Please assign a menu to the primary menu location under menu

Friday, December 2, 2022
धर्म कर्म

अतिदुख प्राप्त होने पर भी अपने धर्म का पालन करना चाहिए

Visfot News

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृंदावन धाम
श्रीमद् देवीभागवत के 7 वें स्कन्ध के 24 वें अध्याय के 25 वें और 26 वें श्लोक में श्मशान घाट में बैठे बैठे सत्यप्रतिज्ञ महाराज हरिश्चन्द्र जी ने रोते हुए लोगों को तथा जलते हुए शवों को देखकर विचार किया कि –
हा भृत्या: मन्त्रिण: यूयं क्व तद् राज्यं कुलोचितम्।
हा प्रिये पुत्र मे बाल मां त्यक्त्वा मन्दभाग्यकम्।25।।
महाराज सत्यवादी हरिश्चन्द्र जी ने श्मशान घाट में चाण्डाल की चाकरी करते हुए विचार किया कि –
धर्म पालन करने में भी और अधर्म करने में भी दोनों में ही दुख तो मिलना ही है। हे मन्त्रियो! तुम सब मुझे छोडक़र कहां चले गए? कहां वह सुखदायक राज्य चला गया? कुल परम्परा से प्राप्त राज्य भी चला गया। हे प्रिय पत्नी तारा ! तुम भी मुझे छोडक़र चली गई। हे पुत्र! तुम भी मुझ अभागी को छोडक़र माता के साथ चले गए। अब अपना दुख भोगने के लिए एकमात्र मैं ही अकेला बचा हूं। धर्मपालन में यदि इतना दुख प्राप्त होता है तो अधर्म करने में कितना भय नहीं लगता होगा? कितना दुख नहीं भोगना पड़ता होगा? अर्थात अधर्म करनेवाले स्त्री पुरुष तो रात दिन समाज से डरते रहते होंगे, शाशक के शाशन से डरते होंगे। किसी को पता न चल जाए, ये भय सदा ही लगा रहता होगा। अधार्मिक स्त्री पुरुषों का जीवन तो नरक के समान चौबीसों घंटे भय, व्याकुलता में ही बीतता होगा।
अधर्म करनेवाले स्त्री पुरुषों का ये कोई जीवन है? अधर्म करनेवाले स्त्री पुरुषों का जीवन ऐसा व्यतीत होता है कि जैसे जंगल में हिरण का रात दिन भय में व्यतीत होता है। अपने धर्म का पालन करने में भी दुख मिलता है और अधर्म और पाप करने में भी दुख ही मिलता है तो क्या करना चाहिए?
अब 26 वें श्लोक पर विचार करिए –
विना धर्मं मनुष्याणां जायते न शुभं क्वचित्।
यत्नतो धारयेत् तस्मात् पुरुषो धर्ममेव हि।। 26।।
विना धर्मं मनुष्याणां जायते न शुभं क्वचित्
जो स्त्री पुरुष अपने धर्म का पालन नहीं करते हैं, उनका कहीं शुभ नहीं होता है। अर्थात न तो इस मृत्युलोक में मानवसमाज में आदर होता है, न ही कोई उसका विश्वास करता है, न ही उसकी कोई सहायता करता है। अधर्म का आचरण करनेवाले स्त्री पुरुषों की कोई भी संगति भी नहीं करना चाहता है। जो भी इनकी संगति करता है, समाज में उसको भी उसी घृणित दृष्टि से देखा जाता है। समाज से परित्यक्त निन्दित ऐसे जीवन जीने से क्या लाभ? जिस व्यक्ति से मानव समाज जीवनभर दूर दूर भागता रहा है, ऐसे व्यक्ति मरने के बाद भी पता नहीं किस योनि में जन्म प्राप्त करते होंगे? ऐसे अधर्म आचरण करनेवालों की मुक्ति के लिए घर के भी सदस्य पुण्य नहीं करते हैं। अधर्म का धन,सन्तान और परिवार के सदस्यों की भी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। उन्हें भी पुण्य परोपकार आदि नहीं करने देता है। घूस, चोरी, बेईमानी तथा ठगी से प्राप्त धन से पूरा परिवार सुख सुविधा भोगता है, किन्तु घूस, चोरी,बेईमानी, ठगी करनेवाले व्यक्ति अकेले ही इसका दुष्परिणाम भोगते हैं। चाहे इस मृत्युलोक का जेल हो या मरने के बाद का नरक। अधर्म का फल तो अधर्म करनेवाले को ही भोगना पड़ता है। इसलिए महाराज हरिश्चन्द्र कहते हैं कि धर्म के बिना मनुष्य के जीवन में कभी भी कहीं भी शुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
तो क्या करना चाहिए?
यत्नतो धारयेत् तस्मात् पुरुषो धर्ममेव हि।
महाराज हरिश्चन्द्र कहते हैं कि इसलिए सभी मनुष्यों को जाति के अनुसार, सम्बन्ध के अनुसार तथा देशकाल परिस्थिति के अनुसार सदा ही कष्ट उठाकर भी अपने धर्म का ही पालन करना चाहिए। क्योंकि अपने धर्म का पालन करनेवाले स्त्री पुरुषों की इस संसार में निन्दा नहीं होती है और मरने के बाद दुर्गति भी नहीं होती है। संसार में जबतक शरीर रहेगा, तथा शरीर के सम्बन्धी माता पिता पति पत्नी पुत्र मित्र आदि रहेंगे, तबतक किसी न किसी से किसी न किसी प्रकार का तो दुख मिलता ही रहेगा। कभी धन सम्बन्धी दुख मिलेगा तो कभी रोग सम्बन्धी दुख मिलेगा। दुख तो मिलना ही है। आजीविका के लिए परिश्रम तो करना ही होगा, कष्ट तो उठाना ही पड़ता है। अर्थात जबतक शरीर रहेगा तो तबतक दुख भी रहेगा। यदि शारीरिक सुख के लिए, अथवा अपने सम्बन्धित लोगों के सुख के लिए अधर्म का मार्ग चुन लिया तो ऐसा सुख थोड़े दिनों तक ही दिखाई देता है। अन्त में दुख कबतक मिलेगा, इसकी सीमा निर्धारित नहीं है। इसलिए अपने धर्म का ही आचरण करना चाहिए, भले ही कितना भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े। धर्म ही इन्द्रियों को नियन्त्रित कर सकता है। अनियन्त्रित इन्द्रियां तो दुख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देतीं हैं।

RAM KUMAR KUSHWAHA
भाषा चुने »