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Tuesday, December 6, 2022
धर्म कर्म

देवता भी चाहते हैं कि हमारा जन्म भारतदेश में ही हो

देवता भी चाहते हैं कि हमारा जन्म भारतदेश में ही होदेवता भी चाहते हैं कि हमारा जन्म भारतदेश में ही हो
Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् भागवत के 5 वें स्कन्ध के 19 वें अध्याय के 21 वें श्लोक में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को भारतवर्ष की महिमा बताते हुए कहा कि देवता कहते हैं कि –
अहो अमीषां किमकारिशोभनं
प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरि:।
यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे
मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि न:।।
अहो अमीषां किमकारि शोभनम्
इन्द्र आदि देवता कहते हैं कि अहो! अर्थात आश्चर्य है कि इन मनुष्यों ने कौन सा शोभन अर्थात पुण्यशाली कर्म किया होगा!
यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे
जिन स्त्री पुरुषों ने इस भारतवर्ष के अजिर अर्थात आंगन में जन्म प्राप्त किया है, उन स्त्री पुरुषों ने ऐसा कौन सा शुभकार्य किया होगा। क्योंकि स्वर्ग में जाने के लिए, तो सौ यज्ञ करना सरल है। मनुष्य से देवता बनना सरल है। वेदों पुराणों में यह सर्वविदित है कि इतने वाजपेय यज्ञ करने से तथा इतने अश्वमेध यज्ञ करने से स्वर्ग में निवास प्राप्त होता है। स्वर्ग की वस्तुओं के उपभोग करने की विशेष आयु तथा शक्ति प्राप्त होती है। किन्तु जो भारतवर्ष के भारतीय स्त्री पुरुषों को दिव्य आनन्द प्राप्त होता है, वह स्वर्ग में प्राप्त नहीं होता है।
भारतवर्ष में स्वर्ग से अधिक विशेषता क्या है? तो सुनिए –
प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरि:
भारतवर्ष के भारतीय जनों के नाम संकीर्तन करते ही भगवान श्री हरि नारायण इनसे प्रसन्न हो जाते हैं। हमने सौ यज्ञ करके स्वर्ग का स्थान प्राप्त किया है। किन्तु भगवान नारायण हमारे सौ यज्ञों से प्रसन्न नहीं होते हैं। हम देवता तो मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली दिव्यशक्ति सम्पन्न हैं। सभी देवता सभी प्रकार से मनुष्यों से श्रेष्ठ होते हैं। किन्तु भगवान नारायण भी भारतवर्ष में जन्मे हुए साधारण स्त्री पुरुषों के थोड़े से भजन कीर्तन से इतने अधिक प्रसन्न हो जाते हैं कि भगवान भक्तों की सेवा में लग जाते हैं।
इसलिए हमें ऐसी कामना होती है कि –
मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि न:
हम देवताओं को ऐसी स्पृहा अर्थात कामना होती है कि मुकुन्द भगवान की सेवा का साधनस्वरूप शरीर भारत में ही हमको मिल जाए। भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं, उस शरीर को प्राप्त करके हमें सन्तोष प्राप्त होगा। स्वर्ग की अप्सराओं का नृत्य गान तथा दिव्य उपभोग अब हमें अच्छा नहीं लगता है। भगवान भी कभी भोगियों से प्रसन्न नहीं होते हैं, योगियों से और अपने सरलचित्त भक्तों के प्रेमपूर्ण भावपूर्ण भक्ति से अतिशीघ्र प्रसन्न होते हैं। भारतवर्ष के भारतीयजनों की भक्ति से भगवान जितनी जल्दी प्रसन्न होते हैं, उतनी जल्दी हम देवताओं की स्तुति से प्रसन्न नहीं होते हैं।
अब आप सभी भारतीयों को विचार करना चाहिए और गर्व भी करना चाहिए कि भारतवर्ष के स्त्री पुरुषों में जो दयालुता, सहनशक्ति तथा भगवान की भक्ति देखने को मिलती है, वह दया, तप, संयम, नियम, सरलता, परोपकार आदि गुण, संसार के किसी भी देश के स्त्री पुरुषों में नहीं दिखाई देते हैं। भारतीय नारी में परिवार पालने का स्नेह, सम्बन्धियों, बन्धुओं के प्रति आजीवन आदर सम्मान तथा स्नेह किसी भी देश के नर नारियों में नहीं होता है। माता पिता, गुरु तथा भगवान को समानरूप से देखने की भावना, न तो किसी देश में होती है, और न ही किसी पन्थ या मजहब में होती है।
सभी जीवों में अपने भगवान को देखने की दिव्य भावना मात्र सनातनधर्म में ही है। देवता कहते हैं कि भारतवर्ष को छोड़कर धरती में जितने देश हैं, तथा उन देशों में जितने स्त्री पुरुष होते हैं, वे सभी भोगी अज्ञानी अबोध होते हैं। भारतवर्ष में ही योगी, प्रबुद्ध तथा ज्ञानी स्त्री पुरुष होते हैं। इसलिए देवता कहते हैं कि जब हमारा पुण्य समाप्त हो जाए तो भारत में ही जन्म हो। भारत में ही भक्ति, भगवान, ज्ञान तथा ज्ञानवान प्राप्त होते हैं। क्योंकि स्वर्ग के भोग भोगते हुए हम सभी अकुला गए हैं, तृप्त हो गए हैं। इसलिए भारतवर्ष में जन्म प्राप्त होगा तो गृहस्थ होने पर भी भगवान का स्मरण, भगवान की कथा तथा सत्पुरुषों का संग प्राप्त होगा।
जहां भगवान की भक्ति, ज्ञान, वैराग्य तथा धर्ममर्यादा नहीं होती है, वहां का मनुष्य पशुओं के समान ही भोगी और सन्तान उत्पन्न करके त्याग देनेवाला होता है। जीवों को बड़ी निर्दयता से मारकर खानेवाले, कृतघ्न दुष्ट मनुष्यों के बीच में जन्म होगा तो नरक के समान ही आजीवन दुख भोगना पड़ेगा। धन्य है भारतवर्ष, तथा धन्य हैं वे भारतीय धार्मिक नर नारी, धन्य हैं वे स्थल जहां गंगा, जमुना सरस्वती आदि दिव्य नदियां भारतीयों के मानस को शुद्ध करतीं हैं।
इसलिए सरस्वती देवी का नाम भारती है। शेष तो बोलीं भाषाएं हैं। हमें गौरव है, स्वाभिमान है कि हम भारतीय हैं। भारतवर्षीय हैं। जहां देवता भी जन्म लेने की इच्छा करते हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
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