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Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

जानिए जप करने वाली माला में 108 मनके क्यों होते हैं और उनका महत्व?

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल,वृंदावन धाम
जिज्ञासा ही ज्ञान की प्रथम सीढ़ी है। व्यास भगवान ने “ब्रहसूत्र ” ग्रन्थ मेंं प्रथम सूत्र लिखा है अथातो ब्रह्म जिज्ञासा जानने की इच्छा को जिज्ञासा कहते हैं। मनुष्य को जानने की इच्छा जाग्रत करना चाहिए। आजकल बहुत लोग कहते हैं कि हम इन सबमें ज्यादा दिमाग नहीं लगाते हैं।कौन फालतू की बातों को इतना सोचे। जो अच्छा नहीं सोचते हैं , वे सदा ही बुरा ही सोचते रहते हैं,औऱ उन्हें ये भी बुद्धि नहीं आती है कि हम बुरा सोच रहे हैं ,इसलिए हमें सब बुरा समझते हैं। आप ने बहुत अच्छा प्रश्न किया है।
अब आप ध्यान से सुनिए।
भागवत के 3 स्कन्ध के 26 अध्याय के 17 वें श्लोक में भगवान कपिल ने मां देवहूति से कहा कि
प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि।
चेष्टा यत: स भगवान काल इत्युपलक्षित:।।
हे मानवि, मनुपुत्री ! सृष्टि के पूर्व में प्रकृति के सत्वगुण ,रजोगुण औऱ तमोगुण शांत रहते हैं।प्रकृति में कोई क्रिया नहीं होती है। इस निर्विशेष अवस्था को सविशेष करने के लिए भगवान ही काल रूप से प्रकृति में क्रिया उत्पन्न करते हैं।तभी यह प्रकृति पृथिवी ,जल तेज वायु आदि के रूप में पृथक् पृथक् रूप से अनेक रूप धारण करने में समर्थ होती है। वह काल ही सभी शरीरों का निर्माण करता है।सम्पूर्ण संसार काल के अन्तर्गत ही उत्पन्न होता है औऱ नष्ट होता है।
12 राशियों का जन्म औऱ नवग्रहों का जन्म होता है। 12 म 9 = 108 सारे संसार की उत्पत्ति रवि ,सोम,मंगल, बुध,गुरू, शुक्र,शनि ,राहु ,केतु इन नव ग्रहों के तथा मेष ,बृष आदि 12 राशियों के अन्तर्गत ही सभी की उत्पत्ति होती है।विनाश भी इसी काल के भीतर ही होता है।इसलिए माला में 108 मनका होते हैं। आपका जप काल स्वरूप भगवान मेंं व्याप्त हो जाता है।आपका जप सम्पूर्ण प्रकृति को प्रभावित करता है।इसीलिए तो जप करने से दूसरों पर प्रभाव पड़ता है।जप करने वाले के समीप में जाते ही दूसरे का अशांत मन भी शांत हो जाता है ,तो अपना तो हो ही जाएगा।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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