज्य में तपस्वी जीवन जीनेवाले महात्मा दुखी रहते हैं, वह शाशक तो बिना अग्नि के ही जलकर भस्म हो जाता है, अर्थात वह शाशक अहंकार की अग्नि में स्वयं ही भस्म हो जाता है। अहंकारी, अत्याचारी शासक के राज्य में प्राय: जनता भी शासक के समान ही अधर्मी कुकर्मी हो जाती है। जनता भी जब अधार्मिक हो जाती है तो वह स्वयं ही महात्माओं को दुखी करने लगती है। महात्माओं को दुखी करने वाले व्यक्ति को शाशक जब दण्डित नहीं करता है तो महात्माओं की रक्षा कोई नहीं करता है। तपस्वी महात्माओं का दुख इतना भयानक होता है कि वह उनका दुखरूप अग्नि सम्पूर्ण राज्य के साथ साथ शाशक को भी भस्म कर डालता है।
मंगलमूल विप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।
वास्तव में ब्राह्मण का संतोष तो सम्पूर्ण संसार का कल्याण करनेवाला है। प्रसन्नचित्त ब्राह्मण के द्वारा दिया हुआ आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं होता है, किन्तु यदि ब्राह्मण हृदय से दुखी होकर क्रोध पूर्वक कुछ कह देता है तो उसके हृदय की धधकती ज्वाला में करोड़ों वंश जलकर राख हो जाते हैं।
दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू
ब्राह्मण ही इस मनुष्य योनि में चलता फिरता धरती का साक्षात देवता है, इसलिए उसको भूसुर अर्थात पृथिवी का देवता कहा जाता है। यदि ब्राह्मण प्रसन्न रहता है तो जनता और शाशक दोनों के लिए ही वरदान है मंगलमूल है। उसके मुख से निकले हुए आशीर्वाद के वचनों का पालन भगवान करते हैं। तपस्वी महात्माओं की रक्षा तथा स्वधर्मनिष्ठ ब्राह्मण की रक्षा से जनता और शाशक की रक्षा होती है। यदि कोई शाशक अथवा जनता तपस्वी महात्माओं को तथा ब्राह्मण को किसी भी प्रकार से दुखी करते हैं तो ब्राह्मण और तपस्वी महात्माओं के दुखी हृदय से निकले हुए आग से मानव समाज और शाशक दोनों ही जलकर भस्म हो जाते हैं। इसलिए शाशक और जनता को, तपस्वी महात्माओं की रक्षा तथा ब्राह्मण की रक्षा अवश्य ही करना चाहिए।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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